गुजरात हाईकोर्ट का आदेश: जीपीएससी को अंक बहाल करने और चयन सूची में शामिल करने का निर्देश

गुजरात हाईकोर्ट ने राज्य लोक सेवा आयोग (GPSC) को कड़ा निर्देश देते हुए सेल्स टैक्स इंस्पेक्टर परीक्षा में एक उम्मीदवार का काटा गया एक अंक वापस करने को कहा है। अदालत ने आयोग की उस उत्तर कुंजी को खारिज कर दिया जो अज्ञात इंटरनेट स्रोतों से डाउनलोड की गई अप्रमाणित सामग्री पर आधारित थी। साथ ही, आयोग द्वारा चार सप्ताह के स्थगन का अनुरोध भी ठुकरा दिया गया। अदालत ने आदेश दिया कि उम्मीदवार आरती रंगपरिया को प्रारंभिक परीक्षा उत्तीर्ण करने वाले अभ्यर्थी की तरह चयन या प्रतीक्षा सूची में शामिल करने के लिए विचार किया जाए। यह राहत विशेष रूप से केवल रंगपरिया तक ही सीमित है, जिन्होंने कानूनी प्रक्रिया के दौरान अलग से मुख्य परीक्षा भी पास कर ली थी।

प्रारंभिक परीक्षा और प्रश्न संख्या 147 का विवाद

यह पूरा मामला 22 दिसंबर, 2024 को आयोजित क्लास-III सेल्स टैक्स इंस्पेक्टर प्रारंभिक परीक्षा से जुड़ा है। आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) श्रेणी की उम्मीदवार आरती रंगपरिया ने प्रश्न पत्र सीरीज बी के तहत परीक्षा दी थी। उन्हें 94.36 अंक मिले थे, जो मुख्य परीक्षा के लिए निर्धारित 95.59 के कट-ऑफ से 1.23 अंक कम थे। कानूनी चुनौती का केंद्र प्रश्न संख्या 147 था, जिसमें कौटिल्य के अर्थशास्त्र के बारे में दो कथन थे—पहला यह कि यह संस्कृत में लिखा गया था, और दूसरा यह कि यह अर्थशास्त्र पर एक पुस्तक है। आयोग की अंतिम उत्तर कुंजी में केवल पहले कथन को सही माना गया। रंगपरिया का तर्क था कि दोनों कथन सही हैं और उन्होंने इसके लिए विकल्प सी चुना था।

अस्पष्ट स्रोत और प्रमाणीकरण नीति का अभाव

मार्च से जुलाई 2026 के बीच चली आठ सुनवाइयों में अदालत ने इस बात की गहराई से जांच की कि यह प्रश्न कैसे तैयार किया गया था। पेपर-सैटर्स ने स्वीकार किया कि उन्होंने किसी अज्ञात ऑनलाइन स्रोत से डाउनलोड की गई पीडीएफ का इस्तेमाल किया था और मूल भौतिक संस्करण उपलब्ध नहीं था। आयोग ने बाद में हलफनामे में माना कि उसके पास पेपर-सैटर्स या उम्मीदवारों द्वारा उपयोग की जाने वाली संदर्भ सामग्री को प्रमाणित करने के लिए कोई लिखित नीति नहीं है। याचिकाकर्ता की वरिष्ठ अधिवक्ता मेघा जैन ने बताया कि आयोग के न्यायालयीन सबमिशन में अमेज़ॅन और स्लाइड्सशेयर जैसी व्यावसायिक वेबसाइटों के माध्यम से आर. शमाशास्त्री द्वारा 1915 के अनुवाद का हवाला दिया गया था, जिसमें कोई सत्यापित प्रकाशक या तारीख नहीं थी। वहीं, सरकारी वकील जी.एच. विर्क ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए विशेषज्ञ-सत्यापित उत्तर कुंजियों पर न्यायिक संयम बरतने की दलील दी थी।

अदालत के अवलोकन और निर्देश

याचिकाकर्ता ने गुजरात राज्य बोर्ड, जीसीईआरटी और एनसीईआरटी की कक्षा 11 की अर्थशास्त्र की पाठ्यपुस्तकों का हवाला दिया था, जो कौटिल्य के आर्थिक सिद्धांतों को रेखांकित करती हैं। फैसले में न्यायमूर्ति निरजार देसाई ने रेखांकित किया कि कौटिल्य का मूल ग्रंथ स्वयं को 15 पुस्तकों में फैले एक संग्रह के रूप में वर्णित करता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि सामान्य ज्ञान की परीक्षाओं में अनधिकृत इंटरनेट डाउनलोड से उत्पन्न होने वाली किसी भी अस्पष्टता का लाभ परीक्षा एजेंसी के बजाय परीक्षार्थियों को मिलना चाहिए। अदालत ने यह भी कहा कि 111 साल पुराने संस्करण की मूल प्रति के बिना उसकी पीडीएफ खोजने की उम्मीद करना पूरी तरह से अनुचित था।

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