मेडिकल और फोरेंसिक रिपोर्ट की अनदेखी कर दोषमुक्ति रद्द करना गलत, सुप्रीम कोर्ट ने दुष्कर्म के मामले में बरी करने का फैसला बहाल किया

सुप्रीम कोर्ट ने हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के उस फैसले को रद्द कर दिया है जिसमें दुष्कर्म के एक मामले में आरोपी को बरी किए जाने के फैसले को पलट दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब अभियोजन पक्ष के गवाहों के मौखिक बयानों और मेडिकल व फोरेंसिक साक्ष्यों के बीच सीधा विरोधाभास हो, तो मामला संदेह से परे साबित नहीं होता। जस्टिस उज्ज्वल भुयान और जस्टिस अतुल एस. चंद्रपुरकर की पीठ ने माना कि हाईकोर्ट ने निचली अदालत के विचारपूर्ण फैसले को उलटते समय अंतिम मेडिकल रिपोर्ट और फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी (FSL) की जांच रिपोर्ट पर ध्यान न देकर भारी चूक की थी।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला 28 जून 2009 को हुई एक कथित घटना से जुड़ा है। अभियोजन पक्ष के अनुसार, शिकायतकर्ता की साढ़े चार साल की बेटी सुबह करीब 8:30 बजे अपने पड़ोसी के घर गई थी और आधे घंटे बाद वापस लौटी।

घर लौटने पर मां ने बच्ची के कपड़ों पर खून के धब्बे देखे, जिसके बाद उसने बच्ची को नहलाया और कपड़े धो दिए। अपने पति और पिता से बात करने के बाद, मां ने शाम 5:45 बजे प्राथमिकी दर्ज कराई। इसमें आरोप लगाया गया कि आरोपी ने बच्ची के साथ यौन उत्पीड़न किया और बाद में फोन कर माफी भी मांगी।

ट्रायल कोर्ट ने 12 जनवरी 2010 को अपने फैसले में आरोपी को बरी कर दिया था। अदालत ने पाया था कि पीड़िता, उसकी मां और रिश्तेदार के बयानों में गंभीर विरोधाभास हैं और वे विश्वास योग्य नहीं हैं। इसके अलावा, मेडिकल जांच में पीड़िता के शरीर पर चोट का कोई निशान नहीं मिला था।

हालांकि, हिमाचल प्रदेश सरकार की अपील पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने 3 जून 2016 को बरी किए जाने का आदेश रद्द कर दिया। हाईकोर्ट ने आरोपी को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 376 के तहत दोषी ठहराते हुए 10 साल के कठोर कारावास और ₹50,000 जुर्माने की सजा सुनाई थी। इसके बाद इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई।

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पक्षों की दलीलें

याचिकाकर्ता (आरोपी) की ओर से पेश वकील ने तर्क दिया कि हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के विस्तृत और तर्कसंगत फैसले पर उचित विचार किए बिना बरी किए जाने का आदेश रद्द कर दिया, जो कि न्यायसंगत नहीं था। उन्होंने ध्यान दिलाया कि जब प्राथमिक जांच में कोई चोट नहीं मिली, तो अभियोजन पक्ष के गवाहों ने अपने बयानों में सुधार करने का प्रयास किया।

वकील ने एफएसएल (FSL) रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि बेंजीडीन टेस्ट (Benzidine Test) किए जाने के बावजूद पीड़िता के कपड़ों या घटना स्थल से जब्त की गई चटाई और बैठक पर रक्त या वीर्य का कोई निशान नहीं मिला। ‘मोदी की मेडिकल ज्यूरिसप्रूडेंस’ और विभिन्न शोध पत्रों का संदर्भ देते हुए उन्होंने कहा कि जब स्क्रीनिंग टेस्ट में ही खून की पुष्टि नहीं हुई, तो आरोपी पर लगाए गए आरोप पूरी तरह से निराधार हो जाते हैं।

दूसरी ओर, राज्य सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त अधिवक्ता जनरल ने सजा का समर्थन किया। उन्होंने तर्क दिया कि हाईकोर्ट ने साक्ष्यों का सही पुनर्मूल्यांकन किया था। उन्होंने कहा कि पीड़िता का बयान विश्वसनीय था और केवल मेडिकल साक्ष्यों के आधार पर प्रत्यक्षदर्शी के बयान को खारिज नहीं किया जा सकता। राज्य सरकार ने दावा किया कि ट्रायल कोर्ट का आदेश त्रुटिपूर्ण था, जिसे हाईकोर्ट ने सही तरीके से सुधारा।

सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण

सुप्रीम कोर्ट ने गवाहों के बयानों के साथ-साथ मेडिकल और फॉरेंसिक रिपोर्ट का बारीकी से परीक्षण किया। घटना की रात ही डॉक्टर द्वारा की गई जांच में पीड़िता के शरीर पर चोट, सूजन, लालिमा या खरोंच का कोई निशान नहीं मिला था और उसकी हाइमन सुरक्षित थी। अंतिम मेडिकल रिपोर्ट में भी यह स्पष्ट किया गया कि प्रवेश (penetration) का कोई प्रमाण नहीं मिला है। चिकित्सा अधिकारी ने यह भी गवाही दी कि यदि किसी मासूम बच्ची के साथ यौन शोषण होता, तो उसके शरीर पर चोट के निशान अवश्य होते, जो इस मामले में पूरी तरह गायब थे।

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इसके अलावा, घटना स्थल से जब्त चटाई और पीड़िता के कपड़े फॉरेंसिक जांच के लिए भेजे गए थे। एफएसएल रिपोर्ट का स्पष्ट निष्कर्ष था:

“प्रदर्शित वस्तुओं पर किए गए जैविक और सीरोलॉजिकल परीक्षण में चटाई, बैठक, पीड़िता के कपड़ों (सलवार, कमीज, पैजामी), आरोपी के अंतःवस्त्रों, ग्लान्स स्वैब, प्यूबिक हेयर तथा वैजाइनल स्लाइड/स्वैब पर रक्त और वीर्य नहीं पाया गया।”

बेंजीडीन टेस्ट की विश्वसनीयता पर अदालत ने वैज्ञानिक साहित्य का हवाला देते हुए कहा कि कपडे़ को दस बार धोने के बाद भी यह टेस्ट खून की मौजूदगी का पता लगा सकता है। यदि यह जांच नकारात्मक आती है, तो उस परिणाम को विश्वसनीय माना जाता है।

अदालत ने घटनास्थल को लेकर मौजूद भारी विरोधाभास को भी रेखांकित किया। जहां पीड़िता ने कहा था कि घटना एक चारपाई पर हुई, वहीं जांच अधिकारी का कहना था कि घटना रसोई में हुई, जहां कोई चारपाई या बिस्तर था ही नहीं।

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हाईकोर्ट की कार्यप्रणाली पर टिप्पणी करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा:

“हाईकोर्ट का मानना था कि घटनास्थल को लेकर विरोधाभास बहुत महत्वपूर्ण नहीं था। हाईकोर्ट ने अभियोजन पक्ष के साक्ष्यों को स्वीकार कर लिया, लेकिन अंतिम मेडिकल रिपोर्ट और एफएसएल (FSL) रिपोर्ट दोनों पर विचार नहीं किया।”

सम्पूर्ण साक्ष्यों का पुनः मूल्यांकन करते हुए पीठ ने टिप्पणी की:

“जब अभियोजन पक्ष के गवाहों के बयानों को अंतिम मेडिकल रिपोर्ट और एफएसएल की रिपोर्ट के साथ मिलाकर देखा जाता है, तो पीड़िता और उसकी मां के बयानों पर गंभीर संदेह पैदा होता है।”

अदालत ने आगे कहा:

“हम रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री को यह मानने के लिए पर्याप्त नहीं पाते हैं कि अभियोजन पक्ष ने अपने मामले को संदेह से परे साबित कर दिया है। इस संबंध में प्रस्तुत साक्ष्य कम पड़ते हैं और वास्तव में अभियोजन पक्ष के दावे पर गहरा संदेह पैदा करते हैं।”

निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट के 3 जून 2016 के निर्णय को रद्द कर दिया। ट्रायल कोर्ट के बरी करने के आदेश को बहाल करते हुए अदालत ने आरोपी को भारतीय दंड संहिता की धारा 376 के तहत लगाए गए आरोपों से बरी कर दिया और उसके जमानत बांड रद्द कर दिए।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: राम सिंह बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य
वाद संख्या: आपराधिक अपील संख्या 1052/2016
पीठ: जस्टिस उज्ज्वल भुयान, जस्टिस अतुल एस. चंद्रपुरकर
निर्णय की तिथि: 11 अगस्त 2026

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