छेड़छाड़ के सबूत के बिना केवल ‘कस्टडी की कड़ी टूटने’ की दलील पर डीएनए रिपोर्ट को खारिज नहीं किया जा सकता: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने पॉक्सो (POCSO) एक्ट से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए स्पष्ट किया है कि केवल यह सामान्य दलील देने भर से कि बायोलॉजिकल सैंपल के रख-रखाव या ‘कस्टडी की कड़ी’ (Chain of Custody) में व्यवधान आया था, डीएनए रिपोर्ट को खारिज नहीं किया जा सकता, जब तक कि नमूनों के साथ छेड़छाड़, फेरबदल या दूषित होने का कोई ठोस साक्ष्य न हो। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने एक अपील को खारिज करते हुए अपनी नाबालिग रिश्तेदार के साथ यौन उत्पीड़न के दोषी की सजा और 20 साल के कठोर कारावास को बरकरार रखा।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला 28 मार्च 2020 को पुलिस स्टेशन दोंडी में दर्ज कराई गई एक लिखित शिकायत के बाद शुरू हुआ था। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि लगभग पांच से छह महीने पहले आरोपी ने अपनी नाबालिग रिश्तेदार को बहला-फुसलाकर उसके साथ जबरन शारीरिक संबंध बनाए, जिससे वह गर्भवती हो गई। घटना के समय पीड़िता नौवीं कक्षा की छात्रा थी।

जांच पूरी होने के बाद पुलिस ने चार्जशीट दाखिल की। फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट (पॉक्सो), बालोद ने 12 दिसंबर 2023 को आरोपी को पॉक्सो एक्ट की धारा 6 के तहत दोषी ठहराते हुए 20 साल के कठोर कारावास और 2,000 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई। इस फैसले को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 415(2) के तहत हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी।

पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि सजा का फैसला मुख्य रूप से पीड़िता के बयान पर आधारित है, जो विरोधाभासों से भरा हुआ है। जिरह के दौरान पीड़िता ने कहा था कि उसने 23 जून 2020 को एक बच्चे को जन्म दिया और किसी तीसरे व्यक्ति को उसका पिता बताया था।

पीड़िता की उम्र के संबंध में बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि स्कूल रजिस्टर में दर्ज उसकी जन्म तिथि (23 मई 2005) कानून के अनुसार साबित नहीं हुई, क्योंकि स्कूल के हेडमास्टर इस प्रविष्टि के लेखक नहीं थे और न ही उन्हें इसके स्रोत की जानकारी थी। इसके अलावा, मौखिक साक्ष्यों में जन्म तिथि 23 मई 2000 बताई गई थी। डीएनए रिपोर्ट को चुनौती देते हुए अपीलकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय कट्टावेल्लई उर्फ देवाकर बनाम तमिलनाडु राज्य (2025) का हवाला दिया और कहा कि अभियोजन पक्ष नमूनों की सुरक्षित कस्टडी की अटूट श्रृंखला साबित करने में विफल रहा।

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दूसरी ओर, राज्य सरकार के वकील ने अपील का विरोध करते हुए कहा कि स्कूल दाखिला रजिस्टर के माध्यम से पीड़िता का नाबालिग होना साबित हुआ है। उन्होंने कहा कि पीड़िता के बयान की पुष्टि मेडिकल साक्ष्य, एफएसएल रिपोर्ट और डीएनए रिपोर्ट से होती है, जिसने नवजात बच्चे के जैविक पिता की पहचान पूरी तरह स्थापित की है।

हाईकोर्ट का विश्लेषण और कानूनी निष्कर्ष

उम्र के निर्धारण पर

पीड़िता की उम्र का विश्लेषण करते हुए हाईकोर्ट ने नोट किया कि यद्यपि मौखिक साक्ष्यों में जन्म तिथि को लेकर भिन्नता है, लेकिन दस्तावेजी साक्ष्यों का साक्ष्य मूल्य अधिक होता है। अदालत ने जरनैल सिंह बनाम हरियाणा राज्य (2013) में सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय सिद्धांतों का संदर्भ दिया, जो बाल न्याय नियमों के तहत नाबालिग की उम्र निर्धारण का मार्गदर्शन करते हैं।

हाईकोर्ट ने माना कि स्कूल रिकॉर्ड को असंगत मौखिक गवाही पर प्राथमिकता दी जानी चाहिए। स्कूल दाखिला रजिस्टर के अनुसार पीड़िता की जन्म तिथि 23 मई 2005 दर्ज थी और उसके पिता ने कभी भी इस तिथि को सुधारने के लिए आवेदन नहीं किया था। अतः अदालत ने माना कि घटना की तिथि पर पीड़िता 18 वर्ष से कम आयु की थी और पॉक्सो एक्ट के तहत एक ‘बच्ची’ थी।

