कर्नाटक हाईकोर्ट ने एक 28 वर्षीय व्यक्ति के खिलाफ दर्ज दुष्कर्म के मामले को खारिज करने से साफ इनकार कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि शारीरिक संबंध सहमति से बने थे या जबरन बनाए गए थे, यह एक विवादित तथ्य है और इसका फैसला केवल मुकदमे की सुनवाई (ट्रायल) के दौरान ही हो सकता है।
जस्टिस एम. नागप्रसन्ना ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि यह मामला दोनों पक्षों के बीच लंबे समय से चले आ रहे संबंधों या बार-बार सहमति से बनाए गए शारीरिक संबंधों का नहीं है। अदालत के अनुसार, 19 अप्रैल से 21 अप्रैल 2024 के बीच केवल एक बार की घटना हुई थी। ऐसे में सहमति दी गई थी या दबाव बनाकर ली गई थी, यह पूरी तरह से साक्ष्य और सबूतों का विषय है। याचिकाकर्ता को पूर्ण ट्रायल के माध्यम से ही यह साबित करना होगा कि यह दुष्कर्म का अपराध है या नहीं।
हाईकोर्ट नहीं कर सकता विवादित तथ्यों पर निर्णय
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि यदि दोनों के बीच बार-बार सहमति से शारीरिक संबंध बने होते तो परिस्थितियां अलग होतीं। अदालत भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 528 या सीआरपीसी (CrPC) की धारा 482 के तहत अपने विशेषाधिकार का इस्तेमाल करते हुए उन विवादित तथ्यों पर फैसला नहीं सुना सकती, जिनके लिए साक्ष्य की आवश्यकता होती है।
होटल रूम से शुरू हुआ पूरा विवाद
मामले की पृष्ठभूमि के अनुसार, शिकायतकर्ता महिला बेंगलुरु में एक मेडिकल कोडर के रूप में काम करती है और आरोपी व्यक्ति उसका पूर्व वरिष्ठ (सीनियर) तथा मित्र है। आरोपी 19 अप्रैल 2024 को चेन्नई से बेंगलुरु आया और उसने एक होटल में कमरा बुक किया, जहां दोनों 21 अप्रैल तक ठहरे। महिला का आरोप है कि इस दौरान उनके बीच शारीरिक संबंध बने, जो उसकी सहमति के बिना थे।
महिला ने 1 मई 2024 को पुलिस में औपचारिक शिकायत दर्ज कराई। इसके बाद पुलिस ने भारतीय दंड संहिता (IPC) की दुष्कर्म से जुड़ी धारा के तहत मामला दर्ज कर आरोप पत्र (चार्जशीट) दाखिल किया।
शादी के वादे और सहमति पर आमने-सामने दोनों पक्ष
अदालत में दायर याचिका में आरोपी ने दावा किया था कि उनके बीच के संबंध पूरी तरह सहमति पर आधारित थे और वे केवल “फ्रेंडशिप विद बेनिफिट्स” के रिश्ते में थे। उसके वकील ने तर्क दिया कि महिला उससे शादी करना चाहती थी, लेकिन उसने पहले ही साफ कर दिया था कि उसकी शादी करने की कोई मंशा नहीं है।
दूसरी ओर, शिकायतकर्ता महिला ने इस दावे का खंडन करते हुए कहा कि आरोपी ने शादी का झूठा वादा करके उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए और बाद में मुकर गया। महिला के अनुसार, शादी के वादे के टूटने के कारण यह संबंध बिना सहमति के माना जाएगा। हाईकोर्ट ने माना कि दोनों पक्षों के इन परस्पर विरोधी बयानों की सत्यता की जांच केवल नियमित न्यायिक सुनवाई के दौरान ही की जा सकती है।

