जुवेनाइल कानून और परिस्थितिजन्य साक्ष्यों से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ ने स्पष्ट किया है कि अपराध के समय आरोपी के नाबालिग होने की बाद में हुई घोषणा से साक्ष्यों के आधार पर तय हुआ दोषसिद्धि का फैसला अपने आप खत्म या रद्द नहीं हो जाता। हालांकि, इस स्थिति में बालिग के रूप में दी गई सजा कानूनी रूप से अप्रभावी हो जाती है। शीर्ष अदालत ने अपीलकर्ता दिनेश कुमार की भारतीय दंड संहिता, 1860 (IPC) की धारा 302/34 और 392/34 के तहत दोषसिद्धि को बरकरार रखा, जबकि उसकी उम्रकैद और सात साल के कठोर कारावास की सजा को रद्द कर दिया।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला 10 अगस्त 1998 को हुई एक घटना से संबंधित है। मृतक हरि ओम भिवानी से टैक्सी के रूप में चलने वाली एक एंबेसडर कार चलाता था। 10 अगस्त 1998 की सुबह आरोपी दिनेश कुमार अपने दो अन्य साथियों मनोज और मुकेश कुमार के साथ सोनीपत जाने के लिए यह टैक्सी किराये पर लेकर गया। मृतक के भाई सुमेर सिंह (PW-13), जो तीनों आरोपियों को पहले से जानता था, ने हरि ओम को उनके साथ जाते देखा था।
जब हरि ओम वापस नहीं लौटा, तो परिजनों ने उसकी तलाश शुरू की। 13 अगस्त 1998 को गांव जौनपुर में यमुना बांध के पास एक गन्ने के खेत में एक अज्ञात सड़-गल चुका शव बरामद हुआ। 14 अगस्त 1998 को सुमेर सिंह और वाहन मालिक ने शव गृह पहुंचकर कपड़ों और शरीर के बचे हुए हिस्सों के आधार पर शव की पहचान हरि ओम के रूप में की। इसके बाद थाना गन्नौर में प्राथमिकी (FIR) संख्या 265/1998 दर्ज की गई।
15 अगस्त 1998 को पुलिस ने गुप्त सूचना के आधार पर तरावड़ी के पास तीनों आरोपियों को उस समय रोककर पकड़ा जब वे मृतक की कार को उसके पंजीकरण प्रमाण पत्र और बीमा कागजात के साथ बेचने या ठिकाने लगाने की कोशिश कर रहे थे। पूछताछ के दौरान हुई निशानदेही पर पुलिस ने गन्ने के खेत से मृतक का ड्राइविंग लाइसेंस और एक टिफिन बरामद किया, जिस पर नाम खुदा हुआ था।
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, सोनीपत ने 15 सितंबर 2000 को तीनों आरोपियों को हत्या और लूट का दोषी ठहराते हुए उम्रकैद तथा सात साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई। इसके खिलाफ दायर अपील को पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने 18 सितंबर 2009 को खारिज करते हुए दोषसिद्धि और सजा को सही ठहराया था।
सुप्रीम कोर्ट में अपील लंबित रहने के दौरान अपीलकर्ता ने प्रिंसिपल मजिस्ट्रेट, किशोर न्याय बोर्ड, सोनीपत का 12 अक्टूबर 2012 का एक आदेश रिकॉर्ड पर रखा। बोर्ड ने अपनी जांच में माना था कि घटना की तिथि (10 अगस्त 1998) को अपीलकर्ता की आयु 17 वर्ष, 6 महीने और 7 दिन थी। चूंकि वह हिरासत में तीन साल से अधिक की अवधि पूरी कर चुका था, इसलिए बोर्ड ने उसे रिहा करने का निर्देश दिया था।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ता के वकील ने दोषसिद्धि को चुनौती देते हुए कई तर्क दिए:
- शव अत्यधिक सड़ चुका था और साधारण तरीके से पहचान के योग्य नहीं था।
- मेडिकल अफसर (PW-9) न तो मौत का सटीक कारण बता सके और न ही शरीर पर कोई हड्डी की चोट पाई गई।
- पोस्ट-मॉर्टम रिपोर्ट में बताई गई मौत की समय-सीमा अभियोजन पक्ष की कहानी से मेल नहीं खाती थी।
- “आखिरी बार देखे जाने” (Last Seen) के तथ्य पर सुमेर सिंह ही एकमात्र और संबंधित गवाह था।
- सामान की बरामदगी एक खुले और आम पहुंच वाले गन्ने के खेत से हुई थी, जो आरोपियों का नहीं था।
- अभियोजन पक्ष अपराध का कोई स्पष्ट मकसद या परिस्थितियों की अटूट श्रृंखला साबित करने में विफल रहा।
दूसरी ओर, राज्य सरकार ने निचले अदालतों के फैसलों का समर्थन करते हुए कहा:
- गवाह सुमेर सिंह आरोपियों को पहले से जानता था और उसने अपने भाई को आरोपियों के साथ जाते देखा था।
- घटना के महज पांच दिनों के भीतर तीनों आरोपियों को चोरी की टैक्सी के साथ उस समय रंगे हाथों पकड़ा गया जब वे उसे बेचने की कोशिश कर रहे थे।
- अपीलकर्ता ने खुद मृतक का ड्राइविंग लाइसेंस और टिफिन बरामद करवाने में हिस्सा लिया था।
- इसी मामले के सह-आरोपी मनोज की अपील पर सुप्रीम कोर्ट 6 अगस्त 2025 को फैसला सुनाते हुए उसकी दोषसिद्धि को पहले ही बरकरार रख चुका है।
कोर्ट का विश्लेषण
