नियमितीकरण आदेश की तारीख से ही लागू होगा, सेवानिवृत्ति के बाद जीपीएफ योजना का दावा पोषणीय नहीं: सुप्रीम कोर्ट

जस्टिस उज्ज्वल भुयान और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर की सुप्रीम कोर्ट पीठ ने स्पष्ट किया है कि किसी कर्मचारी की सेवाओं का नियमितीकरण नियमितीकरण आदेश जारी होने की तिथि से प्रभावी होता है, न कि उसकी शुरुआती नियुक्ति की तारीख से। इस टिप्पणी के साथ शीर्ष अदालत ने राष्ट्रीय ग्रामीण विकास संस्थान (एनआईआरडी) के एक सेवानिवृत्त प्रोफेसर की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने अंशदायी पेंशन फंड (सीपीएफ) योजना के बजाय सामान्य भविष्य निधि (जीपीएफ)-सह-पेंशन योजना के तहत कवरेज की मांग की थी। विशेष अनुमति याचिका दायर करने में हुई देरी को माफ करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने तेलंगाना हाईकोर्ट के फैसले की पुष्टि की, जिसने सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल (कैट) के उस आदेश को रद्द कर दिया था जिसमें याचिकाकर्ता को राहत दी गई थी।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता के. सुमन चंद्र को 12 नवंबर 1984 को एनआईआरडी में संविदा के आधार पर अनुसंधान सहयोगी (रिसर्च एसोसिएट) के रूप में नियुक्त किया गया था। 13 नवंबर 1984 के कार्यालय आदेश के अनुसार उन्हें सीपीएफ योजना के तहत रखा गया था। इसके बाद 7 नवंबर 1985 से उनकी सेवाओं को नियमित कर दिया गया। आगे चलकर उन्हें 9 मार्च 1992 को नियमित आधार पर सहायक निदेशक, 10 अगस्त 1999 को संविदा के आधार पर उप निदेशक और 1 मई 2007 को संविदा पर प्रोफेसर के पद पर नियुक्त किया गया।

4 मई 2012 को कार्यालय आदेश संख्या 98 के माध्यम से प्रोफेसर के पद पर उनकी सेवाओं को एक अन्य कर्मचारी श्री श्याम सुंदर प्रसाद शर्मा (एस.एस.पी. शर्मा) के साथ नियमित कर दिया गया। याचिकाकर्ता 31 जनवरी 2017 को सेवा से सेवानिवृत्त हुए और उन्हें 14 फरवरी 2017 को सभी सेवानिवृत्ति लाभ प्राप्त हुए, जिसमें उनके स्वयं के योगदान के साथ-साथ सीपीएफ राशि में एनआईआरडी का अंशदान भी शामिल था।

सेवानिवृत्ति के बाद याचिकाकर्ता ने कैट, हैदराबाद के समक्ष मूल आवेदन (ओ.ए.) संख्या 45/2017 दायर किया। इसमें उन्होंने मांग की कि उन्हें जीपीएफ योजना के बजाय सीपीएफ योजना में बनाए रखना अवैध है और यह एनआईआरडी नियम 2011 तथा एनआईआरडी सेवा उप-नियमों के अध्याय IX पैरा 52 धारा 4 के विपरीत है।

इससे पहले श्री एस.एस.पी. शर्मा ने भी ऐसी ही राहत की मांग करते हुए कैट के समक्ष ओ.ए. संख्या 109/2015 दायर किया था। कैट ने 27 अगस्त 2018 को श्री एस.एस.पी. शर्मा के आवेदन को स्वीकार कर लिया था और केंद्र सरकार द्वारा इसके खिलाफ दायर रिट याचिका को हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया था। श्री एस.एस.पी. शर्मा के मामले में दिए गए फैसले के आधार पर कैट ने 15 जुलाई 2019 को याचिकाकर्ता के आवेदन को भी स्वीकार कर लिया और एनआईआरडी को निर्देश दिया कि वह याचिकाकर्ता को पात्रता की तारीख से जीपीएफ योजना में जाने की अनुमति दे।

READ ALSO  सुप्रीम कोर्ट ने हिजाब मामले में अपील पर तत्काल सुनवाई से किया इनकार- जाने विस्तार से

बाद के घटनाक्रम और दलीलें

इसी बीच एनआईआरडी ने श्री एस.एस.पी. शर्मा के मामले में कैट के निर्णय को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। 28 फरवरी 2023 को नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ रूरल डेवलपमेंट बनाम श्याम सुंदर प्रसाद शर्मा व अन्य (सिविल अपील संख्या 542/2023) मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कैट और हाईकोर्ट के फैसलों को रद्द कर दिया। शीर्ष अदालत ने माना कि 4 मई 2012 के नियमितीकरण आदेश के तहत सेवाएं आदेश जारी होने की तारीख से ही प्रभावी होंगी, न कि शुरुआती नियुक्ति की तारीख से। ऐसा इसलिए क्योंकि 4 मई 2012 के आदेश में स्पष्ट रूप से कहा गया था कि नियमितीकरण आदेश जारी होने की तिथि से लागू होगा, और श्री शर्मा ने इस शर्त को चुनौती नहीं दी थी।

