केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में एक हलफनामा दाखिल कर 2012 के क्लीनिकल एस्टेब्लिशमेंट नियमों की संवैधानिक वैधता का बचाव किया है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने अदालत को बताया कि निजी व गैर-सरकारी अस्पतालों में इलाज और चिकित्सा प्रक्रियाओं की दरों की सीमा (रेट बैंड) तय करने का नियम पूरी तरह संवैधानिक है। इसका मुख्य उद्देश्य आम लोगों के लिए स्वास्थ्य सेवाओं को किफायती बनाना और मरीजों का शोषण रोकना है।
संविधान के अनुच्छेद 47 और जनहित का हवाला
4 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट में दायर अपने काउंटर-एफिडेविट में केंद्र सरकार ने ‘क्लीनिकल एस्टेब्लिशमेंट (सेंट्रल गवर्नमेंट) रूल्स, 2012’ के नियम 9(ii) को चुनौती देने वाली याचिकाओं का जवाब दिया। सरकार ने स्पष्ट किया कि 2010 के मूल अधिनियम के तहत बनाए गए ये नियम संविधान के अनुच्छेद 47 में दिए गए नीति निदेशक तत्वों के अनुरूप हैं, जो राज्य को जनस्वास्थ्य में सुधार का दायित्व सौंपते हैं।
मंत्रालय के अनुसार, जब कानून किसी चिकित्सा संस्थान में सेवाओं और सुविधाओं के न्यूनतम मानक तय करता है, तो उन सेवाओं के बदले ली जाने वाली दरों की एक सीमा निर्धारित करना भी उसी प्रक्रिया का स्वाभाविक अंग है। इसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि इलाज इतना महंगा न हो कि आम नागरिक की पहुंच से बाहर हो जाए, और न ही इतना कम हो कि स्वास्थ्य उद्योग के विकास पर असर पड़े।
अस्पताल सामान्य व्यावसायिक प्रतिष्ठान नहीं
मूलभूत अधिकारों के उल्लंघन (अनुच्छेद 14, 19(1)(ग) और 21) के तर्कों को खारिज करते हुए केंद्र ने कहा कि मेडिकल संस्थानों की तुलना सामान्य व्यावसायिक दुकानों या कंपनियों से नहीं की जा सकती। हालांकि अस्पतालों की वित्तीय स्थिरता महत्वपूर्ण है, लेकिन सरकार के पास यह सुनिश्चित करने का अधिकार है कि मरीजों से वसूला जाने वाला शुल्क वाजिब हो।
हलफनामे में जोर दिया गया कि अनुच्छेद 19(6) के तहत किसी भी व्यापार या पेशे की तरह अस्पताल चलाने के अधिकार पर भी जनहित में उचित पाबंदियां लगाई जा सकती हैं। सरकार ने यह भी साफ किया कि नियम 9(ii) कोई एक समान या कठोर दरें लागू नहीं करता, बल्कि एक लचकदार रेट स्पेक्ट्रम प्रदान करता है। इसके तहत अस्पताल अपने बुनियादी ढांचे, सेवाओं की गुणवत्ता और स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार फीस तय करने के लिए स्वतंत्र हैं।
अन्य क्षेत्रों में मूल्य नियंत्रण का उदाहरण देते हुए सरकार ने व्यावसायिक कॉलेजों में कैपिटेशन फीस पर रोक, फार्मास्यूटिकल क्षेत्र में आवश्यक दवाओं की कीमतों की सीमा और लीगल मेट्रोलॉजी एक्ट के तहत एमआरपी (अधिकतम खुदरा मूल्य) व्यवस्था का उल्लेख किया।
राज्यों का अधिकार क्षेत्र और वर्तमान स्थिति
चूंकि स्वास्थ्य राज्य सूची का विषय है, इसलिए यह केंद्रीय कानून केवल उन्हीं राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में लागू होता है जो संविधान के अनुच्छेद 252(1) के तहत इसे अपनाने का प्रस्ताव पारित करते हैं। इसमें केंद्र की भूमिका दिशानिर्देश और मानक तैयार करने तक सीमित है, जबकि कार्यान्वयन और निगरानी की जिम्मेदारी राज्य प्रशासनों की है।
फिलहाल 19 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने इस केंद्रीय कानून को अपनाया है, जिनमें बिहार, झारखंड, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम, राजस्थान, मिजोरम, उत्तर प्रदेश, असम, हरियाणा, तेलंगाना, पुडुचेरी, दादरा और नगर हवेली तथा दमन और दीव, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह, चंडीगढ़, लक्षद्वीप, जम्मू-कश्मीर और लद्दाख शामिल हैं।
दूसरी ओर, दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र समेत 16 राज्यों—आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, पंजाब, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़, तमिलनाडु, मेघालय, केरल, कर्नाटक, मणिपुर, नागालैंड, त्रिपुरा, गुजरात और गोवा—के पास स्वास्थ्य नियमन के लिए अपने स्वतंत्र कानून हैं।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पालन करते हुए केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के अधिकारियों के साथ बैठकें कर नियम 9(ii) के सुचारू कार्यान्वयन और उनकी व्यावहारिक चिंताओं के समाधान के लिए विचार-विमर्श किया है।

