इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जस्टिस डॉ. योगेंद्र कुमार श्रीवास्तव की एकल पीठ के समक्ष स्पष्ट किया है कि केवल व्यक्तिगत असुविधा या किसी अलग स्थान पर नौकरी करने के आधार पर नागरिक प्रक्रिया संहिता (CPC) की धारा 24 के तहत वैवाहिक विवाद को स्वतः ट्रांसफर कराने का अधिकार नहीं मिल जाता। हाईकोर्ट ने बलिया के फैमिली कोर्ट में लंबित तलाक के मुकदमे को वाराणसी स्थानांतरित करने की मांग वाली पत्नी की याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने टिप्पणी की कि सीपीसी की धारा 24 के तहत विवेकाधीन शक्ति का इस्तेमाल करने के लिए केवल तुलनात्मक सुविधा दर्शाने के बजाय वास्तविक और गंभीर कठिनाई साबित करना अनिवार्य है।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता (पत्नी) का विवाह 13 दिसंबर 2023 को हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार संपन्न हुआ था। पत्नी का आरोप था कि शादी के समय उसके परिवार द्वारा पर्याप्त दहेज दिए जाने के बावजूद पति और उसके परिजनों द्वारा अतिरिक्त दहेज की मांग की गई। उसने यह भी आरोप लगाया कि मांग पूरी न होने पर उसे प्रताड़ित किया गया और उसके साथ मारपीट की गई।
दंपति के बीच विवाद के बाद पति ने हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13(A) के तहत विवाह विच्छेद के लिए अतिरिक्त प्रधान न्यायाधीश, फैमिली कोर्ट, बलिया के समक्ष मुकदमा दाखिल किया। पत्नी ने बताया कि उसे शुरुआत में इस मुकदमे की जानकारी नहीं थी, लेकिन बाद में सूचना मिलने पर उसने 4 सितंबर 2025 को उपस्थित होकर अपनी आपत्तियां दर्ज कराईं।
पक्षों की दलीलें
पत्नी ने सीपीसी की धारा 24 के तहत ट्रांसफर याचिका दाखिल कर मुकदमे को बलिया से वाराणसी के सक्षम न्यायालय में भेजने की गुहार लगाई। उसने दलील दी कि नेशनल हेल्थ मिशन, उत्तर प्रदेश के विशेष कार्यक्रम प्रबंधन इकाई द्वारा जारी 7 मार्च 2024 के प्रस्ताव पत्र के तहत वह संविदा स्टाफ नर्स के रूप में नियुक्त हुई है और वर्तमान में सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, सारनाथ, वाराणसी में कार्यरत है तथा वहीं निवास कर रही है।
पत्नी ने वाराणसी में लंबित अपने अन्य मुकदमों का भी हवाला दिया:
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 144 के तहत प्रधान न्यायाधीश, फैमिली कोर्ट, वाराणसी में लंबित मामला;
- घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 की धारा 12 के तहत सिविल जज (जूनियर डिविजन), वाराणसी के समक्ष लंबित मामला; और
- थाना सारनाथ में भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 85, 115(2), 352, 74, 351(3) और दहेज प्रतिषेध अधिनियम की धारा 3/4 के तहत दर्ज आपराधिक मामला।
पत्नी का तर्क था कि संविदा नर्स के रूप में अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए और अकेले रहते हुए, बिना किसी पारिवारिक सदस्य की मदद के मुकदमे की सुनवाई के लिए बलिया जाना उसके लिए अत्यंत कठिन और कष्टदायक होगा।
कोर्ट का विश्लेषण
सीपीसी की धारा 24 के तहत मामलों के स्थानांतरण से जुड़े सिद्धांतों का विश्लेषण करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि मुकदमों को स्थानांतरित करने की शक्ति विवेकाधीन है और इसका प्रयोग किसी कठोर फॉर्मूले के बजाय न्यायिक रूप से किया जाना चाहिए। कोर्ट ने टिप्पणी की:
“उक्त प्रावधान के तहत दी गई ट्रांसफर की शक्ति प्रकृति में विवेकाधीन है और मामले के तथ्यों व परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए इसका न्यायिक रूप से प्रयोग किया जाना आवश्यक है। यह प्रावधान केवल व्यक्तिगत असुविधा सिद्ध करने के आधार पर किसी भी पक्ष को मामला ट्रांसफर कराने का पूर्ण अधिकार प्रदान नहीं करता है।”
