सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस जे. बी. पारडीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने वर्ष 2006 के एक मामले में दो पुरुषों की हत्या की दोषसिद्धि को रद्द कर दिया। कोर्ट ने अपने निर्णय में स्पष्ट किया कि मामले के साक्ष्य पूर्व-नियोजित हत्या के बजाय दुर्घटनावश डूबने की ओर मजबूत इशारा करते हैं। ट्रायल कोर्ट और गुजरात हाईकोर्ट के फैसलों को पलटते हुए शीर्ष अदालत ने माना कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में पूरी तरह विफल रहा कि यह एक हत्या थी, न ही वह संदेह से परे परिस्थितियों की कोई निर्विवाद श्रृंखला स्थापित कर सका।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला 17 जुलाई 2006 का है, जब अपीलकर्ता—ताहेर वजिउद्दीन रंगवाला और एक अन्य व्यक्ति—अपने एक दोस्त को सुबह-सुबह अंकलेश्वर में वॉलीबॉल खेलने के बहाने उसके घर से ले गए थे। जब मृतक शाम तक वापस नहीं लौटा, तो उसके परिवार ने तलाश शुरू की। संपर्क करने पर दूसरे अभियुक्त ने शुरुआत में दावा किया कि वह सिनेमा हॉल में फिल्म देख रहा था और उसने मृतक को दोपहर में ही सहरा दरवाजा पर छोड़ दिया था।
उसी दिन बाद में, स्थानीय निवासियों को नदी के किनारे गीले कपड़े मिले, जिन्हें मृतक के भाई ने पहचान लिया। इसके बाद दोनों अभियुक्त स्वेच्छा से मृतक के घर पहुंचे और एक कार के भीतर मृतक के भाई के सामने स्वीकार किया कि वे सभी नदी में तैरने गए थे, जहां मृतक गलती से डूब गया। डर और घबराहट के कारण वे मौके से भाग गए और फिल्म देखने चले गए।
अगली सुबह 18 जुलाई 2006 को मृतक का शव बरामद हुआ। पोस्टमाॉर्टम रिपोर्ट में मौत का कारण “डूबने से श्वासरोध (अस्फीक्सिया) के कारण कार्डियो-रेस्पिरेटरी अरेस्ट” बताया गया। घटना जुलाई 2006 में हुई थी, लेकिन हत्या और रंजिश का आरोप लगाते हुए प्रथम सूचना बयान (एफआईएस) लगभग चार महीने बाद, 3 नवंबर 2006 को दर्ज कराया गया था।
ट्रायल कोर्ट ने दोनों अभियुक्तों को भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 302, 34, 201 और 120बी के तहत दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी, जिसे बाद में गुजरात हाईकोर्ट ने भी बरकरार रखा था।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ वकील ने तर्क दिया कि यह मामला अधिक से अधिक तैरने के दौरान हुई एक दुखद दुर्घटना का था। उन्होंने कहा कि हत्या का कोई सबूत नहीं है, चार महीने की देरी के कारण गढ़ा गया कथित मकसद संदिग्ध है, और मृतक के शरीर पर लगी चोटें नदी के तेज बहाव में पत्थरों से टकराने या पानी में छलांग लगाने से आई चोटों के अनुकूल हैं।
दूसरी ओर, राज्य सरकार के वकील ने दोषसिद्धि का बचाव करते हुए कहा कि घटना से पहले अभियुक्तों ने सोडा की चार बोतलें खरीदी थीं और लौटते समय केवल तीन बोतलें वापस की थीं। राज्य का दावा था कि अभियुक्तों ने सोडा की टूटी हुई बोतल से मृतक के सिर पर वार किया और फिर उसे नदी में डुबो दिया।
सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण
मेडिकल और परिस्थितिजन्य साक्ष्यों का मूल्यांकन करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट और डॉक्टर (दवा गवाह-1) की गवाही से यह साबित नहीं होता कि यह हत्या थी। मृतक के माथे, आंख-कान के पास और हसली (क्लेविकल) पर पाई गई तीन मामूली चोटें नदी में कूदने या पानी के तेज बहाव में कठोर व नुकीले पत्थरों से टकराने के कारण आ सकती थीं।
पीठ ने ध्यान दिलाया कि जिरह के दौरान डॉक्टर के सामने कोई टूटी हुई बोतल पेश नहीं की गई थी, और न ही फॉरेंसिक जांच के लिए घटना स्थल से कांच का कोई खून से सना टुकड़ा जब्त करके भेजा गया था।
कथित मकसद—मृतक का अभियुक्त की बहन के साथ संबंध और क्रिकेट मैच को लेकर हुआ पुराना विवाद—पर कोर्ट ने माना कि चार महीने की देरी के बाद दर्ज एफआईआर के कारण यह कहानी बाद में सोच-समझकर गढ़ी गई प्रतीत होती है। कोर्ट ने यह भी नोट किया कि परिवार ने मृतक को अभियुक्तों के साथ स्वेच्छा से जाने दिया था, जो उस समय उनके बीच अच्छे संबंधों को दर्शाता है।
घटनास्थल के संबंध में कोर्ट ने साक्ष्यों के आधार पर कहा कि नदी का किनारा एक सार्वजनिक स्थान था जहां चरवाहे, मजदूर और मछुआरे आते-जाते रहते थे। ऐसे में दिन के उजाले में पूर्व-नियोजित हत्या के लिए उस जगह का चयन करना अत्यधिक अप्रत्याशित है। इसके अलावा, जिन दुकानदारों ने अदालत में अभियुक्तों की पहचान की थी, उनका ‘टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड’ (टीआईपी) नहीं कराया गया था, जिससे उनकी पहचान अविश्वसनीय हो जाती है।
घटना के बाद अभियुक्तों के भागने और फिल्म देखने जाने के आचरण का मूल्यांकन करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा:
“मानव मन, जैसा कि इस अदालत ने अक्सर माना है, एक ही समय में चंचल, हेरफेर करने वाला और कल्पनाशील होता है और इसके कार्य, विशेष रूप से विपत्तियों का सामना करने पर, एक विकृत या मूर्खतापूर्ण मानसिकता का परिणाम होते हैं, जिनका अनुमान नहीं लगाया जा सकता।”
कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि यद्यपि अभियुक्तों का मदद न मांगना और फिल्म देखने चले जाना अनुचित आचरण था, लेकिन यह हत्या का अपराध सिद्ध करने वाली कोई आपराधिक परिस्थिति नहीं बन जाता।
“निर्दोषता की परिकल्पना पूरी तरह से स्पष्ट है, और परिस्थितियां एक दुर्घटना की ओर इशारा करती हैं, न कि पूर्व-नियोजित हत्या की ओर।”
कोर्ट का निर्णय
दोषसिद्धि को बनाए रखने के लिए कोई ठोस साक्ष्य न पाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार कर ली। शीर्ष अदालत ने ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट के फैसलों को रद्द करते हुए दोनों अभियुक्तों को सभी आरोपों से बरी कर दिया और उन्हें हिरासत से तुरंत रिहा करने का निर्देश दिया।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: ताहेर वजिउद्दीन रंगवाला एवं अन्य बनाम गुजरात राज्य
वाद संख्या: आपराधिक अपील संख्या 76/2020
पीठ: जस्टिस जे. बी. पारडीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन
निर्णय की तिथि: 13 अगस्त 2026

