आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट की एक डिवीजन बेंच, जिसमें जस्टिस रवि नाथ तिलहरी और जस्टिस पुरुषोत्तम कुमार चिंतालपुडी शामिल हैं, ने प्रिवेंशन ऑफ इलिसिट ट्रैफिक इन नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रॉपिक सब्सटेंसेस एक्ट, 1988 (PIT NDPS Act) के तहत जारी एक निवारक निरोध (प्रिवेंटिव डिटेंशन) आदेश और उसकी पुष्टि के आदेश को रद्द कर दिया है। हाईकोर्ट ने माना कि हिरासत में लिए गए व्यक्ति को पूर्व में दी गई जमानत के आदेशों जैसी महत्वपूर्ण सामग्री को निरोध प्राधिकरण (डिटेनिंग अथॉरिटी) के समक्ष न रखना और उन पर विचार न करना प्राधिकरण की व्यक्तिगत संतुष्टि (सब्जेक्टिव सैटिस्फैक्शन) को दूषित करता है, जिससे निरोध आदेश कानूनी रूप से अमान्य हो जाता है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला याचिकाकर्ता राय पवित्रा द्वारा दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण (हेबियस कॉर्पस) रिट याचिका से जुड़ा है। इसमें विशाखापत्तनम के सेंट्रल जेल में बंद परवडा सूर्या श्याम कुमार के निवारक निरोध आदेश को चुनौती दी गई थी।
राजस्व (आबकारी-II) विभाग के प्रधान सचिव (एफएसी) ने PIT NDPS एक्ट, 1988 की धारा 3(1) के तहत 1 जनवरी 2026 को जी.ओ.आर.टी. सं. 2 के माध्यम से निरोध आदेश जारी किया था। इसके बाद राज्य सरकार ने 16 फरवरी 2026 को जी.ओ.आर.टी. सं. 261 के तहत इस आदेश की पुष्टि कर दी थी।
यह निवारक निरोध आदेश एनडीपीएस एक्ट, 1985 की धारा 20(b)(ii)(C) के तहत दर्ज दो आपराधिक मामलों के आधार पर जारी किया गया था:
- अरिलोवा पुलिस स्टेशन में दर्ज अपराध संख्या 117/2023।
- विशाखापत्तनम के एयरपोर्ट पुलिस स्टेशन में दर्ज अपराध संख्या 35/2025।
पहले मामले में आरोपी को 12 जुलाई 2023 को जमानत मिली थी, जबकि दूसरे मामले में 19 अगस्त 2025 को जमानत मंजूर की गई थी।
पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ता के वकील श्री डी. पूर्णचंद्र रेड्डी ने दलील दी कि 1 जनवरी 2026 को निरोध आदेश जारी होने से काफी पहले दोनों मामलों में जमानत मिल चुकी थी। इसके बावजूद दोनों में से किसी भी जमानत आदेश को निरोध प्राधिकरण के समक्ष न तो रखा गया और न ही उन पर विचार किया गया। ऐसे में महत्वपूर्ण तथ्यों की अनदेखी के कारण निरोध प्राधिकरण का निर्णय दूषित हो गया।
प्रतिवादियों की ओर से पेश सहायक सरकारी वकील श्री अकुला वेंकट साई जगदीशा ने माना कि 2023 के मामले में प्रस्ताव भेजते समय जमानत आदेश को निरोध प्राधिकरण के समक्ष नहीं रखा गया था। वहीं 2025 के मामले को लेकर उन्होंने तर्क दिया कि जमानत 19 अगस्त 2025 को मिली थी, जो प्रस्ताव भेजने की तारीख के बाद की थी, इसलिए इसे प्रस्ताव दस्तावेजों में शामिल नहीं किया जा सका। उन्होंने जवाबदावे का हवाला देते हुए स्वीकार किया कि जमानत आदेशों को डिटेनिंग अथॉरिटी के समक्ष प्रस्तुत नहीं किया गया था।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और नजीरें
