दिल्ली हाईकोर्ट में जस्टिस हरीश वैद्यनाथन शंकर की पीठ ने स्पष्ट किया है कि सिविल प्रक्रिया संहिता (सीपीसी) की धारा 24 के तहत केस ट्रांसफर की शक्ति का इस्तेमाल महज सुनवाई के दौरान जज द्वारा की गई मौखिक टिप्पणियों से उपजी आशंका के आधार पर नहीं किया जा सकता। कड़कड़डूमा कोर्ट से एक कमर्शियल सूट को दूसरी अदालत में स्थानांतरित करने की मांग वाली याचिका को खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने बिना किसी ठोस आधार के न्यायिक अधिकारी पर आरोप लगाने को अदालत की प्रक्रिया का दुरुपयोग माना और याचिकाकर्ता पर 25,000 रुपये का जुर्माना लगाया।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला मोहम्मद अहमद द्वारा दायर ट्रांसफर पिटीशन से जुड़ा है। याचिकाकर्ता ने कड़कड़डूमा कोर्ट स्थित जिला न्यायाधीश (कमर्शियल कोर्ट-04), शाहदरा जिला के समक्ष लंबित कमर्शियल सूट (आशा मलिक बनाम मोहम्मद अहमद) और उससे जुड़ी मिसलेनियस व एग्जीक्यूशन कार्यवाहियों को दिल्ली की किसी अन्य सक्षम कमर्शियल कोर्ट में स्थानांतरित करने की मांग की थी।
पक्षकारों की दलीलें
याचिकाकर्ता के वकील ने अदालत में तर्क दिया कि याचिकाकर्ता को संबंधित ट्रायल कोर्ट से निष्पक्ष न्याय न मिलने की वाजिब और वास्तविक आशंका है। वकील के अनुसार, यह आशंका सुनवाई के दौरान ट्रायल कोर्ट द्वारा की गई कुछ मौखिक टिप्पणियों और बयानों के कारण पैदा हुई।
याचिकाकर्ता का कहना था कि सीपीसी के आदेश XI नियम 13 के तहत दायर आवेदन पर विचार करने में ट्रायल कोर्ट ने अनिच्छा जताई थी। इसके अतिरिक्त, आरोप लगाया गया कि ट्रायल कोर्ट ने विपक्षी पक्षकारों के वकील के प्रति अनुचित कृपा दिखाई और याचिकाकर्ता की हिरासत से जुड़े आवेदन दायर करने का परामर्श भी दिया। याचिकाकर्ता ने दावा किया कि ये आशंकाएं काल्पनिक नहीं थीं, इसलिए मामले को किसी अन्य कोर्ट में ट्रांसफर किया जाना चाहिए।
हाईकोर्ट का विश्लेषण
मामले के तथ्यों और दलीलों का अवलोकन करने के बाद हाईकोर्ट ने पाया कि केस ट्रांसफर की मांग का मुख्य आधार सुनवाई के दौरान अदालत में हुई मौखिक बातचीत है। अदालत ने टिप्पणी की कि “केवल सुनवाई के दौरान की गई मौखिक टिप्पणियों या बयानों के आधार पर किसी न्यायिक अधिकारी के खिलाफ इस तरह के आरोप हल्के में नहीं लगाए जा सकते।”
न्यायिक कार्यवाहियों की प्रकृति को स्पष्ट करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि “एक न्यायिक कार्यवाही में अनिवार्य रूप से अदालत और उपस्थित वकीलों के बीच बातचीत शामिल होती है, और ऐसी कार्यवाहियों के दौरान की गई टिप्पणियों को अपने आप में पक्षकारों के बीच उत्पन्न मुद्दों का निर्धारण नहीं माना जा सकता।”
अदालत ने रेखांकित किया कि याचिकाकर्ता ऐसा कोई भी न्यायिक आदेश या निर्णय नहीं दिखा सका जिससे यह साबित हो कि किसी पूर्वाग्रह या पक्षपात के कारण उसके मूल अधिकारों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा हो। सीपीसी के आदेश XI नियम 13 के आवेदन पर मौखिक अनिच्छा के मुद्दे पर कोर्ट ने कहा कि जब तक आवेदन पर कोई अंतिम फैसला नहीं हो जाता, तब तक केवल मौखिक अभिव्यक्ति के आधार पर धारा 24 सीपीसी की असाधारण राहत नहीं दी जा सकती। यदि ट्रायल कोर्ट का कोई अंतिम आदेश प्रतिकूल होता है, तो उसे नियमानुसार कानूनी चुनौती दी जा सकती है।
न्यायिक अधिकारी द्वारा सलाह देने और अनुचित पक्षपात के आरोपों पर हाईकोर्ट ने कहा कि किसी न्यायिक अधिकारी पर ऐसे गंभीर आरोप बिना किसी ठोस सामग्री के और केवल किसी मुकदमेबाज़ की अपनी व्याख्या के आधार पर नहीं लगाए जाने चाहिए।
अदालत ने माना कि “सीपीसी की धारा 24 के तहत केस ट्रांसफर की शक्ति का इस्तेमाल केवल इसलिए नहीं किया जा सकता क्योंकि किसी मुकदमेबाज़ के मन में कार्यवाही के दौरान की गई मौखिक टिप्पणियों के आधार पर कोई आशंका पैदा हो गई है।” हाईकोर्ट ने बिना किसी आधार के ऐसे आरोप लगाने की कड़ी निंदा करते हुए कहा कि यह याचिका “अदालत की प्रक्रिया का दुरुपयोग” है।
निर्णय
हाईकोर्ट ने केस ट्रांसफर याचिका और उससे जुड़ी सभी अंतरिम अर्जियों को खारिज कर दिया। अदालत ने याचिकाकर्ता को चार सप्ताह के भीतर दिल्ली हाईकोर्ट बार एसोसिएशन में 25,000 रुपये की लागत (जुर्माना) जमा करने का निर्देश दिया। साथ ही, इसके एक सप्ताह के भीतर जमा राशि का प्रमाण अदालत के समक्ष रिकॉर्ड पर रखने का आदेश दिया।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: मोहम्मद अहमद बनाम आशा मलिक और अन्य
वाद संख्या: टी.आर.पी.(सी.) 144/2026, सी.एम. एप्लिकेशन्स 52579/2026, 52580/2026 और 52581/2026
पीठ: जस्टिस हरीश वैद्यनाथन शंकर
निर्णय की तिथि: 10 अगस्त, 2026

