जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख हाईकोर्ट ने घटिया दवा के निर्माण और वितरण से जुड़े एक मामले में अहमदाबाद की दवा निर्माता कंपनी ‘कोरोना रेमेडीज प्राइवेट लिमिटेड’ के तीन निदेशकों के खिलाफ दायर आपराधिक मामले को रद्द करने से इनकार कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत नागरिकों को मिलने वाला जीवन का अधिकार तभी सार्थक है, जब उन्हें गुणवत्तापूर्ण और सुरक्षित दवाएं मिलें।
जीवन के अधिकार से जुड़ा है गुणवत्तापूर्ण दवाओं का मामला
जस्टिस वासिम सादिक नरगल ने कंपनी के निदेशकों अंकुर कीर्तिकुमार मेहता, डॉ. कीर्तिकुमार लक्ष्मीदास मेहता और नीरव कीर्तिकुमार मेहता की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने अपने खिलाफ चल रही निचली अदालत की कार्यवाही को चुनौती दी थी। 11 अगस्त को जारी अपने आदेश में हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि हर नागरिक को उपभोक्ता के रूप में यह उम्मीद करने का अधिकार है कि बाजार में मिलने वाली दवाएं निर्धारित गुणवत्ता और सुरक्षा मानकों के अनुरूप हों। अदालत के अनुसार, मानक पर खरी न उतरने वाली दवाओं का सीधा असर जनस्वास्थ्य पर पड़ता है, जो संवैधानिक रूप से जीवन की सुरक्षा के अधिकार को प्रभावित करता है।
परीक्षण में अमानक पाई गई थी ‘लोसिपिल’ टैबलेट
यह पूरा मामला सितंबर 2015 में बनी और मई 2018 की एक्सपायरी तिथि वाली ‘लोसिपिल’ टैबलेट के एक बैच से जुड़ा है। केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (CDSCO) के ड्रग्स इंस्पेक्टर ने जम्मू के बाड़ी ब्राह्मणा स्थित ईएसआईसी मॉडल अस्पताल से इस दवा का सैंपल लिया था। चंडीगढ़ स्थित क्षेत्रीय औषधि परीक्षण प्रयोगशाला द्वारा 31 अगस्त 2016 को जारी जांच रिपोर्ट में इस दवा को ‘मानक गुणवत्ता का नहीं’ घोषित किया गया था।
इसके बाद, मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM) जम्मू ने 26 जुलाई 2018 को औषधि एवं प्रसाधन सामग्री अधिनियम, 1940 की धारा 18(a)(i) और धारा 27(d) के तहत संज्ञान लेते हुए कंपनी के निदेशकों के खिलाफ समन जारी किए थे।
जिम्मेदारी का निर्धारण मुकदमे की सुनवाई के दौरान होगा
याचिकाकर्ता निदेशकों ने अदालत में तर्क दिया था कि वे दवा के निर्माण की प्रक्रिया में सीधे तौर पर शामिल नहीं थे और यह काम तकनीकी कर्मचारियों द्वारा संभाला जाता था। इसलिए केवल पद के आधार पर उन्हें आपराधिक रूप से जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। उन्होंने 4 नवंबर 2016 की एक संयुक्त निरीक्षण रिपोर्ट का भी हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि दवा ‘गुड मैन्युफैक्चरिंग प्रैक्टिस’ (GMP) के तहत बनाई गई थी।
हालांकि, हाईकोर्ट ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि कानून की धारा 34 के तहत यह साबित करना कि कौन सा निदेशक कंपनी के कामकाज के लिए जिम्मेदार था, साक्ष्यों का विषय है। इसे शुरुआती स्तर पर याचिका के आधार पर तय नहीं किया जा सकता। अपने फैसले में हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के दो प्रमुख निर्णयों—’दिनेश बी पटेल बनाम गुजरात राज्य’ और 2026 के निर्णय ‘केरल राज्य बनाम मैसर्स पैनासिया बायोटेक लिमिटेड’—का हवाला दिया। सुप्रीम कोर्ट ने इन मामलों में स्पष्ट किया था कि जनस्वास्थ्य से जुड़े मामलों में तकनीकी आधार पर शुरुआती चरण में केस रद्द नहीं किया जाना चाहिए।
कंपनी के पुराने जवाब से लागू हुआ विबंधन का सिद्धांत
सुनवाई के दौरान अदालत ने सितंबर 2016 के कारण बताओ नोटिस पर कंपनी द्वारा 3 नवंबर 2016 को दिए गए जवाब को बेहद अहम माना। अपने जवाब में कोरोना रेमेडीज ने कहा था कि उसने संबंधित बैच की बिक्री रोक दी है, उसके पास कोई स्टॉक नहीं बचा है और उसने लैब रिपोर्ट के निष्कर्षों को स्वीकार करते हुए उदार रुख अपनाने का अनुरोध किया था।
जस्टिस नरगल ने टिप्पणी की कि चूंकि कंपनी ने उस समय प्रयोगशाला के नतीजों को चुनौती नहीं दी थी, इसलिए ‘आचरण द्वारा विबंध’ (Estoppel by conduct) के कानूनी सिद्धांत के तहत निदेशक बाद में शिकायत को चुनौती देने के हकदार नहीं रह जाते।
निचली अदालत में दोबारा शुरू होगी सुनवाई
इसके साथ ही हाईकोर्ट ने प्रक्रियात्मक खामियों (अधिनियम की धारा 23 और 25) के आधार पर केस रद्द करने की मांग को भी यह कहते हुए खारिज कर दिया कि यह मामला मुकदमे के दौरान देखा जा सकता है। अदालत ने 3 मई 2019 को ट्रायल कोर्ट की कार्यवाही पर लगाई गई अंतरिम रोक को हटा दिया और मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट जम्मू को मामले की स्वतंत्र रूप से सुनवाई करने का निर्देश दिया। हाईकोर्ट ने यह भी साफ किया कि उसने निदेशकों के दोषी या निर्दोष होने पर कोई राय व्यक्त नहीं की है।