जब याचिकाकर्ता के खिलाफ एनआईआरडी की रिट याचिका तेलंगाना हाईकोर्ट के सामने आई, तो एनआईआरडी ने सुप्रीम कोर्ट के एस.एस.पी. शर्मा फैसले का हवाला दिया। हाईकोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता का मामला श्री एस.एस.पी. शर्मा के समान ही था। नियमितीकरण 4 मई 2012 से प्रभावी हुआ था और याचिकाकर्ता ने सीपीएफ लाभ प्राप्त करने के बाद सेवानिवृत्ति के उपरांत कैट का रुख किया था। इसके चलते हाईकोर्ट ने 8 अगस्त 2023 को एनआईआरडी की रिट याचिका स्वीकार करते हुए कैट के आदेश को रद्द कर दिया।

READ ALSO  5 वर्षीय बच्ची से दुष्कर्म और हत्या मामले में दोषी की फांसी पर सुप्रीम कोर्ट की रोक, अपील लंबित रहने तक सजा पर रोक

सुप्रीम कोर्ट के समक्ष याचिकाकर्ता के वकील मनीष कुमार सरन ने एस.एस.पी. शर्मा मामले के निर्णय को अलग साबित करने का प्रयास किया। दूसरी ओर, पहले प्रतिवादी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता रुचि कोहली और दूसरे प्रतिवादी की ओर से अधिवक्ता विशाखा ने तर्क दिया कि याचिकाकर्ता की स्थिति श्री एस.एस.पी. शर्मा के समान ही है और यह निर्णय पूरी तरह लागू होता है।

अदालत का विश्लेषण और टिप्पणियां

सुप्रीम कोर्ट ने 4 मई 2012 के कार्यालय आदेश संख्या 98 का अवलोकन किया, जिसके द्वारा याचिकाकर्ता सहित संविदात्मक शैक्षणिक कर्मचारियों की सेवाओं को नियमित किया गया था। इस आदेश में निहित शर्तों में स्पष्ट रूप से कहा गया था कि नियमितीकरण आदेश की तारीख से प्रभावी होगा और सेवाएं मौजूदा सीपीएफ योजना द्वारा ही संचालित होती रहेंगी।

READ ALSO  झारखंड हाईकोर्ट ने जेल में कैदियों के डांस का वीडियो वायरल होने पर सरकार को फटकार लगाई, जेल अधीक्षक और IG पर कार्रवाई की जानकारी मांगी

अदालत ने टिप्पणी की:

“प्रोफेसर के पद पर सेवाओं के नियमितीकरण के लिए नियम और शर्तों को स्वीकार करने तथा सीपीएफ योजना के तहत लाभ प्राप्त करने के बाद सेवानिवृत्ति के उपरांत यह शिकायत दर्ज कराने के कारण हाईकोर्ट द्वारा याचिकाकर्ता को राहत न देना बिल्कुल सही था।”

अदालत ने आगे बल देते हुए कहा:

“एस.एस.पी. शर्मा (सुप्रा) मामले में इस अदालत द्वारा दिए गए निर्णय से हम पूरी तरह सहमत हैं और याचिकाकर्ता के कहने पर इस मुद्दे को दोबारा खोलने का हमें कोई कारण नजर नहीं आता।”

निर्णय

संविधान के अनुच्छेद 136 के तहत अपने अधिकार क्षेत्र का प्रयोग करने का कोई आधार न पाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय दिया:

“हमारी राय में, चूंकि याचिकाकर्ता श्री एस.एस.पी. शर्मा के समान स्थिति में है, विशेष रूप से इस तथ्य के मद्देनजर कि श्री एस.एस.पी. शर्मा और याचिकाकर्ता की सेवाओं को 04.05.2012 के कार्यालय आदेश द्वारा समान शर्तों पर नियमित किया गया था, इसलिए हमें भारत के संविधान के अनुच्छेद 136 के तहत अधिकार क्षेत्र का प्रयोग करने का कोई कारण नहीं दिखता।”

तदनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने विशेष अनुमति याचिका को खारिज कर दिया।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: के. सुमन चंद्र बनाम यूनियन ऑफ इंडिया एवं अन्य
वाद संख्या: स्पेशल लीव याचिका (सिविल) (डायरी संख्या 5679/2024)
पीठ: जस्टिस उज्ज्वल भुयान और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर
निर्णय की तिथि: 20 अगस्त 2026

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles