दिल्ली हाईकोर्ट ने हिमाचल प्रदेश में अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट (एडीएम) के पद पर फर्जी नियुक्ति पत्र, सरकारी सील और कार स्टीकर का इस्तेमाल कर अपने ससुर से करीब 39 लाख रुपये की ठगी करने की आरोपी महिला की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी है। जस्टिस गिरीश कठपालिया की एकल पीठ ने मामले की गंभीरता को रेखांकित करते हुए माना कि धोखाधड़ी के तंत्र और इसमें शामिल अन्य लोगों की भूमिका का पता लगाने के लिए आरोपी की हिरासत में पूछताछ (कस्टोडियल इंटरोगेशन) आवश्यक है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला सीमापुरी पुलिस स्टेशन में भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 319(2), 318(4), 336(3), 339 और 61(2) के तहत दर्ज प्राथमिकी (एफआईआर) संख्या 427/2026 से संबंधित है। यह एफआईआर आरोपी महिला के ससुर की शिकायत पर दर्ज की गई थी।
अभियोजन पक्ष के अनुसार, शिकायतकर्ता के बेटे से शादी के बाद आरोपी महिला हिमाचल प्रदेश में एडीएम पद पर चयन और प्रशिक्षण का बहाना बनाकर गुरुग्राम में अलग रहने लगी। इस दौरान वह एक अन्य व्यक्ति के साथ लिव-इन पार्टनर के रूप में रहने लगी।
शिकायतकर्ता और अन्य लोगों को अपने दावों का यकीन दिलाने के लिए, आरोपी महिला ने कथित तौर पर हिमाचल प्रदेश सरकार के मुख्य सचिव द्वारा जारी एक फर्जी नियुक्ति पत्र और “एडीएम, लाहौल और स्पीति, एचपी” लिखे फर्जी कार स्टीकर व्हाट्सएप पर भेजे। इन फर्जी दस्तावेजों के आधार पर उसने अलग-अलग बहानों से शिकायतकर्ता से किश्तों में लगभग 39 लाख रुपये ऐंठ लिए, जिसे बाद में उसने अपने दोस्तों के खातों में ट्रांसफर कर दिया।
इसके अलावा, सह-आरोपी के माध्यम से शिकायतकर्ता को फर्जी ईमेल भेजे गए, जिससे यह प्रभाव पड़े कि हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश उससे मिलने वाले हैं। फर्जीवाड़े को सच साबित करने के लिए सह-आरोपी के जरिए ऐसे ईमेल भी भेजे गए जिनमें दावा किया गया कि हाईकोर्ट के एक न्यायाधीश की पत्नी की गंभीर दुर्घटना हो गई है, और दुर्घटना की तस्वीर भी संलग्न की गई थी।
अदालत में पक्षकारों की दलीलें
आरोपी महिला के वकील सूर्य नाथ पांडे ने तर्क दिया कि उनकी मुवक्किल निर्दोष है और उसे झूठा फंसाया गया है। उन्होंने कहा कि एफआईआर में कहीं भी यह आरोप नहीं है कि शिकायतकर्ता ने सीधे आरोपी महिला को पैसे दिए थे। उन्होंने यह भी दलील दी कि एफआईआर के अनुसार शिकायतकर्ता द्वारा दिया गया पैसा सिविल सेवक या जज के रूप में नौकरी पक्की कराने के लिए रिश्वत के रूप में था, इसलिए शिकायतकर्ता स्वयं गलत आचरण का दोषी है। वकील ने यह भी दावा किया कि महिला के मोबाइल फोन से नियुक्ति पत्र भेजे जाने की घटना फोन हैक होने के कारण हुई थी।
जमानत याचिका का कड़ा विरोध करते हुए राज्य की ओर से उपस्थित अतिरिक्त लोक अभियोजक हेमंत मेहला ने कहा कि आरोप बेहद गंभीर प्रकृति के हैं। उन्होंने कहा कि फर्जीवाड़ा किस स्तर पर किया गया, और हिमाचल प्रदेश सरकार के अधिकारियों के लेटरहेड, सील तथा हस्ताक्षर की जालसाजी में किन-किन लोगों ने आरोपी की मदद की, इसका खुलासा करने के लिए हिरासत में पूछताछ जरूरी है।
शिकायतकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता मनिंदर सिंह ने भी अग्रिम जमानत का विरोध किया। उन्होंने अदालत को बताया कि शिकायतकर्ता पर अनुचित दबाव बनाने के लिए आरोपी महिला ने कई साल पहले उसके द्वारा बलात्कार किए जाने का भी मनघढ़ंत आरोप लगाया था।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और निर्णय
आरोपी के वकील की इस दलील पर कि महिला को कोई भुगतान नहीं किया गया था, अदालत ने स्पष्ट किया कि यह दावा एफआईआर में दर्ज तथ्यों के विपरीत है।
धोखाधड़ी के तरीके और इसकी गंभीरता पर चिंता व्यक्त करते हुए पीठ ने टिप्पणी की:
“वर्तमान मामले में बड़ा सवाल केवल आरोपी/याचिकाकर्ता द्वारा खुद को फर्जी तरीके से एडीएम बताकर की गई धोखाधड़ी का ही नहीं है, बल्कि उस तरीके का भी है जिससे उसने न केवल नियुक्ति अधिसूचना, बल्कि हिमाचल प्रदेश सरकार के संबंधित अधिकारी के लेटरहेड, सील और हस्ताक्षरों की जालसाजी के साधन जुटाए।“
अदालत ने आगे कहा कि खुद को एडीएम दर्शाने वाले फर्जी कार स्टीकर की भी विस्तृत जांच की आवश्यकता है। जांच अधिकारी द्वारा हिरासत में पूछताछ की मांग को तर्कसंगत ठहराते हुए अदालत ने कहा:
“समग्र परिस्थितियों को देखते हुए, मैं जांच अधिकारी द्वारा आरोपी/याचिकाकर्ता की हिरासत में पूछताछ की व्यक्त की गई आवश्यकता को अनुचित नहीं मानता। आरोपी/याचिकाकर्ता से हिरासत में पूछताछ करना निश्चित रूप से आवश्यक होगा।“
अदालत ने इन आधारों पर अग्रिम जमानत याचिका को खारिज कर दिया।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: निकिता मिश्रा बनाम राज्य (राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली)
वाद संख्या: बेल एप्लीकेशन 2943/2026 और सीआरएल.एम.ए. 22190/2026
पीठ: जस्टिस गिरीश कठपालिया
निर्णय की तिथि: 12 अगस्त 2026

