केरल के एक उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने ऑनलाइन वित्तीय धोखाधड़ी के एक मामले में फेडरल बैंक को सेवा में कमी का दोषी पाया है। आयोग ने बैंक को पीड़ित ग्राहक के खाते से उड़े 9,854 रुपये तुरंत वापस करने का आदेश दिया है। इसके साथ ही आयोग ने स्पष्ट किया है कि केवल ग्राहक की लापरवाही की आशंका जताकर बैंक अनधिकृत डिजिटल लेनदेन की जिम्मेदारी से पल्ला नहीं झाड़ सकते।
आयोग ने बैंक को 30 दिनों के भीतर मूल राशि लौटाने के अलावा पीड़ित को मानसिक उत्पीड़न के मुआवजे के रूप में 5,000 रुपये और कानूनी कार्यवाही के खर्च के रूप में 3,000 रुपये का भुगतान करने का भी निर्देश दिया है।
केवल आशंका के आधार पर ग्राहक पर नहीं थोपा जा सकता नुकसान
5 अगस्त को जारी अपने आदेश में आयोग के अध्यक्ष पी.वी. जयराजन और सदस्य प्रीता जी. नायर व बीजू वी.आर. की तीन सदस्यीय पीठ ने कहा कि भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई) के दिशानिर्देशों के तहत अनधिकृत इलेक्ट्रॉनिक लेनदेन से हुए नुकसान की भरपाई की पहली जिम्मेदारी बैंक की होती है। आयोग ने कहा कि जब तक बैंक यह साबित करने के लिए ठोस और विश्वसनीय साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर देता कि ग्राहक ने लापरवाही बरती थी या धोखाधड़ी में जानबूझकर या अनजाने में भागीदारी की थी, तब तक नुकसान की भरपाई बैंक को ही करनी होगी।
सोशल मीडिया स्क्रैच कार्ड से हुई थी ठगी
यह मामला 13 जुलाई 2021 का है, जब फेडरल बैंक के एक बचत खाताधारक सोशल मीडिया चला रहे थे। इस दौरान उनकी स्क्रीन पर डिजिटल पेमेंट प्लेटफॉर्म फोनपे (PhonePe) के लोगो और फॉन्ट वाला एक स्क्रैच कार्ड पॉप-अप हुआ, जिसमें ‘अनलिमिटेड कैशबैक’ देने का दावा किया गया था।
गूगल पे और फोनपे जैसे भुगतान ऐप का नियमित उपयोग करने के कारण ग्राहक ने इसे वास्तविक ऑफर समझकर स्क्रैच कार्ड पर दो बार क्लिक किया। इसके तुरंत बाद उनके बैंक खाते से 4,885 रुपये और 4,969 रुपये की दो अलग-अलग अनधिकृत कटौतियां हो गईं।
रकम लौटाकर बैंक ने दोबारा वापस निकाली
धोखाधड़ी का पता चलते ही ग्राहक ने तुरंत फेडरल बैंक में इसकी शिकायत दर्ज कराई। अनधिकृत लेनदेन की बात स्वीकार करते हुए बैंक ने शुरुआत में 15 जुलाई 2021 को पूरी रकम (9,854 रुपये) ग्राहक के खाते में वापस क्रेडिट कर दी। हालांकि, 4 अगस्त 2021 को बैंक ने अपना रुख बदलते हुए उस क्रेडिट को रिवर्स कर दिया और पैसे खाते से दोबारा निकाल लिए।
बैंक के इस रवैये से असंतुष्ट होकर खाताधारक ने उपभोक्ता आयोग का रुख किया और बैंक पर अनुचित व्यापार आचरण तथा सेवा में ढिलाई का आरोप लगाया।
सुरक्षा प्रोटोकॉल का तर्क देकर बैंक ने झाड़ा पल्ला
आयोग के समक्ष फेडरल बैंक का प्रतिनिधित्व करते हुए अधिवक्ता एस. रघुकुमार ने तर्क दिया कि बैंक किसी तीसरे पक्ष के स्क्रैच कार्ड या बाहरी गतिविधियों के लिए जिम्मेदार नहीं है। बैंक की ओर से कहा गया कि आंतरिक जांच में पाया गया कि खाताधारक नियमित रूप से यूपीआई लेनदेन करते थे।
बैंक ने दावा किया कि यूपीआई ट्रांसफर पूरा करने के लिए उपयोगकर्ता को अपनी वर्चुअल पेमेंट आईडी और गोपनीय पिन (PIN) दर्ज करना होता है, जो केवल खाताधारक को ही मालूम होता है। बैंक के अनुसार यह लेनदेन केवल ग्राहक की सहमति या क्रेडेंशियल साझा करने पर ही संभव था।
साबित करने की जिम्मेदारी बैंक की
उपभोक्ता आयोग ने बैंक के इन तर्कों को खारिज कर दिया। आयोग ने पाया कि ग्राहक ने धोखाधड़ी की जानकारी मिलते ही तुरंत रिपोर्ट करके अपनी सतर्कता का परिचय दिया था। वहीं, बैंक ऐसा कोई भी दस्तावेजी सबूत पेश करने में विफल रहा जिससे यह साबित हो सके कि ग्राहक ने सुरक्षा पिन साझा किया था या लापरवाही बरती थी। सबूतों के अभाव में आयोग ने माना कि इस अनधिकृत लेनदेन का पूरा दायित्व बैंक पर ही आयत होता है।

