सिर्फ संपत्ति के ‘शत्रु संपत्ति’ होने का दावा मकान मालिक की बेदखली याचिका को खारिज नहीं कर सकता: दिल्ली हाईकोर्ट

किराया नियंत्रण कानून से जुड़े एक महत्वपूर्ण फैसले में दिल्ली हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि दिल्ली किराया नियंत्रण अधिनियम, 1958 (डीआरसी एक्ट) की धारा 14(1)(ई) के तहत बेदखली की मांग करने वाले मकान मालिक को अपना पूर्ण या अकाट्य स्वामित्व साबित करने की आवश्यकता नहीं होती, बल्कि उसे केवल किरायेदार की तुलना में बेहतर मालिकाना हक दिखाना होता है। जस्टिस हरीश वैद्यनाथन शंकर ने माना कि किरायेदार का यह निराधार दावा कि विवादित परिसर भारत सरकार के अधीन निहित एक “शत्रु संपत्ति” (एनिमी प्रॉपर्टी) है, रेंट कंट्रोलर के क्षेत्राधिकार को समाप्त नहीं कर सकता और न ही बेदखली याचिका को खारिज करने का आधार बन सकता है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला मोहम्मद रफी द्वारा किरायेदारों अहसान उर-रब और एक अन्य के खिलाफ डीआरसी एक्ट की धारा 14(1)(ई) के तहत दायर बेदखली याचिका से उत्पन्न हुआ था। विवादित परिसर—जो चावड़ी बाजार, दिल्ली के छत्ता हाजी यूसुफ, चितली गेट स्थित संपत्ति संख्या 481 की पहली और तीसरी मंजिल का हिस्सा (छत के अधिकारों के साथ) है—मूल रूप से मूल मकान मालिक हाजी मोहम्मद मुस्लिम द्वारा किरायेदारों के पूर्वजों को किराये पर दिया गया था। वर्षों के दौरान, पंजीकृत बिक्री पत्रों के माध्यम से संपत्ति का स्वामित्व बदलता रहा और अंततः 8 सितंबर 2005 को मोहम्मद रफी ने इसे खरीद लिया।

जब मोहम्मद रफी ने अपनी व्यक्तिगत और वास्तविक आवश्यकता का हवाला देते हुए बेदखली याचिका दायर की, तो किरायेदारों ने जवाब देने की अनुमति (लीव टू डिफेंड) के लिए आवेदन प्रस्तुत किया। उन्होंने बेदखली का विरोध केवल इस आधार पर किया कि मूल मकान मालिक हाजी मोहम्मद मुस्लिम पाकिस्तान चले गए थे, जिसके कारण यह संपत्ति “शत्रु संपत्ति” की श्रेणी में आ गई और कानून के तहत स्वतः ही केंद्र सरकार में निहित हो गई। नतीजतन, किरायेदारों का तर्क था कि वे भारत सरकार के अधीन किरायेदार बन गए हैं, मोहम्मद रफी के साथ उनका कोई मकान मालिक-किरायेदार का संबंध नहीं है, और इसलिए एडिशनल रेंट कंट्रोलर (एआरसी) के पास याचिका पर सुनवाई का क्षेत्राधिकार नहीं है।

26 मई 2026 को एआरसी-02 (सेंट्रल जिला, तिस हजारी कोर्ट, दिल्ली) ने किरायेदारों के ‘लीव टू डिफेंड’ आवेदन को खारिज कर दिया और बेदखली का आदेश जारी किया। इस आदेश को चुनौती देते हुए किरायेदारों ने हाईकोर्ट में पुनरीक्षण याचिका (रिविजन पिटीशन) दायर की।

हाईकोर्ट में पक्षकारों की दलीलें

दिल्ली हाईकोर्ट के समक्ष, याचिकाकर्ताओं (किरायेदारों) ने अपनी चुनौती को केवल क्षेत्राधिकार के प्रश्न तक ही सीमित रखा। याचिकाकर्ताओं के वकील ने तर्क दिया कि एक बार जब संपत्ति शत्रु संपत्ति अधिनियम के तहत भारत सरकार में निहित हो जाती है, तो कोई निजी व्यक्ति स्वामित्व का दावा नहीं कर सकता और न ही डीआरसी एक्ट के प्रावधानों के तहत बेदखली याचिका बनाए रख सकता है।

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यह भी तर्क दिया गया कि कानून के संचालन के माध्यम से याचिकाकर्ता भारत सरकार के अधीन किरायेदार बन गए हैं, जिससे एआरसी का बेदखली आदेश क्षेत्राधिकार के अभाव के कारण अमान्य और शून्य हो जाता है।

अदालत का विश्लेषण और टिप्पणियां

जस्टिस हरीश वैद्यनाथन शंकर ने डीआरसी एक्ट की धारा 25-बी(8) के परंतुक के तहत हाईकोर्ट की पुनरीक्षण शक्ति की सीमित सीमाओं को दोहराते हुए मामले का विश्लेषण शुरू किया। सरला आहूजा बनाम यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड, हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड बनाम दिलबहार सिंह, और आबिद-उल-इस्लाम बनाम इंदर सैन दुआ जैसे सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने टिप्पणी की:

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“धारा 25-बी(8) का परंतुक हाईकोर्ट को विद्वान रेंट कंट्रोलर के आदेश के खिलाफ पुनरीक्षण की अनन्य शक्ति प्रदान करता है, जो अधीनस्थ अदालत की निर्णय लेने की प्रक्रिया और प्रक्रियात्मक अनुपालन पर पर्यवेक्षण के रूप में है। इस प्रकार, हाईकोर्ट से यह अपेक्षा नहीं की जाती कि वह अपीलीय क्षेत्राधिकार का प्रयोग करके ट्रायल कोर्ट के विचारों के स्थान पर अपने विचार रखे।”

स्वामित्व विवाद और शत्रु संपत्ति के दावों पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने किराया विवादों को नियंत्रित करने वाले स्थापित कानूनी सिद्धांतों को रेखांकित किया। कोर्ट ने कहा कि जीवन लाल बनाम गुरदियाल कौर, रमेश चंद बनाम उगंती देवी, और श्रीमती शांति शर्मा बनाम श्रीमती वेद प्रभा के मामलों के अनुसार, धारा 14(1)(ई) के तहत बेदखली याचिका में पूर्ण मालिकाना हक का निर्धारण आवश्यक नहीं है।

कोर्ट ने स्पष्ट किया:

“यह स्थापित सिद्धांत है कि डीआरसी एक्ट की धारा 14(1)(ई) के तहत मकान मालिक को पूर्ण या अकाट्य स्वामित्व सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं है, बल्कि केवल किरायेदार की तुलना में बेहतर स्वामित्व दिखाना पर्याप्त है…”

कस्टोडियन ऑफ एनिमी प्रॉपर्टी में संपत्ति निहित होने के किरायेदारों के दावे पर हाईकोर्ट ने माना कि ऐसा बचाव बेदखली याचिका को विफल नहीं कर सकता और न ही रेंट कंट्रोलर को जटिल स्वामित्व विवादों का फैसला करने के लिए बाध्य कर सकता है। इलाहाबाद हाईकोर्ट के निर्णय रामेश्वर दयाल बनाम कस्टोडियन ऑफ एनिमी प्रॉपर्टी फॉर इंडिया का संदर्भ देते हुए कोर्ट ने कहा:

“…यदि ऐसा कोई दावा मान भी लिया जाए, तो भी यह स्वतः ही प्रतिवादी को विद्वान एआरसी के समक्ष वर्तमान कार्यवाही बनाए रखने के अधिकार से वंचित नहीं करता है, और न ही यह डीआरसी एक्ट की धारा 14(1)(ई) के तहत बेदखली याचिका पर निर्णय लेने के एआरसी के क्षेत्राधिकार को समाप्त करता है।”

“जैसा कि विद्वान एआरसी ने सही माना है, यदि कस्टोडियन ऑफ एनिमी प्रॉपर्टी विवादित परिसर पर कोई स्वतंत्र अधिकार जताता है या शत्रु संपत्ति अधिनियम के तहत कार्यवाही करना चाहता है, तो कस्टोडियन के लिए कानून के अनुसार सक्षम मंच के समक्ष उचित कार्यवाही शुरू करने का विकल्प हमेशा खुला है।”

इसके अलावा, कोर्ट ने ध्यान दिलाया कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 116 (अब भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 की धारा 122) के तहत, जो किरायेदार स्वीकार करता है कि उसे पूर्व मकान मालिक द्वारा किराये पर रखा गया था, वह कब्जे में रहते हुए मकान मालिक के स्वामित्व को नकारने या किसी तीसरे पक्ष के स्वामित्व का दावा करने से विबंधित (एस्टॉप्ड) है।

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अंतिम निर्णय

विद्वान रेंट कंट्रोलर के आदेश में कोई क्षेत्राधिकार संबंधी त्रुटि, स्पष्ट अवैधता या विकृति न पाते हुए हाईकोर्ट ने माना कि मोहम्मद रफी ने पंजीकृत बिक्री विलेखों की श्रृंखला के आधार पर किरायेदारों से बेहतर मालिकाना हक सफलतापूर्व सिद्ध किया है।

तदनुसार, हाईकोर्ट ने लंबित आवेदनों के साथ पुनरीक्षण याचिका को खारिज कर दिया और किरायेदारों के खिलाफ पारित बेदखली आदेश को बरकरार रखा।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: अहसान उर-रब और अन्य बनाम मोहम्मद रफी
वाद संख्या: आरसी.रेव. 267/2026 एवं सीएम एपीपीएल. 51433/2026
पीठ: जस्टिस हरीश वैद्यनाथन शंकर
निर्णय की तिथि: 06.08.2026

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