पति की मामूली कमाई से पिता पर निर्भरता खत्म नहीं होती: विवाहित बेटी को अनुकंपा नियुक्ति देने का झारखंड हाईकोर्ट का आदेश

झारखंड हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कोल माइन्स प्रॉविडेंट फंड ऑर्गनाइजेशन को निर्देश दिया है कि वह अपने एक दिवंगत कर्मचारी की शादीशुदा बेटी को आठ सप्ताह के भीतर अनुकंपा के आधार पर नौकरी प्रदान करे। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल वैवाहिक स्थिति के आधार पर किसी बेटी की अनुकंपा नियुक्ति का दावा खारिज नहीं किया जा सकता, बशर्ते यह स्थापित हो जाए कि वह अपने पिता पर ही वित्तीय रूप से निर्भर थी।

जस्टिस दीपक रोशन की पीठ ने 12 अगस्त को जारी अपने आदेश में कहा कि पति की मामूली आय होने का अर्थ यह कतई नहीं है कि महिला अपने दिवंगत पिता पर आश्रित नहीं थी। अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता के पास आय का कोई स्वतंत्र जरिया नहीं है और वह अपनी वृद्ध व बीमार मां के साथ रहकर उनका भरण-पोषण कर रही है। महिला की मां ने अपने दिवंगत पति को अपनी एक किडनी दान की थी, जिसके चलते वह खदानों में शारीरिक श्रम करने में असमर्थ हैं। वहीं, दिवंगत कर्मचारी के दो बेटों ने अपनी मां को वित्तीय सहायता देने से साफ इनकार कर दिया था।

विवाह के आधार पर खारिज किया गया था आवेदन

यह मामला धनबाद स्थित कोयला खदान में सहायक के पद पर कार्यरत अर्जुन प्रसाद के निधन से जुड़ा है। 25 नवंबर 2013 को सेवा के दौरान उनका देहांत हो गया था। उनके परिवार में उनकी पत्नी, एक बेटी और दो बेटे थे। पति के निधन के बाद विधवा पत्नी ने अपनी बेटी को अनुकंपा के आधार पर नौकरी देने का प्रस्ताव रखा था। हालांकि, संगठन ने जुलाई 2017 में यह कहते हुए आवेदन खारिज कर दिया कि बेटी विवाहित है।

इसके खिलाफ बेटी ने 2023 में झारखंड हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। कोर्ट ने उसे नए सिरे से आवेदन देने की छूट दी, लेकिन अवमानना याचिका की सुनवाई के दौरान संगठन ने फरवरी 2024 में एक बार फिर उसका दावा खारिज कर दिया। इसके बाद याचिकाकर्ता ने दोबारा अदालत का रुख किया।

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अदालत में दोनों पक्षों की दलीलें

याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता रत्नेश कुमार ने तर्क दिया कि मां की शारीरिक स्थिति ऐसी नहीं है कि वह खदान में नौकरी कर सकें। उन्होंने कोर्ट को बताया कि पति की बेहद कम कमाई के कारण बेटी शादी के बाद भी अपने पिता पर ही आश्रित थी और वही अपनी मां की देखभाल कर रही है।

दूसरी ओर, संगठन के वकील प्रशांत कुमार सिंह ने दलील दी कि पिता की मृत्यु के समय बेटी पहले से शादीशुदा थी, उसका पति कमाता है और उसके दो भाई भी नौकरीपेशा हैं। इसलिए उसे पिता पर पूरी तरह निर्भर नहीं माना जा सकता।

अदालत का निष्कर्ष और निर्देश

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मामले की सुनवाई के बाद जस्टिस रोशन ने पाया कि दोनों भाई अलग रहते हैं और उन्होंने अपनी मां की जिम्मेदारी लेने से मना कर दिया है। वर्तमान में मां और बेटी खदान से मिलने वाली छोटी सी पेंशन पर ही गुजारा कर रही हैं।

कोर्ट ने कहा कि नियोक्ता संगठन ने इस तथ्य का गलत अर्थ निकाला कि पति की थोड़ी सी आय होने से महिला की पिता पर निर्भरता खत्म हो जाती है। अदालत ने दोहराया कि जब निर्भरता साबित हो चुकी हो, तो केवल शादीशुदा होना हक को नहीं छीन सकता। हाईकोर्ट ने संगठन को नियमानुसार आठ सप्ताह के अंदर बेटी को अनुकंपा नियुक्ति पत्र जारी करने का आदेश दिया।

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