डीएनए साक्ष्य और कस्टडी की श्रृंखला

वैज्ञानिक साक्ष्यों पर विचार करते हुए बेंच ने डीएनए रिपोर्ट का परीक्षण किया, जिसमें नवजात के मैटर्नल जेनेटिक मार्कर पीड़िता से और पैटर्नल जेनेटिक मार्कर अपीलकर्ता से मेल खाते पाए गए। जांच अधिकारी ने साबित किया कि रक्त के नमूने नियमानुसार एकत्र कर राज्य फोरेंसिक साइंस प्रयोगशाला, रायपुर भेजे गए थे।

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नमूनों के रख-रखाव पर बचाव पक्ष की आपत्ति को खारिज करते हुए बेंच ने टिप्पणी की: “केवल नमूनों को संभालने के तरीके पर सामान्य आपत्ति उठाना, बिना किसी ऐसे साक्ष्य के जो पूर्वाग्रह या छेड़छाड़ को दर्शाता हो, किसी अन्यथा विश्वसनीय वैज्ञानिक रिपोर्ट को खारिज करने के लिए पर्याप्त नहीं होगा।”

सुप्रीम कोर्ट के मुकेश एवं अन्य बनाम राज्य (एनसीटी दिल्ली) (2017) निर्णय का हवाला देते हुए पीठ ने कहा: “उपरोक्त निर्णयों से यह पूरी तरह स्पष्ट है कि डीएनए रिपोर्ट को तब तक स्वीकार किया जाना चाहिए जब तक कि यह पूरी तरह से संदिग्ध न हो जाए और इसे अस्वीकार करने के लिए यह स्थापित किया जाना चाहिए कि कोई गुणवत्ता नियंत्रण या गुणवत्ता आश्वासन नहीं था। यदि नमूनाकरण उचित है और नमूनों से छेड़छाड़ का कोई साक्ष्य नहीं है, तो डीएनए परीक्षण रिपोर्ट को स्वीकार किया जाना चाहिए।”

अदालत ने माना कि पितृत्व का वैज्ञानिक प्रमाण मिलने के बाद साबित करने का भार आरोपी पर चला जाता है कि किन परिस्थितियों में गर्भधारण हुआ। आरोपी ने इस संबंध में कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया।

पीड़िता के साक्ष्यों का मूल्यांकन

पीड़िता के बयानों में आई विसंगतियों पर हाईकोर्ट ने यौन अपराधों के मुकदमों से संबंधित स्थापित न्यायशास्त्र की समीक्षा की। अदालत ने रामेश्वर बनाम राजस्थान राज्य (1952) में जस्टिस विवियन बोस की टिप्पणी को उद्धृत किया: “मामलों के अनुसार जो नियम कानून के रूप में कठोर हो गया है, वह यह नहीं है कि सजा सुनाने से पहले पुष्टि होना अनिवार्य है, बल्कि बुद्धिमत्ता के मामले में पुष्टि की आवश्यकता, उन परिस्थितियों को छोड़कर जहां इसके बिना निर्णय देना सुरक्षित हो, न्यायाधीश के दिमाग में रहनी चाहिए…”

पीठ ने आगे पंजाब राज्य बनाम गुरमीत सिंह (1996), रणजीत हजारिका बनाम असम राज्य (1998) और राय संदीप उर्फ दीनू बनाम दिल्ली राज्य (2012) का संदर्भ देते हुए कहा कि अदालतों को यौन अपराध के मामलों को संवेदनशीलता से संभालना चाहिए। चूंकि पीड़िता नाबालिग थी, इसलिए उसकी सहमति कानूनन महत्वहीन है।

हाईकोर्ट का निर्णय

निचले अदालत के फैसले में कोई अवैधता न पाते हुए हाईकोर्ट ने अपील खारिज कर दी और पॉक्सो एक्ट की धारा 6 के तहत दोषसिद्धि और सजा की पुष्टि की। अदालत ने निर्देश दिया कि अपीलकर्ता अपनी शेष सजा काटने के लिए जेल में रहेगा।

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मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: सूरज धामागाया बनाम छत्तीसगढ़ राज्य

वाद संख्या: क्रिमिनल अपील नंबर 1796/2024 पीठ: चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल

निर्णय की तिथि: 30 जुलाई 2026

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