आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के जस्टिस रवि नाथ तिलहरी और जस्टिस पुरुषोत्तम कुमार चिंतालापुडी की खंडपीठ ने स्पष्ट किया है कि यदि माता-पिता के बीच आपसी सहमति से हुए समझौता ज्ञापन (एमओयू) के तहत नाबालिग बच्चों की कस्टडी पूरी तरह पिता को सौंपी गई हो, तो पिता के पास बच्चों की कस्टडी को गैरकानूनी या अवैध नहीं माना जा सकता। ऐसी स्थिति में मां द्वारा दाखिल की गई हैबियस कॉर्पस (बंदी प्रत्यक्षीकरण) याचिका विचारणीय नहीं है। अदालत ने एमओयू और पूर्व कानूनी कार्यवाहियों के महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाने के लिए याचिकाकर्ता मां की रिट याचिका को खारिज करते हुए उस पर 50,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला हाईकोर्ट में 28 जून 2026 की तिथि वाले एक पत्र के आधार पर दर्ज की गई स्वप्रेरणा रिट याचिका (रिट याचिका संख्या 18034/2026) से संबंधित है। याचिकाकर्ता महिला ने हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को भेजे पत्र में आरोप लगाया था कि उसका पति राजमहेंद्रवरम सीआईडी पुलिस द्वारा दर्ज एक आपराधिक मामले (क्राइम नंबर 22/2024) में आरोपी है। उसने दावा किया था कि पुलिस जांच और कानूनी कार्रवाई से भागने के प्रयास में उसका पति उसके दो नाबालिग बेटों को उसकी कस्टडी से जबरन और गैरकानूनी तरीके से छीनकर ले गया है। महिला ने मानसिक पीड़ा और बच्चों की सुरक्षा की आशंका जताते हुए हाईकोर्ट से हैबियस कॉर्पस रिट जारी कर बच्चों को तलाशने और कस्टडी बहाल करने की गुहार लगाई थी।
तथ्य छिपाने और पिछली कानूनी कार्यवाही का खुलासा
मामले की सुनवाई के दौरान राज्य सरकार के सहायक सरकारी वकील जे. कृष्णा प्रणीत ने प्रकाश नगर पुलिस स्टेशन, राजमहेंद्रवरम के थाना प्रभारी से प्राप्त लिखित निर्देशों के आधार पर अदालत को सूचित किया कि पति ने पूर्व में तेलंगाना हाईकोर्ट के समक्ष भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस), 2023 की धारा 528 के तहत एक आपराधिक याचिका (क्रिमिनल पिटीशन नंबर 9564/2025) दाखिल की थी।
वह याचिका साइबरबाद के डब्ल्यूपीएस-आईटी कॉरिडोर पुलिस स्टेशन में दर्ज एफआईआर (भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 85 और 115(2) तथा दहेज निषेध अधिनियम, 1961 की धारा 3 व 4) को रद्द कराने के लिए थी, जिसमें महिला को प्रतिवादी संख्या 3 बनाया गया था। तेलंगाना हाईकोर्ट ने 18 सितंबर 2025 को उस याचिका को स्वीकार करते हुए पति के खिलाफ दर्ज एफआईआर रद्द कर दी थी।
तेलंगाना हाईकोर्ट के फैसले के रिकॉर्ड से यह बात सामने आई कि दोनों पक्षों ने 26 मार्च 2025 को आपसी सहमति से विवाह विच्छेद के लिए एक समझौता ज्ञापन (एमओयू) निष्पादित किया था। एमओयू के बिंदु संख्या 4 में यह स्पष्ट रूप से तय किया गया था कि दोनों नाबालिग बच्चों की कस्टडी और देखभाल पूरी तरह पिता के पास ही रहेगी। इसके अलावा, एमओयू में 10,00,000 रुपये के वित्तीय निपटान का प्रावधान था, जिसके तहत महिला को किस्तों में भुगतान और 12 महीनों के लिए 30,000 रुपये प्रतिमाह भरण-पोषण भत्ता दिया जाना तय हुआ था।
तेलंगाना हाईकोर्ट के रिकॉर्ड से यह भी खुलासा हुआ कि महिला ने एक अन्य व्यक्ति के खिलाफ बीएनएस की धारा 64(2)(m) और 318(4) के तहत एफआईआर दर्ज कराई थी, जिसमें उसने स्वीकार किया था कि वह उस व्यक्ति के साथ संबंध में थी। तेलंगाना हाईकोर्ट ने आपराधिक कार्यवाही को रद्द करते हुए सुप्रीम कोर्ट के दारा लक्ष्मी नारायण बनाम तेलंगाना राज्य (2025) 2 SCC 735 के फैसले का हवाला दिया था, जिसमें कहा गया था कि विशिष्ट आरोपों के अभाव में आपराधिक कार्यवाही जारी रखना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग है।
