सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह ऑनलाइन हिंसा की धमकियों, निजी जानकारी सार्वजनिक करने और सहमति के बिना अंतरंग सामग्री साझा करने जैसे गंभीर डिजिटल अपराधों से निपटने के लिए आवश्यक सुधारात्मक कदम उठाए। शीर्ष अदालत ने इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी, गृह, और विधि एवं न्याय मंत्रालय को इस संबंध में सौंपे गए एक विस्तृत ज्ञापन का परीक्षण करने और उचित कार्रवाई करने को कहा है।
डिजिटल अपराधों पर जनहित याचिका
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की तीन सदस्यीय पीठ नरेंद्र कुमार गोस्वामी द्वारा व्यक्तिगत रूप से दायर जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिकाकर्ता ने डिजिटल माध्यमों से होने वाले गंभीर नुकसान को रोकने के लिए एक प्रभावी निगरानी तंत्र स्थापित करने की मांग की है।
याचिका में कहा गया है कि गैर-सहमति से बनाई गई अंतरंग सामग्री, डिजिटल पहचान की चोरी, खतरनाक विषाक्त पदार्थों का प्रसार और बच्चों के स्कूल के पते जैसी निजी जानकारी को उजागर करना गंभीर अपराध हैं। ये गतिविधियां नागरिकों के समानता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, निजता, गरिमा और जीवन के मौलिक अधिकारों का हनन करती हैं।
विशेषज्ञों की भूमिका पर जोर
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता ने मामले की तात्कालिकता को दर्शाते हुए सवाल उठाया कि यदि रात 9 बजे किसी महिला के घर का पता बलात्कार की धमकी के साथ इंटरनेट पर पोस्ट कर दिया जाए, तो क्या उस सामग्री को ऑनलाइन रहने दिया जाना चाहिए?
इस पर सीजेआई सूर्यकांत ने टिप्पणी की कि याचिकाकर्ता ने आधुनिक साइबर खतरों के विभिन्न पहलुओं को बेहतर ढंग से प्रस्तुत किया है। हालांकि, पीठ ने स्पष्ट किया कि ऐसे अपराधों को रोकने और तकनीकी स्तर पर उनका पता लगाने के उपाय तय करना विषय विशेषज्ञों का काम है।
प्रशासनिक समीक्षा के निर्देश
याचिकाकर्ता ने अदालत को सूचित किया कि उन्होंने 22 जून को तीनों संबंधित मंत्रालयों के सचिवों को इस संबंध में एक ज्ञापन सौंपा था, जिसमें अंतरराष्ट्रीय नियमों और अन्य देशों के कानूनी ढांचे का तुलनात्मक विवरण भी शामिल था।
अदालत ने माना कि इस स्तर पर प्रशासनिक स्तर पर समीक्षा करना ही सही तरीका है। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने तीनों केंद्रीय मंत्रालयों और अन्य हितधारकों को 22 जून के ज्ञापन में उठाए गए बिंदुओं पर विचार कर आवश्यक सुधारात्मक कदम उठाने को कहा।

