आईएसआईएस साइबर कट्टरपंथ मामला: सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली की स्पेशल कोर्ट को एक साल में ट्रायल पूरा करने का दिया निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने इंटरनेट और साइबर स्पेस के जरिए युवाओं को आईएसआईएस जैसे आतंकवादी संगठनों से जोड़ने और उनका कट्टरपंथ की ओर झुकाव बढ़ाने से जुड़े मामले में अहम निर्देश जारी किया है। शीर्ष अदालत ने दिल्ली स्थित स्पेशल कोर्ट को इस केस की सुनवाई एक साल के भीतर पूरी करने का आदेश दिया है। इसके साथ ही, अदालत ने मामले के मुख्य और संरक्षित गवाहों की गवाही प्रक्रिया को आगामी छह महीने के अंदर निपटाने के निर्देश दिए हैं।

चीफ जस्टिस सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी मोहना की पीठ ने आरोपी मोहम्मद हिदायतुल्ला की याचिका का निस्तारण करते हुए मंगलवार, 11 अगस्त को यह आदेश सुनाया। हिदायतुल्ला ने दिल्ली हाईकोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी थी, जिसने जनवरी 2025 में उसकी जमानत अर्जी खारिज कर दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि केस को गति देने के लिए आवश्यकता पड़े, तो स्पेशल कोर्ट इस मामले में रोजाना आधार पर भी सुनवाई कर सकती है।

संरक्षित गवाहों की पूछताछ और सुनवाई की स्थिति

सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) की ओर से पेश हुईं एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने केस की वर्तमान स्थिति की जानकारी दी। उन्होंने पीठ को बताया कि इस मामले में कुल 12 आरोपी नामजद हैं, जिनमें से 8 आरोपियों के खिलाफ अदालत में आरोप (चार्ज) तय किए जा चुके हैं, जबकि 4 आरोपी फिलहाल फरार चल रहे हैं। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि मुकदमा चलाने के लिए 14 संरक्षित गवाहों की सूची तैयार की गई है, जिनकी गवाही स्पेशल कोर्ट में दर्ज होनी है।

दूसरी ओर, याचिकाकर्ता मोहम्मद हिदायतुल्ला के वकील ने अदालत के समक्ष तर्क दिया कि उनका मुवक्किल लगभग चार साल से जेल में बंद है। इस केस में एनआईए ने एफआईआर 2021 में दर्ज की थी, जिसके बाद अक्टूबर 2022 में हिदायतुल्ला को गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) और भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की विभिन्न धाराओं के तहत गिरफ्तार किया गया था।

आईएसआईएस की विचारधारा फैलाने और फंड ट्रांसफर का आरोप

अभियोजन पक्ष के अनुसार, मोहम्मद हिदायतुल्ला पर साइबर स्पेस के जरिए आतंकी संगठन आईएसआईएस की विचारधारा का प्रचार-प्रसार करने का गंभीर आरोप है। जांच के दौरान उसके पास से जब्त किए गए इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से कई आपत्तिजनक सामग्रियां बरामद हुई थीं। इसके अलावा, जांच एजेंसियों का दावा है कि उसने अपने व्यक्तिगत बैंक खाते से आईएसआईएस के समर्थन और गतिविधियों के लिए धन भी ट्रांसफर किया था।

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हाईकोर्ट ने जमानत याचिका खारिज करते हुए अपने आदेश में उल्लेख किया था कि हिदायतुल्ला ने 2018 में आईएसआईएस के कुख्यात सरगनाओं अबू बक्र अल-बगदादी और अबू अल-हसन अल-हाशिमी अल-कुरैशी के नाम पर वफादारी की शपथ (बैयत) ली थी। अदालत के दस्तावेजों के मुताबिक, अबू बक्र अल-बगदादी ने जून 2014 में ‘खिलाफत’ की घोषणा की थी। अभियोजन पक्ष ने यह भी आरोप लगाया है कि हिदायतुल्ला ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर हिंदुओं के प्रति दुश्मनी को बढ़ावा देने वाले संदेश पोस्ट किए थे, ताकि भारत सरकार के खिलाफ नफरत फैलाई जा सके।

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