अंधविश्वास विरोधी कार्यकर्ता नरेंद्र दाभोलकर की हत्या के मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे सचिन अंदुरे को बॉम्बे हाईकोर्ट से बड़ी राहत मिली है। अदालत ने मंगलवार को अंदुरे की याचिका स्वीकार करते हुए उसकी उम्रकैद की सजा निलंबित कर दी और उसे जमानत प्रदान की। गोविंद पानसरे हत्या कांड में पहले ही जमानत मिल जाने के कारण अब अंदुरे के जेल से बाहर आने का रास्ता साफ हो गया है।
जस्टिस सारंग कोटवाल और जस्टिस रणजीतसिंहा भोसले की पीठ ने अंदुरे की अंतरिम अर्जी पर यह आदेश सुनाया। पीठ ने स्पष्ट किया कि मामले का विस्तृत लिखित आदेश फिलहाल उपलब्ध नहीं है। इससे पहले, 10 मई 2024 को एक सत्र अदालत ने अंदुरे और उसके साथी शरद कलसकर को दाभोलकर की हत्या का दोषी मानते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी। हालांकि, निचली अदालत ने उन्हें कड़े आतंकवाद विरोधी कानून (यूएपीए) और हथियार कानून के आरोपों से बरी कर दिया था। इसके अलावा, पर्याप्त सबूत न होने के कारण तीन अन्य आरोपियों—वीरेंद्र सिंह तावड़े, संजीव पुनालेकर और विक्रम भावे को पूरी तरह बरी कर दिया गया था।
सजा के खिलाफ अपील और साजिश का आरोप
सत्र अदालत के फैसले के बाद अंदुरे ने अपनी दोषसिद्धि को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी और अंतरिम जमानत के साथ सजा रोकने की मांग की थी। वहीं दूसरी तरफ, दाभोलकर की बेटी मुक्ता दाभोलकर ने भी हाईकोर्ट में याचिका दायर कर रखी है। अपनी अर्जी में उन्होंने कुछ आरोपियों को बरी किए जाने और यूएपीए की धाराएं हटाए जाने के फैसले को चुनौती दी है। मुक्ता दाभोलकर का आरोप है कि यह हत्या दक्षिणपंथी चरमपंथियों द्वारा रची गई एक बड़ी साजिश का हिस्सा थी।
पुणे में सुबह की सैर के दौरान हुई थी हत्या
महाराष्ट्र अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति के संस्थापक 67 वर्षीय नरेंद्र दाभोलकर की 20 अगस्त 2013 को पुणे में उस समय गोली मारकर हत्या कर दी गई थी, जब वे सुबह की सैर पर निकले थे। मोटरसाइकिल पर आए दो हमलावरों ने उन पर गोलियां चलाई थीं। शुरुआत में इस मामले की जांच स्थानीय पुलिस ने की, लेकिन मुक्ता दाभोलकर की याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने 2014 में जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) को सौंप दी। सीबीआई ने ही अंदुरे की पहचान मुख्य शूटरों में से एक के रूप में की थी।
सामाजिक कार्यकर्ताओं की सिलसिलेवार हत्याओं की पहली कड़ी
दाभोलकर की हत्या देश में सामाजिक कार्यकर्ताओं और विचारकों को निशाना बनाकर की गई सिलसिलेवार हत्याओं की पहली घटना थी। इसके बाद फरवरी 2015 में कोल्हापुर में गोविंद पानसरे, अगस्त 2015 में धारवाड़ में कन्नड़ विद्वान एम.एम. कलबुर्गी और सितंबर 2017 में बेंगलुरु में पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या कर दी गई थी।

