हिमाचल प्रदेश राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने एसबीआई लाइफ इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड को एक मृतक पॉलिसीधारक की पत्नी को 49.98 लाख रुपये का भुगतान करने का निर्देश दिया है। आयोग ने कहा कि गंभीर बीमारी के दौरान महज 2,016 रुपये का एक प्रीमियम न भर पाने के आधार पर 50 लाख रुपये का डेथ क्लेम खारिज करना सेवा में कमी और अनुचित व्यापार व्यवहार है।
आयोग के अध्यक्ष जस्टिस इंदर सिंह मेहता और सदस्य योगिता दत्ता की पीठ ने जिला उपभोक्ता आयोग चंबा के फैसले के खिलाफ एसबीआई लाइफ की अपील पर सुनवाई करते हुए यह आदेश सुनाया। राज्य आयोग ने जिला आयोग के 22 अगस्त 2024 के आदेश में आंशिक संशोधन करते हुए बीमा कंपनी को कुल 50 लाख रुपये के क्लेम में से मई 2022 के बकाए 2,016.54 रुपये काटकर नामांकित महिला आशा देवी को 49,97,983.46 रुपये देने का हुक्म दिया। इसके साथ ही शिकायत दर्ज करने की तिथि 27 अप्रैल 2023 से 9 प्रतिशत वार्षिक दर से ब्याज, 50,000 रुपये का मुआवजा और 15,000 रुपये का मुकदमा खर्च देने के आदेश को भी बरकरार रखा।
यह मामला राजिंदर सिंह द्वारा 2019 में ली गई एसबीआई लाइफ ई-शील्ड पॉलिसी से जुड़ा है, जिसकी समयावधि 20 जून 2019 से 20 जून 2041 तक थी। इस पॉलिसी में उनकी पत्नी आशा देवी नामांकित थीं। मई 2022 के तीसरे हफ्ते में राजिंदर सिंह अचानक गंभीर रूप से बीमार पड़ गए। 19 मई को जांच के दौरान उनमें एक्यूट पीलिया और थ्रोम्बोसाइटोपेनिया की पुष्टि हुई।
उन्हें पहले चुवाड़ी और फिर टांडा के अस्पतालों में भर्ती कराया गया, जहां इलाज के दौरान 23 जून को डॉ. राजेंद्र प्रसाद गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज, टांडा में उनका निधन हो गया। उनके निधन के बाद जब आशा देवी ने डेथ क्लेम दाखिल किया, तो एसबीआई लाइफ ने यह कहते हुए दावा खारिज कर दिया कि 20 मई 2022 को देय मासिक किस्त का भुगतान 15 दिनों की ग्रेस अवधि में नहीं किया गया था, इसलिए पॉलिसी लैप्स हो चुकी थी।
मामले की सुनवाई के दौरान राज्य आयोग ने पाया कि राजिंदर सिंह ने 19 मई 2022 को ही अप्रैल महीने का प्रीमियम जमा किया था, जिसे एसबीआई लाइफ ने स्वीकार भी कर लिया था। इसके तुरंत बाद ही उनकी तबीयत बिगड़ गई थी।
पॉलिसी के रिकॉर्ड की समीक्षा करने पर आयोग ने पाया कि इससे पहले भी राजिंदर सिंह ने कई मौकों पर 15 दिनों की ग्रेस अवधि बीत जाने के बाद प्रीमियम जमा किया था, जिसे कंपनी ने बिना किसी आपत्ति या जुर्माने के स्वीकार किया था। आयोग ने यह भी ध्यान दिलाया कि बीमा कंपनी ने राजिंदर सिंह के जीवित रहते हुए बकाया प्रीमियम को लेकर कोई नोटिस भी जारी नहीं किया था।
पीठ ने स्पष्ट किया कि बीमा नीति की शर्तों की व्याख्या न्यायसंगत और तर्कसंगत तरीके से की जानी चाहिए। सिंह द्वारा मई का प्रीमियम जमा न कर पाना कोई जानबूझकर किया गया डिफॉल्ट नहीं था, बल्कि यह अचानक आई गंभीर बीमारी और लगातार अस्पताल में भर्ती रहने के कारण हुआ था। आयोग ने निष्कर्ष निकाला कि जिस कंपनी ने पहले लगातार देरी से प्रीमियम स्वीकार किया हो, उसका एक किस्त के आधार पर क्लेम खारिज करना अनुचित और सेवा में कमी है।