नाबालिग होने के दावे का दोषसिद्धि पर पड़ने वाले कानूनी प्रभाव पर विचार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2000 की धारा 7A और 20 के साथ-साथ हरि राम बनाम राजस्थान राज्य, धर्मबीर बनाम राज्य (एनसीटी दिल्ली) और जितेन्द्र सिंह उर्फ बब्बू सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य जैसे पूर्व फैसलों का हवाला दिया। कोर्ट ने टिप्पणी की:
“बाद में किशोर (नाबालिग) घोषित होने मात्र से साक्ष्यों के आधार पर दर्ज की गई दोषसिद्धि समाप्त नहीं हो जाती। यह मुख्य रूप से सक्षम मंच और अनुमत निपटारे के स्वरूप को प्रभावित करता है तथा बालिग को दी जाने वाली सजा को कानूनी रूप से अप्रभावी बना देता है।”
मामले के साक्ष्यों का परीक्षण करते हुए कोर्ट ने परिस्थितियों पर आधारित साक्ष्य के सिद्धांतों पर शरद बिरधीचंद शारदा बनाम महाराष्ट्र राज्य मामले का स्मरण किया और माना:
“पूरी तरह से परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित दोषसिद्धि केवल तभी बरकरार रखी जा सकती है जब relied upon (प्रमाणित) हर परिस्थिति दृढ़ता से साबित हो; साबित परिस्थितियां एक पूरी श्रृंखला बनाती हों; और वह श्रृंखला केवल आरोपी के दोषी होने के अनुकूल हो तथा निर्दोषता की किसी भी तार्किक संभावना से असंगत हो।”
कड़ियों का मूल्यांकन करते हुए पीठ ने निम्नलिखित बिंदु रेखांकित किए:
- आखिरी बार देखा जाना और पहचान: गवाह सुमेर सिंह कोई अनजान व्यक्ति नहीं बल्कि मृतक का भाई था जो आरोपियों को पहचानता था। चेहरे के गल जाने के बावजूद कपड़ों और शारीरिक बनावट से हुई पहचान को वाहन के गायब होने और सामान की बरामदगी से मजबूती मिली।
- चोरी की गाड़ी का स्पष्टीकरण-रहित कब्जा: घटना के पांच दिनों के भीतर मृतक की कार के साथ पकड़ा जाना एक बेहद मजबूत कड़ी है। भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 106 का उल्लेख करते हुए कोर्ट ने कहा:
“106. विशेष रूप से ज्ञान में स्थित तथ्य को साबित करने का भार—जब कोई तथ्य विशेष रूप से किसी व्यक्ति के ज्ञान में है, तब उस तथ्य को साबित करने का भार उस पर होता है।”
कोर्ट ने आगे कहा:
“एक बार जब आखिरी बार देखे जाने और मृतक की टैक्सी के हालिया व स्पष्टीकरण-रहित कब्जे के बुनियादी तथ्य स्वतंत्र रूप से साबित हो गए, तो कोई तर्कसंगत स्पष्टीकरण देने में विफलता एक अतिरिक्त कड़ी बन गई, न कि सबूत का विकल्प।”
- धारा 27 के तहत बरामदगी: गन्ने के खेत से हुई बरामदगी के संबंध में कोर्ट ने स्पष्ट किया:
“केवल इस तथ्य से कि खेत आरोपी का नहीं था, बरामदगी का महत्व कम नहीं हो जाता, जहाँ वस्तुएँ खड़ी फसल के बीच छिपाई गई थीं और उनका सटीक स्थान स्पष्ट रूप से उनके विशेष ज्ञान में था।”
- मेडिकल साक्ष्य: कोर्ट ने माना कि डॉक्टर द्वारा मौत का सटीक कारण न बता पाना शरीर के अत्यधिक गल जाने के कारण था, लेकिन इससे यह साबित नहीं होता कि मौत प्राकृतिक थी या अभियोजन का मामला झूठा था।
कोर्ट का फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने दिनेश कुमार की आईपीसी की धारा 302/34 और 392/34 के तहत दोषसिद्धि को सही ठहराया और कहा कि परिस्थितियों की श्रृंखला पूरी है, जो केवल आरोपी के दोषी होने की ओर इशारा करती है।
हालांकि, अपराध के समय अपीलकर्ता के नाबालिग होने के तथ्य को स्वीकार करते हुए कोर्ट ने उसकी उम्रकैद और सात साल की सजा, जुर्माना और जुर्माना न देने पर होने वाली अतिरिक्त सजा के आदेश को रद्द कर दिया। चूंकि अपीलकर्ता किशोर न्याय कानून के तहत निर्धारित अधिकतम 3 साल की अवधि से अधिक समय पहले ही जेल में बिता चुका है और किशोर न्याय बोर्ड द्वारा रिहा किया जा चुका है, इसलिए कोर्ट ने निर्देश दिया कि उसे आत्मसमर्पण करने की आवश्यकता नहीं है और उसके ज़मानत बांड डिस्चार्ज किए जाते हैं।
इसके अतिरिक्त, 2000 के अधिनियम की धारा 19 के तहत कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि अपीलकर्ता पर इस दोषसिद्धि के कारण कोई कानूनी अयोग्यता (disqualification) लागू नहीं होगी। इस संबंध में आवश्यक रिकॉर्ड दुरुस्त करने का निर्देश किशोर न्याय बोर्ड, सोनीपत को दिया गया। इस प्रकार अपील को आंशिक रूप से स्वीकार किया गया।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: दिनेश कुमार बनाम हरियाणा राज्य
वाद संख्या: क्रिमिनल अपील संख्या 64/2011
पीठ: जस्टिस अरविंद कुमार, जस्टिस विपुल एम. पंचोली
निर्णय की तिथि: 12 अगस्त 2026