रिकॉर्ड का अवलोकन करने के बाद पीठ ने पाया कि दोनों जमानत आदेश 1 जनवरी 2026 को निरोध आदेश पारित होने से काफी पहले मंजूर किए जा चुके थे। पीठ ने स्पष्ट किया कि भले ही दूसरा जमानत आदेश शुरुआती प्रस्ताव की तारीख के बाद आया था, लेकिन वह निरोध आदेश formally पारित होने की तारीख से पहले का था।
अपने निष्कर्षों की पुष्टि के लिए हाईकोर्ट ने पूर्व में दिए गए सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के फैसलों का हवाला दिया:
- ऋषिकेश तानाजी भोईटे बनाम महाराष्ट्र राज्य ((2012) 2 SCC 72):
- सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि जब हिरासत में लिया गया व्यक्ति जमानत पर बाहर हो, तो जमानत का आदेश निरोध प्राधिकरण के समक्ष प्रस्तुत किया जाना अनिवार्य है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था:
- “ऐसे मामले में जहां हिरासत में लिया गया व्यक्ति जमानत पर रिहा है और निरोध आदेश पारित करते समय अदालत के आदेश के तहत अपनी स्वतंत्रता का आनंद ले रहा है, तो ऐसा जमानत आदेश, हमारी राय में, डिटेनिंग अथॉरिटी के समक्ष रखा जाना चाहिए ताकि वह उचित संतुष्टि पर पहुंच सके।”
- सुप्रीम कोर्ट ने आगे कहा था:
- “…जमानत आदेश जैसी महत्वपूर्ण सामग्री को प्रस्तुत न करना और उस पर विचार न करना डिटेनिंग अथॉरिटी के निर्णय को दूषित करता है।”
- बुद्दिगा धना लक्ष्मी बनाम आंध्र प्रदेश राज्य (डब्ल्यू.पी. सं. 33545/2025):
- हाईकोर्ट ने माना था कि जमानत आदेश और उसकी शर्तें निरोध का निर्णय लेने से पहले व्यक्तिगत संतुष्टि तक पहुंचने के लिए आवश्यक सामग्री हैं:
- “जमानत आदेश और उसकी शर्तें यह तय करने के लिए प्रासंगिक सामग्री हैं कि यदि निरोध का आदेश पारित किया जाना बाकी है तो संतुष्टि तक कैसे पहुंचा जाए।”
हाईकोर्ट का फैसला
कानून के स्थापित सिद्धांतों को लागू करते हुए हाईकोर्ट ने माना कि जमानत आदेशों जैसे महत्वपूर्ण साक्ष्यों पर विचार न करने से शुरुआती निरोध आदेश और बाद का पुष्टि आदेश दोनों ही अमान्य हो जाते हैं।
अदालत ने रिट याचिका को स्वीकार करते हुए 1 जनवरी 2026 के निरोध आदेश और 16 febrero 2026 के पुष्टि आदेश को रद्द कर दिया। इसके साथ ही हिरासत में लिए गए व्यक्ति को किसी अन्य मामले में वांछित न होने पर तुरंत रिहा करने का निर्देश दिया।
इसके अलावा, चूंकि आदेशों को प्रक्रियागत खामियों के आधार पर रद्द किया गया था, इसलिए हाईकोर्ट ने सरकार के प्रधान सचिव को कानून के अनुसार नया आदेश पारित करने की स्वतंत्रता दी। हालांकि, कोर्ट ने शर्त रखी कि नए आदेश की स्थिति में कुल निरोध अवधि, पहले से काटी गई अवधि को मिलाकर, 12 महीने से अधिक नहीं होनी चाहिए।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: राय पवित्रा बनाम आंध्र प्रदेश राज्य एवं 4 अन्य
वाद संख्या: रिट याचिका संख्या 6491/2026
पीठ: जस्टिस रवि नाथ तिलहरी और जस्टिस पुरुषोत्तम कुमार चिंतालपुडी
निर्णय की तिथि: 28 जुलाई 2026

