कांचीपुरम मंदिर विवाद: मद्रास हाईकोर्ट ने भगवद्गीता का जिक्र कर कहा- ईश्वर के दरबार में सब समान, भेदभाव की कोई जगह नहीं

कांचीपुरम के प्रसिद्ध अरुलमिगु देवराज स्वामी मंदिर में गैर-ब्राह्मण श्रद्धालुओं के साथ भेदभाव के आरोपों पर सुनवाई करते हुए मद्रास हाईकोर्ट ने कहा है कि ईश्वर की नजर में सभी जीव समान हैं और पूजा स्थलों पर किसी भी तरह के भेदभाव की कोई जगह नहीं है। जस्टिस जी जयचंद्रन और जस्टिस ई मनोहरन की पीठ ने भगवद्गीता के संदेश का हवाला देते हुए मंदिर प्रशासन के उस आश्वासन को रिकॉर्ड पर लिया, जिसमें सभी श्रद्धालुओं के साथ समान व्यवहार की बात कही गई है। इसके साथ ही कोर्ट ने इस जनहित याचिका का निपटारा कर दिया।

भगवद्गीता के श्लोक से समानता का संदेश

17 अगस्त को जारी अपने आदेश में हाईकोर्ट ने श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय 9, श्लोक 29 का उल्लेख किया। कोर्ट ने कहा कि भगवान कृष्ण के अनुसार, “मैं सभी जीवों के प्रति समभाव रखता हूं। मेरे लिए न तो कोई अप्रिय है और न ही प्रिय। लेकिन जो भक्तिभाव से मेरी पूजा करते हैं, वे मुझमें हैं और मैं उनमें हूं।” पीठ ने कहा कि पूर्व के फैसलों में भी अदालतें यह स्पष्ट कर चुकी हैं कि पूजा स्थलों पर किसी भी नागरिक के साथ भेदभाव नहीं किया जा सकता।

भेदभाव के आरोप और याचिकाकर्ता की दलीलें

यह मामला कांचीपुरम के देवराजस्वामी मंदिर के एक भक्त द्वारा दायर जनहित याचिका से जुड़ा है, जो थेनकलै वैष्णव परंपरा का पालन करते हैं। याचिकाकर्ता की ओर से पेश अधिवक्ता एस षणमुगसुंदरम और एस सेथिलनाथन ने आरोप लगाया कि मंदिर परिसर स्थित श्री मणवल मामुनिगल गर्भगृह में गैर-ब्राह्मणों को मुख्य द्वार के बजाय बगल के दरवाजे से प्रवेश कराया जाता था, जबकि ब्राह्मण श्रद्धालुओं को मुख्य द्वार से जाने की अनुमति थी। इसके अलावा, गैर-ब्राह्मण श्रद्धालुओं को गर्भगृह के भीतर मंत्र या स्तोत्र पाठ करने से रोका जाता था और उन्हें प्रसादम तथा तीर्थम लेने के लिए बाहर खड़ा रखा जाता था।

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स्थान की कमी को बताया वजह

मंदिर प्रशासन और राज्य सरकार का पक्ष रखते हुए विशेष सरकारी वकील आर भरणीधरण ने भेदभाव के आरोपों का खंडन किया। उन्होंने पीठ को बताया कि मंदिर के उप-गर्भगृह आकार में काफी छोटे हैं, जहां पूजा और सेवा के समय आम जनता को भीतर खड़ा रखना व्यावहारिक रूप से असंभव है। सरकारी वकील ने स्पष्ट किया कि इन छोटे स्थानों में मंदिर के आधिकारिक विद्वान और पाठ्यकर्ता भी बमुश्किल समा पाते हैं, इसीलिए श्रद्धालुओं को सेवा के समय बाहर रहना पड़ता है। उन्होंने कोर्ट को आश्वस्त किया कि मंदिर प्रबंधन सभी श्रद्धालुओं के साथ पूरी तरह समान व्यवहार करता है।

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मंत्र पाठ के अधिकार पर हाईकोर्ट का रुख

धार्मिक भजनों और प्रबंधम के पाठ के मुद्दे पर हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि ‘अध्यापक मिसरी’ (Adhyabaga Misari) सेवा को छोड़कर—जो थेनकलै संप्रदाय के लिए एक अधिकार है—किसी भी श्रद्धालु या समूह को मंदिर के विभिन्न गर्भगृहों में स्तोत्र पाठ करने से नहीं रोका जाएगा। कोर्ट ने माना कि वर्तमान व्यवस्था से याचिकाकर्ता और अन्य श्रद्धालुओं को पाठ करने का अवसर मिलता है और इससे पारंपरिक रीति-रिवाजों पर भी कोई असर नहीं पड़ता। मंदिर प्रशासन के आश्वासनों को दर्ज करते हुए हाईकोर्ट ने बिना कोई नया निर्देश जारी किए याचिका का निपटारा कर दिया।

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