आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने अनंतपुर स्थित सरकारी ‘शिशुगृह’ में एक महीने के मासूम बच्चे की मौत के मामले में बड़ी कार्रवाई को जायज ठहराया है। अदालत ने देखभाल में लापरवाही की दोषी पाई गईं दो कर्मचारियों, मैनेजर और नर्स, की सेवा समाप्ति के आदेश को बरकरार रखा है। हालांकि, कोर्ट ने मामले में नामजद सोशल वर्कर को राहत देते हुए उनकी बर्खास्तगी रद्द कर दी और प्रशासन को उनके केस पर पुनर्गठन के साथ विचार करने का निर्देश दिया।
जस्टिस न्यापति विजय की एकल पीठ ने 17 अगस्त के फैसले में स्पष्ट किया कि मासूम बच्चों की देखभाल में हुई लापरवाही को बजट की कमी या बकाया वेतन जैसे प्रशासनिक कारणों का हवाला देकर तर्कसंगत नहीं ठहराया जा सकता।
कर्मचारियों के बयानों में विरोधाभास और मौत का कारण
घटना की जांच के लिए गठित तीन सदस्यीय समिति ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि नवजात की मृत्यु संभवतः फेफड़ों में तरल या भोजन फंसने (एस्पिरेशन) के कारण हुई थी। सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पाया कि घटना के वक्त मौजूद कर्मचारियों के बयानों में गंभीर असमानता थी। मैनेजर और नर्स का कहना था कि बच्चा दस्त से पीड़ित था, जबकि एक अन्य कर्मचारी ने दावा किया कि उसी समय बच्चे को उल्टी हुई थी।
अदालत ने इस तथ्य पर भी आश्चर्य व्यक्त किया कि जो बच्चा 2 अक्टूबर 2025 की शाम 7:30 बजे तक पूरी तरह स्वस्थ बताया जा रहा था, उसकी कुछ ही घंटों बाद मृत्यु हो गई। जस्टिस विजय ने टिप्पणी की कि बयानों के इस विरोधाभास से यह विश्वास नहीं बनता कि कर्मचारी निष्पक्ष या लापरवाह नहीं थे। कोर्ट ने रेखांकित किया कि विभागीय और सेवा संबंधी मामलों में पूर्ण प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती, बल्कि संभावनाओं की प्रबलता (प्रेपोंडरेंस ऑफ प्रोबेबिलिटी) ही पर्याप्त आधार होती है।
सोशल वर्कर की जिम्मेदारी और राहत का आधार
सोशल वर्कर की याचिका पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने पाया कि उनकी नियुक्ति जून 2014 में हुई थी और उनका प्राथमिक कार्य क्षेत्र-आधारित (फील्ड ड्यूटी) था। वह एकीकृत बाल विकास सेवा (आईसीडीएस) के परियोजना निदेशक के दिशा-निर्देशों के तहत जिले में गोद लेने की प्रक्रियाओं, जागरूकता अभियानों और चाइल्ड स्टडी रिपोर्ट तैयार करने का काम संभालती थीं।
जांच रिपोर्ट और कर्मचारियों के बयानों से यह साबित नहीं हुआ कि घटना वाली रात उन्हें शिशुगृह में उपस्थित रहने का कोई आदेश दिया गया था। इस कारण हाईकोर्ट ने उनकी बर्खास्तगी का आदेश निरस्त कर दिया।
वेतन और फंड में देरी को बहाना मानने से इनकार
याचिकाकर्ता कर्मचारियों ने अपने बचाव में कहा कि जुलाई 2025 से उनका वेतन बकाया था और अप्रैल 2025 से शिशुगृह का रख-रखाव अनुदान रोक दिया गया था। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि बच्चे की हालत बिगड़ने के समय केंद्र में कोई डॉक्टर तैनात नहीं था।
अदालत ने इन तर्कों को खारिज करते हुए कहा कि प्रशासनिक स्तर पर धन जारी होने में देरी होना आम बात है, लेकिन इसका उपयोग बच्चों के प्रति कर्तव्य में कोताही को सही ठहराने के लिए नहीं किया जा सकता।
मामले की पृष्ठभूमि और घटनाक्रम
यह पूरा मामला 30 अगस्त 2025 का है, जब 30 दिन के एक बालक को अनंतपुर शिशुगृह में सौंपा गया था। उस समय शिशु का वजन लगभग 1.75 किलोग्राम था। 4 सितंबर 2025 को उसे चिकित्सीय जांच और टीकाकरण के लिए सरकारी अस्पताल ले जाया गया था।
1 अक्टूबर 2025 को बच्चे को दस्त की शिकायत हुई, जिस पर उसे ओआरएस घोल दिया गया। अगले दिन 2 अक्टूबर की रात उसकी स्थिति बिगड़ी और 3 अक्टूबर को तड़के 3:20 बजे उसे मृत घोषित कर दिया गया। घटना के बाद जांच समिति की सिफारिशों के आधार पर तीनों कर्मचारियों को कारण बताओ नोटिस जारी कर सेवा से बर्खास्त कर दिया गया था, जिसे उन्होंने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।

