सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्र और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की पीठ ने स्पष्ट किया है कि मकान मालिक और किरायेदार के बीच केवल बिक्री का समझौता (एग्रीमेंट टू सेल) हो जाने मात्र से उनका किरायेदारी का रिश्ता अपने आप खत्म नहीं हो जाता। किरायेदार की याचिका खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने माना कि किरायेदारी तभी समाप्त मानी जाएगी जब समझौते की शर्तों या दोनों पक्षों के बर्ताव से ट्रांसफर ऑफ प्रॉपर्टी एक्ट, 1882 की धारा 111 के तहत स्पष्ट या अप्रत्यक्ष रूप से किरायेदारी छोड़ने (सरेंडर) का प्रमाण मिले। इसके साथ ही, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि 2001 के रजिस्ट्रेशन एक्ट संशोधन के बाद निष्पादित एक अनरजिस्टर्ड (गैर-पंजीकृत) एग्रीमेंट टू सेल किरायेदार को ट्रांसफर ऑफ प्रॉपर्टी एक्ट की धारा 53A के तहत कोई कानूनी सुरक्षा नहीं दे सकता।
मामले की पूरी कहानी
यह विवाद पुणे के कोंढवा खुर्द स्थित मीठा नगर में मकान नंबर 3031 के भूतल पर बनी 200 वर्ग फुट की एक दुकान का है। मूल मकान मालिक जैनबी मुश्ताक शेख ने यह दुकान नाज़िम शेख हसन (किरायेदार) को 1,500 रुपये प्रति माह के किराये पर दी थी।
किरायेदारी के दौरान ही मकान मालिक ने 21 सितंबर 2004 को किरायेदार को 1,90,000 रुपये में दुकान बेचने का समझौता किया। इसके तहत किरायेदार ने एडवांस (बयाने) के तौर पर 40,000 रुपये दिए, और बाकी 1,50,000 रुपये बैंक से लोन लेकर तीन महीने में चुकाने थे।
मकान मालिक का कहना था कि किरायेदार समझौते की शर्तें पूरी नहीं कर सका, जिससे बिक्री का सौदा रद्द हो गया और वह किरायेदार के रूप में ही दुकान में रहता रहा। इसके बाद मकान मालिक ने किराया न देने, दुकान का इस्तेमाल बदलने और अपनी निजी जरूरत का हवाला देकर बेदखली के लिए स्मॉल कॉज कोर्ट में मुकदमा (Civil Suit No. 384/2010) दायर किया।
किरायेदार ने कोर्ट में दावा किया कि एग्रीमेंट टू सेल होते ही मकान मालिक और किरायेदार का रिश्ता खत्म हो गया था। उसने कहा कि वह कुल 90,000 रुपये दे चुका था और बाकी रकम देने को भी तैयार था।
19 सितंबर 2015 को स्मॉल कॉज कोर्ट ने मकान मालिक के पक्ष में फैसला सुनाते हुए माना कि मकान मालिक-किरायेदार का संबंध अभी भी कायम है। इस फैसले को 24 नवंबर 2023 को अपील अदालत ने और 1 अप्रैल 2026 को बॉम्बे हाईकोर्ट ने भी सही ठहराया। इसके बाद किरायेदार ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।
दोनों पक्षों की दलीलें
किरायेदार के वकील ने तर्क दिया कि बिक्री का एग्रीमेंट होते ही दोनों के बीच का कानूनी रिश्ता बदल गया और यह विक्रेता-खरीदार का रिश्ता बन गया, इसलिए स्मॉल कॉज कोर्ट का क्षेत्राधिकार ही खत्म हो गया। उन्होंने आर. कांतिमति बनाम बीट्रिस जेवियर मामले का हवाला देते हुए कहा कि किरायेदार का कब्जा धारा 53A के तहत खरीदार के रूप में बदल गया था।
दूसरी तरफ, मकान मालिक के वारिसों ने तर्क दिया कि चूंकि बिक्री का सौदा कभी पूरा नहीं हुआ और एग्रीमेंट में लोन न मिलने पर उसे रद्द करने की बात लिखी थी, इसलिए किरायेदारी बिना किसी रुकावट के जारी रही।
सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण और अदालती नजीरें
सुप्रीम कोर्ट ने इस कानूनी सवाल पर विचार किया कि क्या एडवांस रकम लेकर एग्रीमेंट टू सेल करने से मकान मालिक-किरायेदार का रिश्ता खत्म हो जाता है। आर. कांतिमति मामले का फर्क समझाते हुए कोर्ट ने नोट किया कि उस मामले में एग्रीमेंट में साफ लिखा था कि बड़ी रकम (25,000 में से 20,000 रुपये) मिलने के बाद संपत्ति का कब्जा खरीदार को सौंपा जा चुका है।
