अनुकंपा नियुक्ति का अप्रूवल कायम रहते वेतन रोकने का अधिकार सरकार को नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट

अनुकंपा के आधार पर नियुक्त चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी का वेतन रोकने से जुड़े आदेशों को रद्द करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने निर्णय दिया है कि जब तक किसी कर्मचारी की नियुक्ति का औपचारिक अप्रूवल (मंजूरी) कानूनी रूप से मान्य और प्रभावी है, तब तक राज्य प्राधिकारी उसे वित्तीय लाभ देने से इनकार नहीं कर सकते। जस्टिस मंजू रानी चौहान की पीठ ने स्पष्ट किया कि प्रशासनिक प्राधिकारियों को निष्पक्षता और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन करना अनिवार्य है, और वे अपनी खुद की ढिलाई या प्रशासनिक निष्क्रियता की सजा किसी नागरिक को नहीं दे सकते।

मामले की पृष्ठभूमि

याची श्रीमती धर्मवती देवी ने बेसिक शिक्षा निदेशक, उत्तर प्रदेश द्वारा पारित 23 फरवरी 2021 और 8 मार्च 2021 के उन आदेशों को चुनौती दी थी, जिनके तहत उनके चतुर्थ श्रेणी पद के वेतन के दावे को खारिज कर दिया गया था।

याची के पति श्री विजय पाल सिंह गौतम बुद्ध नगर के लतीफपुर स्थित किसान वैदिक जूनियर हाई स्कूल में सहायक अध्यापक के रूप में कार्यरत थे, जिनकी सेवाकाल के दौरान जून 2001 में मृत्यु हो गई थी। उस समय यह संस्थान एक गैर-सहायता प्राप्त मान्यता प्राप्त जूनियर हाई स्कूल था। पति की मृत्यु के बाद, विद्यालय प्रबंध समिति ने 18 अगस्त 2001 को पत्र जारी कर याची को अनुकंपा के आधार पर चतुर्थ श्रेणी पद का प्रस्ताव दिया था।

प्रबंध समिति के 15 जून 2006 के निर्देश के बाद याची ने 1 अगस्त 2006 को पदभार ग्रहण किया। इसके बाद जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी (बीएसए), गौतम बुद्ध नगर ने 6 सितंबर 2006 को उनकी नियुक्ति को औपचारिक रूप से मंजूरी दे दी।

जब 2 दिसंबर 2006 को उत्तर प्रदेश जूनियर हाई स्कूल (अध्यापकों और अन्य कर्मचारियों के वेतन का भुगतान) अधिनियम, 1978 के तहत इस संस्थान को अनुदान सूची (ग्रांट-इन-एड) में शामिल किया गया, तब सहायक शिक्षा निदेशक (बेसिक), मेरठ/सहारनपुर मंडल ने 16 मार्च 2007 को आपत्ति दर्ज कराई। उनका तर्क था कि याची की नियुक्ति में वैधानिक प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया गया था। इसके आधार पर उनका वेतन रोक दिया गया।

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इसके खिलाफ याची ने पहले हाईकोर्ट में याचिका (रिट याचिका संख्या 58845/2008) दाखिल की थी, जिसे एकल पीठ ने खारिज कर दिया था। हालांकि, विशेष अपील संख्या 898/2011 में डिवीजन बेंच ने 18 जनवरी 2020 को टिप्पणी की थी कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई प्रमाण नहीं है जो यह दर्शाए कि रिक्त पद उपलब्ध नहीं था या बीएसए द्वारा दी गई मंजूरी को कभी रद्द किया गया था। डिवीजन बेंच ने सक्षम प्राधिकारी को मामले का पुनरीक्षण करने का निर्देश दिया था। इसके बावजूद, बेसिक शिक्षा निदेशक ने 23 फरवरी 2021 और 8 मार्च 2021 को याची के प्रत्यावेदन को पुनः खारिज कर दिया।

पक्षों की दलीलें

याची के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि अस्वीकृति का आदेश प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ था, क्योंकि सुनवाई पूरी होने के बाद अधीनस्थ अधिकारियों से प्राप्त रिपोर्टों पर निर्णय आधारित था, जिन्हें न तो याची को सौंपा गया और न ही उन पर जवाब देने का अवसर दिया गया। उन्होंने कहा कि 6 सितंबर 2006 का अप्रूवल आदेश निरंतर प्रभावी है और उसे कभी निरस्त नहीं किया गया। इसके अलावा, यह तर्क भी दिया गया कि अनुकंपा नियुक्तियां 31 जनवरी 1997 के शासनादेश से संचालित होती हैं, न कि उत्तर प्रदेश मान्यता प्राप्त बेसिक स्कूल (जूनियर हाई स्कूल) (मंत्रिमंडलीय वर्ग और समूह ‘घ’ कर्मचारियों की भर्ती और सेवा शर्तें) नियमावली, 1984 की सामान्य चयन प्रक्रिया से। प्रशासनिक देरी के लिए अभ्यर्थी को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।