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि एक संतुलित मूल्यांकन के लिए दोनों पक्षों की सुविधा और उनके वैध हितों के साथ-साथ कार्यवाही की प्रकृति और स्थिति पर विचार करना आवश्यक है। वैवाहिक विवादों में पत्नी की स्थिति पर विचार करते हुए कोर्ट ने कहा:
“पत्नी की सुविधा एक महत्वपूर्ण विचारणीय पहलू है, लेकिन इसे अन्य प्रासंगिक परिस्थितियों और विपक्षी पक्ष को होने वाली संभावित असुविधा के साथ तौला जाना चाहिए।”
वैवाहिक मामलों में सीपीसी की धारा 24 के तहत क्षेत्राधिकार तय करने के लिए हाईकोर्ट ने कई महत्वपूर्ण कारकों को रेखांकित किया:
- पति और पत्नी दोनों की आर्थिक स्थिति और कमाई की क्षमता;
- पत्नी की सामाजिक स्थिति और अपने माता-पिता या परिवार के सदस्यों पर उसकी निर्भरता;
- वैवाहिक विवाद में शामिल नाबालिग बच्चों की कस्टडी और देखरेख;
- लागू होने की स्थिति में बच्चों की शिक्षा और कल्याण;
- दोनों पक्षों का शारीरिक स्वास्थ्य और स्थिति;
- पक्षों के बीच लंबित सिविल, वैवाहिक और आपराधिक मुकदमों की प्रकृति और संख्या;
- पत्नी के निवास का स्थान और अदालत तक उसकी पहुंच; तथा
- परिवहन के सुविधाजनक और सुलभ साधनों की उपलब्धता।
इन मापदंडों को लागू करते हुए कोर्ट ने माना कि सामान्य यात्रा या सामान्य असुविधा के आधार पर किसी मुकदमे को उसके मौजूदा फोरम से नहीं हटाया जा सकता:
“यह सिद्ध सिद्धांत है कि केवल असुविधा या एक स्थान से दूसरे स्थान की यात्रा की आवश्यकता अपने आप में ट्रांसफर का पर्याप्त आधार नहीं बन सकती। मुकदमेबाजी में कुछ हद तक असुविधा होना स्वाभाविक है और इसे हमेशा न्याय से वंचित किए जाने के बराबर नहीं माना जा सकता।”
कोर्ट ने नोट किया कि यद्यपि वाराणसी में पत्नी की नौकरी एक प्रासंगिक तथ्य है, लेकिन रिकॉर्ड पर ऐसा कोई प्रमाण नहीं रखा गया है जिससे यह सिद्ध हो कि उसकी नौकरी बलिया कोर्ट में पेश होने से रोकती है, या उसे अवकाश व ड्यूटी समायोजन नहीं मिल सकता, या यात्रा से उसकी नौकरी पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। इसके अतिरिक्त, वाराणसी में चल रहे मामलों और बलिया के मुकदमे की तिथियों में किसी अपरिहार्य टकराव या बलिया यात्रा के दौरान सुरक्षा के खतरे का भी कोई सबूत प्रस्तुत नहीं किया गया।
कोर्ट का निर्णय
हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि याचिकाकर्ता अधिक से अधिक केवल तुलनात्मक सुविधा का मामला ही साबित कर सकी है, न कि किसी वास्तविक और गंभीर कठिनाई का। ट्रांसफर के लिए आवश्यक कानूनी मानदंड को दोहराते हुए कोर्ट ने कहा:
“सीपीसी की धारा 24 के तहत शक्ति का प्रयोग केवल इसलिए नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि एक पक्ष किसी अन्य फोरम को अधिक सुविधाजनक मानता है।”
सीपीसी की धारा 24 की शर्तों की पूर्ति न होने के कारण हाईकोर्ट ने ट्रांसफर याचिका को बिना किसी लागत के खारिज कर दिया।
हालांकि, संभावित व्यावहारिक कठिनाइयों को देखते हुए कोर्ट ने पत्नी को राहत देते हुए निर्देश दिया:
“वर्तमान ट्रांसफर आवेदन को खारिज करने से याचिकाकर्ता को फैमिली कोर्ट, बलिया के समक्ष व्यक्तिगत उपस्थिति से छूट या कानून के तहत अनुमेय अन्य प्रक्रियात्मक राहत के लिए उपयुक्त आवेदन दाखिल करने से नहीं रोका जाएगा, विशेष रूप से वाराणसी में उसकी नौकरी और अन्य लंबित कार्यवाहियों को ध्यान में रखते हुए।”
कोर्ट ने बलिया स्थित फैमिली कोर्ट को निर्देश दिया कि यदि ऐसा कोई आवेदन दाखिल किया जाता है तो उस पर गुण-दोष के आधार पर विचार किया जाए। साथ ही स्पष्ट किया कि मुख्य वैवाहिक विवाद के गुण-दोष पर कोर्ट ने कोई टिप्पणी नहीं की है।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: साधना सिंह बनाम मृत्युंजय सिंह
वाद संख्या: ट्रांसफर एप्लीकेशन सिविल संख्या 499/2026
पीठ: जस्टिस डॉ. योगेंद्र कुमार श्रीवास्तव
निर्णय की तिथि: 18 अगस्त 2026

