झारखंड हाईकोर्ट ने 35 साल पुराने वैवाहिक संबंधों को समाप्त करने से इनकार करते हुए 58 वर्षीय एक व्यक्ति की तलाक की याचिका खारिज कर दी है। अदालत ने स्पष्ट किया कि टॉयलेट का दरवाजा बंद करने, बाथरूम का पानी काटने और घर में गाय न रखने देने जैसे आरोप इतने गंभीर नहीं हैं कि इनके आधार पर दशकों पुरानी शादी को तोड़ दिया जाए।
जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस संजय प्रसाद की पीठ ने 6 अगस्त को यह फैसला सुनाते हुए फैमिली कोर्ट के निर्णय को बरकरार रखा। हाईकोर्ट ने कहा कि वैवाहिक क्रूरता की कोई एक तय परिभाषा नहीं हो सकती। हर मामले का मूल्यांकन पति-पत्नी के सामाजिक परिवेश, जीवनशैली, आपसी संबंधों और उनके स्वभाव के आधार पर किया जाना चाहिए।
क्रूरता और व्यवहार पर हाईकोर्ट की टिप्पणी
अदालत का कहना था कि शादी में क्रूरता केवल शारीरिक हिंसा तक सीमित नहीं होती, बल्कि यह एक-दूसरे के प्रति व्यवहार, दृष्टिकोण और सम्मान की कमी के रूप में भी सामने आ सकती है। यदि किसी जीवनसाथी का आचरण दूसरे के स्वास्थ्य, मान-प्रतिष्ठा या करियर को नुकसान पहुंचाता है, तो उसे क्रूरता माना जा सकता है। हालांकि, इस मामले में पति द्वारा लगाए गए आरोप इतने गंभीर नहीं थे कि 35 साल के रिश्ते को खत्म करने का आधार बन सकें।
31 साल साथ रहने के बाद शुरू हुआ विवाद
अदालत के दस्तावेजों के अनुसार, जोड़े का विवाह 1989 में हिंदू रीति-रिवाजों से हुआ था और उनके तीन बच्चे हैं। पति का दावा था कि वे 31 वर्षों तक अपने घर में शांति से रहे, लेकिन जून 2020 के बाद पत्नी के व्यवहार में अचानक बदलाव आ गया। पति ने आरोप लगाया कि पत्नी ने उन्हें घर से निकाल दिया, जिसके बाद से वे किराए के मकान में रहने को मजबूर हैं। इसके बाद पत्नी ने भरण-पोषण (मेंटेनेंस) का मामला दर्ज कराया।
पति ने क्रूरता और परित्याग (डेजर्शन) के आधार पर तलाक की मांग की थी। वर्ष 2024 में फैमिली कोर्ट ने उनकी याचिका खारिज कर दी थी। इसके बाद पति ने हाईकोर्ट का रुख किया। उनके अधिवक्ता जितेश कुमार ने तर्क दिया कि फैमिली कोर्ट ने साक्ष्यों और परिस्थितियों को नजरअंदाज किया है तथा दोनों के बीच का रिश्ता अब सुधरने की स्थिति में नहीं है। हाईकोर्ट के आदेश पर दोनों पक्षों को मध्यस्थता (मीडिएशन) के लिए भी भेजा गया था, लेकिन बातचीत से कोई समाधान नहीं निकल सका।
अलग रहने का कानूनी अर्थ
पति द्वारा लगाए गए परित्याग के आरोप पर हाईकोर्ट ने स्थिति साफ की। पीठ ने कहा कि महज अलग रहने भर से कानूनी तौर पर परित्याग सिद्ध नहीं होता। इसके लिए यह साबित करना जरूरी है कि जीवनसाथी का इरादा रिश्ते को हमेशा के लिए खत्म करने का था। यदि कोई जीवनसाथी क्षणिक गुस्से या नाराजगी में घर छोड़ता है, तो उसे कानूनी रूप से परित्याग नहीं माना जा सकता।