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दूसरी ओर, राज्य सरकार की ओर से उपस्थित स्थायी अधिवक्ता ने दलील दी कि याची की नियुक्ति अवैध थी क्योंकि 1984 के नियमों के तहत निर्धारित चयन प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया था। राज्य का कहना था कि नियुक्ति के समय स्कूल गैर-सहायता प्राप्त था, और अनुकंपा नियुक्ति से संबंधित शासनादेश 2 दिसंबर 2006 को संस्थान के अनुदान सूची में आने के बाद ही लागू हुए। राज्य ने कहा कि बीएसए का अप्रूवल किसी अवैध नियुक्ति को वैधता प्रदान नहीं कर सकता और वेतन जारी करने के लिए कोई स्वीकृत चतुर्थ श्रेणी पद उपलब्ध नहीं था।

हाईकोर्ट का विश्लेषण और निष्कर्ष

मामले के रिकॉर्ड का परीक्षण करते हुए जस्टिस मंजू रानी चौहान ने माना कि राज्य के निर्णय का मूल आधार ही कानूनी रूप से पोषणीय नहीं है। हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि बीएसए का 6 सितंबर 2006 का मंजूरी आदेश सक्षम प्राधिकारी द्वारा कानून के अनुसार कभी वापस या रद्द नहीं किया गया था।

वेतन रोकने के रवैये पर अदालत ने कहा:

“कानून की नजर में लागू प्रशासनिक आदेश को सिर्फ उसके फायदों को रोककर निष्प्रभावी नहीं बनाया जा सकता। जब तक नियुक्ति की मंजूरी (अप्रूवल) प्रभावी है, तब तक अधिकारी परोक्ष रूप से उसकी वैधता पर सवाल उठाते हुए उससे मिलने वाले वेतन से इनकार नहीं कर सकते।”

अदालत ने डिवीजन बेंच के पूर्व आदेश की उपेक्षा करने और तय हो चुके तथ्यों को दोबारा उठाने के लिए अधिकारियों की खिंचाई की। साथ ही, सुनवाई के बाद पीठ पीछे जुटाई गई रिपोर्टों के आधार पर आदेश पारित करने को प्राकृतिक न्याय का सीधा उल्लंघन माना और कहा:

“प्रशासनिक कार्रवाई में निष्पक्षता महज कोई औपचारिकता नहीं है, बल्कि यह संविधान के अनुच्छेद 14 का एक अनिवार्य पहलू है।”

सुप्रीम कोर्ट के संविधान पीठ के निर्णय मोहिंदर सिंह गिल बनाम मुख्य निर्वाचन आयुक्त (1978) 1 SCC 405 तथा कमिश्नर ऑफ पुलिस बॉम्बे बनाम गोवर्धनदास भानजी AIR 1952 SC 16 का उल्लेख करते हुए हाईकोर्ट ने दोहराया कि सार्वजनिक आदेशों का औचित्य उनमें दर्ज कारणों से ही सिद्ध होना चाहिए, उन्हें बाद में नए स्पष्टीकरण देकर सुधारा नहीं जा सकता।

हाईकोर्ट ने यह भी माना कि राज्य की ढिलाई या प्रक्रियात्मक देरी के लिए किसी नागरिक को प्रताड़ित नहीं किया जा सकता। अदालत ने इसके लिए सुप्रीम कोर्ट के आशा कौल बनाम जम्मू-कश्मीर राज्य (1993) 2 SCC 573 के सिद्धांत का हवाला दिया।

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अनुकंपा नियुक्ति के मूल उद्देश्य पर प्रकाश डालते हुए अदालत ने रेखांकित किया:

“ऐसी नियुक्तियों की अवधारणा किसी राहत या सौगात के रूप में नहीं, बल्कि तत्काल सामाजिक कल्याण के उपाय के रूप में की गई है, जिसका उद्देश्य मृतक कर्मचारी के पीड़ित परिवार को वित्तीय विपदा से बचाना है।”

क्रांति एसोसिएट्स (पी) लिमिटेड बनाम मसूद अहमद खान (2010) 9 SCC 496 का संदर्भ देते हुए हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि अस्वीकृति के आदेशों में उचित तर्कों का अभाव था और वे संविधान के अनुच्छेद 14 व 21 का उल्लंघन करते हैं।

अदालत का निर्णय

हाईकोर्ट ने 23 फरवरी 2021 और 8 मार्च 2021 के अस्वीकृति आदेशों को निरस्त कर दिया और याची के पक्ष में रिट याचिका को स्वीकार कर लिया।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: श्रीमती धर्मवती देवी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और 5 अन्य
वाद संख्या: रिट-ए संख्या 6103/2021
पीठ: जस्टिस मंजू रानी चौहान
निर्णय की तिथि: 07 जुलाई 2026

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