इसके विपरीत, वर्तमान मामले के एग्रीमेंट की धारा 4 में लिखा था कि अगर तीन महीने में बैंक लोन पास नहीं होता है, तो समझौता रद्द माना जाएगा और खरीदार को दुकान का कब्जा “वैसा ही वापस सौंपना होगा जैसा कि वह पिछली स्थिति में था।” पीठ ने टिप्पणी की कि यह शर्त पुरानी स्थिति में लौटने की बात करती है और किरायेदारी जारी रहने के बिल्कुल अनुकूल है।
पीठ ने ट्रांसफर ऑफ प्रॉपर्टी एक्ट की धारा 111 के तहत किरायेदारी खत्म होने (सरेंडर) की समीक्षा की और शाह मथुरादास मगनलाल एंड कंपनी बनाम नागप्पा शंकरप्पा मलागे मामले का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था:
“ट्रांसफर ऑफ प्रॉपर्टी एक्ट की धारा 111 के तहत समर्पण (सरेंडर) पट्टेदार के अधिकार का पट्टादाता के पक्ष में त्याग करना है। यह दोनों की आपसी सहमति और एक-दूसरे के कृत्य को स्वीकार करने से प्रभावी होता है।”
वैयाएटी श्रीनिवासराव बनाम गैनीडी जगज्योति मामले का संदर्भ देते हुए पीठ ने कहा:
“जहां एग्रीमेंट टू सेल में साफ लिखा हो कि तय तारीख से किरायेदार को कोई किराया नहीं देना होगा और नुकसान की जिम्मेदारी उसी की होगी, वहां यह किरायेदारी के अधिकार छोड़ने का संकेत देता है…”
“स्पष्ट और अप्रत्यक्ष समर्पण के बीच अंतर होता है। जहां स्पष्ट समर्पण पक्षों की मंशा पर निर्भर करता है, वहीं अप्रत्यक्ष समर्पण कानून के लागू होने से होता है।”
कोर्ट ने सूरज लैंप एंड इंडस्ट्रीज बनाम हरियाणा राज्य मामले का भी हवाला दिया और दोहराया:
“टीपी एक्ट की धारा 54 यह स्पष्ट करती है कि बिक्री का अनुबंध (एग्रीमेंट टू सेल) अपने आप में संपत्ति में कोई अधिकार या मालिकाना हक पैदा नहीं करता।”
“कोई भी एग्रीमेंट टू सेल जो पंजीकृत बिक्री विलेख (रजिस्टर्ड सेल डीड) नहीं है, वह संपत्ति में कोई मालिकाना हक या अधिकार हस्तांतरित नहीं करेगा।”
इन नजीरों के आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने चार मुख्य निष्कर्ष निकाले:
- मकान मालिक और किरायेदार के बीच केवल एग्रीमेंट टू सेल होने से किरायेदारी अपने आप खत्म नहीं होती।
- लीज केवल तभी खत्म मानी जाएगी जब एग्रीमेंट की शर्तें या दोनों पक्षों का व्यवहार धारा 111 के तहत स्पष्ट या अप्रत्यक्ष समर्पण दर्शाते हों।
- एग्रीमेंट टू सेल के बाद भी किरायेदार का लगातार कब्जा धारा 53A के तहत आंशिक पालन (पार्ट परफॉर्मेंस) नहीं माना जा सकता, जब तक कि यह साबित न हो कि कब्जा सीधे एग्रीमेंट से मिला है।
- कोई भी एग्रीमेंट टू सेल, जो रजिस्टर्ड सेल डीड नहीं है, संपत्ति में कोई स्वामित्व या अधिकार प्रदान नहीं करता।
धारा 53A के तहत राहत के दावों पर कोर्ट ने डी.एस. पर्वथम्मा बनाम ए. श्रीनिवासन फैसले का हवाला देकर कहा कि पहले से किरायेदार के रूप में रह रहा व्यक्ति तब तक धारा 53A का लाभ नहीं ले सकता जब तक यह साबित न हो कि उसका किरायेदार वाला कब्जा खत्म होकर खरीदार के रूप में नया कब्जा शुरू हुआ था।
इसके अलावा, सुप्रीम कोर्ट ने माना कि धारा 53A का दावा रजिस्ट्रेशन एक्ट, 1908 की धारा 17(1A) (2001 के संशोधन) के कारण भी खारिज होता है। अमीर मिन्हाज बनाम डिएर्ड्रे एलिजाबेथ इसार मामले का जिक्र करते हुए पीठ ने माना कि चूंकि 2004 का यह एग्रीमेंट टू सेल अनरजिस्टर्ड था, इसलिए कानूनन धारा 53A के लिए इसका कोई वजूद नहीं है।
निर्णय
निचली अदालतों और हाईकोर्ट के फैसलों में कोई कमी न पाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने किरायेदार की याचिका को आधारहीन मानते हुए खारिज कर दिया।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: नाज़िम शेख हसन बनाम नासिर मुश्ताक शेख एवं अन्य
वाद संख्या: स्पेशल लीव पिटीशन (सिविल) संख्या 17699/2026
पीठ: जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्र और जस्टिस एन.वी. अंजारिया
निर्णय की तिथि: 13 अगस्त 2026

