नियुक्ति पत्र जारी होने से पहले चयनित अभ्यर्थी की मृत्यु होने पर आश्रित अनुकंपा नियुक्ति का दावा नहीं कर सकते: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस अनीश कुमार गुप्ता ने कहा है कि सार्वजनिक रोजगार की चयन प्रक्रिया में शामिल होने वाले किसी अभ्यर्थी की यदि नियुक्ति पत्र जारी होने से पहले मृत्यु हो जाती है, तो उसके आश्रित अनुकंपा नियुक्ति की मांग नहीं कर सकते, क्योंकि वह अभ्यर्थी कभी सेवा में शामिल ही नहीं हुआ था। अनुकंपा नियुक्ति की मांग करने वाली एक याचिका को खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि उत्तर प्रदेश सरकारी सेवक (मृतकों के आश्रितों की भर्ती) नियमावली, 1974 और उत्तर प्रदेश पुलिस आरक्षी और मुख्य आरक्षी सेवा नियमावली, 2015 के तहत मिलने वाले वैधानिक लाभ ऐसे अभ्यर्थियों के परिवारों को नहीं दिए जा सकते।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला उत्तर प्रदेश में पुलिस विभाग में सिपाहियों (नागरिक पुलिस और पीएसी) की सीधी भर्ती के लिए अक्टूबर 2018 में जारी विज्ञापन से जुड़ा है। याचिकाकर्ता के पति ने इस भर्ती के लिए आवेदन किया था। उन्होंने लिखित परीक्षा पास की, 29 दिसंबर 2019 को शारीरिक दक्षता परीक्षा दी और 7 मार्च 2021 को मेडिकल परीक्षा में भी सफल रहे। इसके बाद प्रकाशित अंतिम चयन सूची में उनका नाम शामिल था।

लेकिन 5 जून 2021 को औपचारिक नियुक्ति पत्र जारी होने से पहले ही, 30 अप्रैल 2021 को याचिकाकर्ता के पति का निधन हो गया। पति के चयन के आधार पर याचिकाकर्ता ने अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन किया। पुलिस अधीक्षक, बुलंदशहर ने 9 नवंबर 2021 के आदेश के जरिए उनके दावे को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि अभ्यर्थी सेवा में शामिल नहीं हुआ था। इस अस्वीकृति आदेश को रद्द करने की मांग को लेकर याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

पक्षों की दलीलें

याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि 2018 में शुरू हुई भर्ती प्रक्रिया में प्रशासनिक देरी हुई थी। यदि चयन प्रक्रिया समय पर पूरी हो जाती, तो उनके पति अपनी मृत्यु से पहले सिपाही के पद पर कार्यभार ग्रहण कर लेते और उन्हें सरकारी सेवक का दर्जा मिल जाता, जिससे उनके आश्रित अनुकंपा नियुक्ति के हकदार होते।

अपनी याचिका के समर्थन में याचिकाकर्ता ने वंदना देवी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व 3 अन्य (रिट-ए संख्या 22449/2013) में पारित अंतरिम आदेश (25 अप्रैल 2013) और मोनी देवी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य (रिट-ए संख्या 4216/2014, निर्णय 7 फरवरी 2018) के फैसले का हवाला देते हुए समान राहत देने की मांग की।

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राज्य सरकार की ओर से अपर मुख्य स्थायी अधिवक्ता राजीव गुप्ता ने तर्क दिया कि चूंकि याचिकाकर्ता के पति की मृत्यु नियुक्ति पत्र जारी होने से पहले हो गई थी, इसलिए उन्होंने कभी सेवा में प्रवेश ही नहीं किया था। उन्होंने कहा कि भले ही कोई अभ्यर्थी चयन प्रक्रिया में शामिल होकर अंतिम रूप से चयनित हो जाए, लेकिन जब तक वह सेवा में कार्यभार ग्रहण नहीं कर लेता, तब तक उसे सरकारी कर्मचारी नहीं माना जा सकता। इसलिए यू.पी. सरकारी सेवक (मृतकों के आश्रितों की भर्ती) नियमावली, 1974 या उत्तर प्रदेश पुलिस आरक्षी और मुख्य आरक्षी सेवा नियमावली, 2015 के नियम 5 के प्रावधान लागू नहीं होते।

राज्य ने वंदना देवी और मोनी देवी से जुड़े फैसलों को अलग बताते हुए स्पष्ट किया कि वे आदेश उन विशेष परिस्थितियों में दिए गए थे, जहां अधिकारियों द्वारा शुरुआती नियुक्तियों को अवैध रूप से रद्द कर दिया गया था और बाद में अदालतों ने उस रद्दीकरण को खारिज कर दिया था, जबकि वर्तमान मामले में ऐसी कोई परिस्थिति नहीं है।

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हाईकोर्ट का विश्लेषण और निष्कर्ष

अदालत के रिकॉर्ड का अवलोकन करने और दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता के पति की मृत्यु 30 अप्रैल 2021 को हुई थी, जो कि 5 जून 2021 को नियुक्ति पत्र जारी होने से पहले की तारीख थी।

अदालत ने टिप्पणी की:

“ऐसी परिस्थितियों में, किसी भी स्थिति में याचिकाकर्ता के पति को सेवा में आया हुआ नहीं माना जा सकता।”

अनुकंपा नियुक्ति से संबंधित वैधानिक नियमों की प्रयोज्यता पर विचार करते हुए जस्टिस अनीश कुमार गुप्ता ने कहा:

“इसलिए, सार्वजनिक रोजगार के लिए चयन प्रक्रिया में भाग लेने वाले ऐसे उम्मीदवार के आश्रित, जो चयनित तो हो गया था लेकिन नियुक्ति पत्र जारी होने से पहले ही उसकी मृत्यु हो गई, उसकी मृत्यु के आधार पर अनुकंपा नियुक्ति का दावा नहीं कर सकते, क्योंकि ऐसा उम्मीदवार अपनी मृत्यु से पहले सेवा में आया ही नहीं था।”

याचिकाकर्ता द्वारा दिए गए न्यायिक दृष्टांतों पर हाईकोर्ट ने माना कि वंदना देवी और मोनी देवी दोनों मामले उनके अपने विशिष्ट तथ्यों पर आधारित थे और वे कोई बाध्यकारी कानूनी नज़ीर नहीं बनाते हैं।

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कोर्ट ने कहा:

“वंदना देवी (उपरोक्त) में पारित अंतरिम आदेश के साथ-साथ मोनी देवी (उपरोक्त) में पारित अंतिम आदेश इस मामले के विशिष्ट तथ्यों और परिस्थितियों में पारित किए गए थे और इस अदालत की विचारित राय में, इन्होंने कोई ऐसा विशिष्ट कानून तय नहीं किया है जिसे नज़ीर के रूप में लागू किया जाए या इन निर्णयों को मिसाल माना जाए।”

फैसला

याचिकाकर्ता को मांगी गई राहत देने का कोई आधार न पाते हुए हाईकोर्ट ने रिट याचिका को खारिज कर दिया।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: संध्या यादव बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व 5 अन्य

वाद संख्या: रिट – ए संख्या 6980/2022

पीठ: जस्टिस अनीश कुमार गुप्ता

निर्णय की तिथि: 18 अगस्त 2026

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