जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने आतंकवादियों की धमकियों के डर से ड्यूटी पर न लौटने वाले एक पूर्व स्पेशल पुलिस ऑफिसर (SPO) की बर्खास्तगी के खिलाफ दायर याचिका खारिज कर दी है। याचिका को अस्वीकार करते हुए जस्टिस संजय धर ने टिप्पणी की कि यदि किसी भी स्तर का पुलिस अधिकारी या जवान आतंकियों से डरकर ड्यूटी पर आने से इनकार कर दे, तो इस देश को केवल भगवान ही बचा सकता है। 10 अगस्त को दिए अपने आदेश में अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता द्वारा काम पर न आने के लिए दिया गया तर्क पूरी तरह से अमान्य है और उसे सेवा से हटाने का फैसला बिल्कुल सही है।
एसपीओ के अधिकारों और कानूनी प्रावधानों पर रुख साफ
हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता के उन दावों को खारिज कर दिया जिनमें उसने बिना जांच, आरोप पत्र या सुनवाई का अवसर दिए बिना सेवा समाप्त किए जाने को चुनौती दी थी। याचिकाकर्ता का तर्क था कि यह कार्रवाई संविधान के अनुच्छेद 16, 21 और 311 के अलावा जम्मू-कश्मीर पुलिस नियमों के नियम 359 का उल्लंघन है, जो बर्खास्तगी से पहले कारण बताओ नोटिस देने की शर्त रखता है। उसने पुलिस अधिनियम की धारा 19 का हवाला देते हुए यह भी कहा था कि एसपीओ को सामान्य पुलिस अधिकारियों के समान ही शक्तियां, विशेषाधिकार और सुरक्षा प्राप्त हैं।
हालांकि, हाईकोर्ट ने इन तर्कों को बेबुनियाद करार देते हुए स्पष्ट किया कि एसपीओ का पद किसी वैधानिक नागरिक सेवा (सिविल पोस्ट) के तहत नहीं आता। अदालत ने कहा कि एसपीओ की नियुक्ति की विशेष प्रकृति को देखते हुए उन्हें सेवा समाप्ति से पहले किसी औपचारिक जांच या सुनवाई का अधिकार नहीं है। जस्टिस धर ने कहा कि जब याचिकाकर्ता ने खुद यह स्वीकार कर लिया है कि वह आतंकियों के खौफ से काम पर नहीं आ रहा था, तो ऐसे में उसे पक्ष रखने का मौका देना महज एक औपचारिकता ही होता।
मामले का घटनाक्रम
याचिकाकर्ता को वर्ष 2012 में एसपीओ के रूप में नियुक्त किया गया था। याचिका के अनुसार, वह 2015 में घाटी में भड़की अशांति के दौरान मेडिकल लीव (चिकित्सा अवकाश) पर गया था। इस दौरान उसे आतंकवादी संगठनों से जान से मारने की धमकियां मिलीं, जिसके बाद वह डर के कारण अपनी तैनाती स्थल पर वापस नहीं लौटा। बाद में जब उसने काम पर लौटने का प्रयास किया, तो प्रशासन ने उसे जॉइन कराने से इनकार कर दिया।
प्रशासनिक स्तर पर अपील खारिज होने के बाद उसने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। वर्ष 2025 में हाईकोर्ट ने जम्मू-कश्मीर के पुलिस महानिदेशक (DGP) को उसकी अर्जी पर विचार कर स्पष्ट आदेश जारी करने का निर्देश दिया था। पुलिस प्रमुख द्वारा दोबारा सेवा में लेने की मांग खारिज किए जाने के बाद याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट में नई याचिका दायर की थी, जिसे अब अदालत ने अंतिम रूप से खारिज कर दिया है।