इन तथ्यों का संज्ञान लेते हुए आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने 23 जुलाई 2026 को पति (प्रतिवादी संख्या 5) और प्रकाश नगर थाना प्रभारी (प्रतिवादी संख्या 6) को पक्षकार बनाने तथा बच्चों को अदालत में पेश करने का निर्देश दिया था।
अदालत में याचिकाकर्ता का आचरण
28 जुलाई 2026 की सुबह की सुनवाई में महिला व्यक्तिगत रूप से पेश हुई और उसने अपनी क्षेत्रीय भाषा में कहा कि वह अंग्रेजी भाषा नहीं समझती और न ही पढ़ सकती है, यहां तक कि उसके व्हाट्सएप पर भेजा गया कोर्ट का पिछला आदेश भी वह नहीं पढ़ सकी। इसके बाद, पीठ ने आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट लीगल सर्विसेज कमेटी के सचिव को महिला की सहायता के लिए एक महिला लीगल एड वकील नियुक्त करने का अनुरोध किया। अदालत ने अधिवक्ता शांति श्री वल्लभनेनी को उसकी ओर से पेश होने के लिए नियुक्त किया।
हालांकि, जब दोपहर के सत्र में सुनवाई दोबारा शुरू हुई, तो महिला अपनी नियुक्त वकील के साथ उपस्थित हुई और उसने न्यायाधीशों के समक्ष अंग्रेजी में एमओयू को धाराप्रवाह पढ़ा। उसने 26 मार्च 2025 के एमओयू और 18 सितंबर 2025 के तेलंगाना हाईकोर्ट के आदेश की प्रतियां भी सीधे अपनी वकील को सौंपीं। जब कोर्ट ने उससे पूछा कि उसने अपने शुरुआती पत्र में इन महत्वपूर्ण दस्तावेजों को क्यों छिपाया, तो उसने कहा कि उसने इन्हें उजागर करना प्रासंगिक नहीं समझा। उसने यह भी स्वीकार किया कि वह वित्तीय निपटान के तहत अपने पति से 5,00,000 रुपये की राशि पहले ही प्राप्त कर चुकी है।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और निष्कर्ष
हाईकोर्ट की खंडपीठ ने माना कि चूंकि एमओयू के तहत बच्चों की कस्टडी आपसी सहमति से पिता को सौंपी गई थी, इसलिए बच्चों को किसी भी अवैध हिरासत में नहीं कहा जा सकता।
हाईकोर्ट ने टिप्पणी की: “एक बार जब याचिकाकर्ता और पांचवें प्रतिवादी के बीच यह आपसी सहमति बन गई कि बच्चों की कस्टडी पूरी तरह से पति के पास ही रहेगी, तो बच्चों को पांचवें प्रतिवादी-पिता की किसी गैरकानूनी हिरासत में नहीं माना जा सकता।”
यह रेखांकित करते हुए कि गलत तथ्यों के आधार पर पूरी न्यायिक मशीनरी को गुमराह किया गया, अदालत ने कहा: “हैबियस कॉर्पस याचिका बनाए रखने योग्य नहीं है। याचिकाकर्ता ने महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाकर इस अदालत की प्रक्रिया का दुरुपयोग किया है।”
हालांकि महिला ने सुनवाई के दौरान अदालत में माफी मांगी, लेकिन पीठ ने उसे स्वीकार करने से इनकार कर दिया और कहा: “हम प्रभावित नहीं हैं। यह ऐसा मामला नहीं है जहां माफी स्वीकार की जाए।”
अदालत का निर्णय और निर्देश
हाईकोर्ट ने रिट याचिका को खारिज कर दिया और महिला पर 50,000 रुपये का हर्जाना लगाया, जिसे तीन सप्ताह के भीतर हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार (न्यायिक) के पास जमा कराने का आदेश दिया गया।
रजिस्ट्रार (न्यायिक) को निर्देश दिया गया कि यह राशि जमा होने पर इसे किसी राष्ट्रीयकृत बैंक में दोनों नाबालिग बच्चों के नाम 25,000-25,000 रुपये की बराबर सावधि जमा (एफडी) में निवेश किया जाए, जो उनके बालिग होने पर देय होगी।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: इन री… वासभक्तुला स्वाति बनाम आंध्र प्रदेश राज्य और अन्य
वाद संख्या: रिट याचिका संख्या 18034/2026
पीठ: जस्टिस रवि नाथ तिलहरी और जस्टिस पुरुषोत्तम कुमार चिंतालापुडी
निर्णय की तिथि: 28 जुलाई 2026

