मद्रास हाईकोर्ट के जस्टिस शमीम अहमद ने एक फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि शिकायतकर्ता और आरोपी दोनों अनुसूचित जाति (SC) समुदाय से ताल्लुक रखते हैं, तो अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 की धारा 3(1)(r) और 3(1)(s) के तहत अपराध का मामला नहीं बनता। हाईकोर्ट ने एक आपराधिक रिवीजन याचिका को खारिज करते हुए ट्रायल कोर्ट के उस आदेश को सही ठहराया, जिसमें SC/ST एक्ट के तहत संज्ञान लेने से इनकार कर दिया गया था। इसके साथ ही अदालत ने शिकायतकर्ता को भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 के तहत अन्य कानूनी उपाय अपनाने की छूट बरकरार रखी है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला कोयंबटूर के पोदनूर स्थित साउदर्न रेलवे की सिग्नल एंड टेलीकम्युनिकेशन वर्कशॉप से जुड़ा है। याचिकाकर्ता एस. कृष्णराज और प्रतिवादी आर. रगुपति दोनों इसी वर्कशॉप में कार्यरत हैं। याचिकाकर्ता के अनुसार, जो खुद अनुसूचित जाति समुदाय से हैं, 12 जुलाई 2025 को सुबह करीब 06:45 बजे जब वह वर्कशॉप जा रहे थे, तब प्रतिवादी ने उन्हें रास्ते में रोका। आरोप है कि प्रतिवादी ने उन्हें जातिसूचक गालियां देकर अपमानित किया और उनके सिर तथा चेहरे पर हमला कर दिया, जिससे उनके सिर और कोहनी में चोटें आईं। दोपहिया वाहन से जा रही एक महिला ने उन्हें बचाया।
याचिकाकर्ता ने 13 जुलाई 2025 को पोदनूर पुलिस स्टेशन के निरीक्षक को शिकायत सौंपी। आरोप है कि 16 जुलाई 2025 को पुलिस ने उन्हें जातिसूचक अपशब्दों के आरोपों को हटाने का निर्देश दिया और शिकायत को आपसी समझौते के रूप में बंद कर दिया। हालांकि, 17 जुलाई 2025 को याचिकाकर्ता को मिर्गी का दौरा पड़ा और 18 जुलाई के स्कैन रिपोर्ट में उनके सिर में तीन स्थानों पर रक्तस्राव (हेमरेज) की पुष्टि हुई। सीसीटीवी फुटेज की जांच के लिए आवेदन देने के बावजूद पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की।
इसके बाद याचिकाकर्ता ने विशेष न्यायालय (SC/ST एक्ट मामलात), कोयंबटूर में एक प्राइवेट कंप्लेंट दाखिल की। इसमें SC/ST एक्ट की धारा 3(1)(r) व 3(1)(s) तथा भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धारा 115(2) के तहत कार्रवाई की मांग की गई थी।
21 नवंबर 2025 को स्पेशल कोर्ट ने यह कहते हुए शिकायत खारिज कर दी कि शिकायतकर्ता और आरोपी दोनों ही अनुसूचित जाति समुदाय से हैं। कोर्ट ने BNS की धारा 115(2) के तहत अलग से शिकायत दर्ज करने की स्वतंत्रता दी। इस फैसले से असंतुष्ट होकर याचिकाकर्ता ने मद्रास हाईकोर्ट में रिवीजन याचिका दाखिल की।
पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ता के वकील जे. नागराजन ने हाईकोर्ट के समक्ष दलील दी कि जब ट्रायल कोर्ट ने यह स्वीकार कर लिया था कि प्रतिवादी ने याचिकाकर्ता के सिर और कोहनी में चोट पहुंचाई है और सार्वजनिक स्थान पर अपमानित किया है, तो कोर्ट को सक्षम पुलिस अधिकारियों से जांच कराने और अपराध का संज्ञान लेने का आदेश देना चाहिए था।
दूसरी ओर, प्रतिवादी ने ट्रायल कोर्ट के सामने अपना रुख स्पष्ट करते हुए कहा था कि उसने कोई अपराध नहीं किया है और पुलिस शिकायत पहले ही आपसी सहमति से बंद हो चुकी है। उसने कहा कि कार्यस्थल के पुराने विवाद के कारण उसे परेशान करने की नीयत से यह शिकायत दर्ज कराई गई है। इसके साथ ही उसने अपना हिंदू आदि द्रविड़ समुदाय का जाति प्रमाण पत्र पेश किया, जो अनुसूचित जाति की श्रेणी में आता है।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और न्यायिक नज़ीरें
जस्टिस शमीम अहमद ने SC/ST एक्ट की धारा 3(1)(r) और 3(1)(s) के तहत अपराध साबित करने के लिए आवश्यक कानूनी तत्वों का विश्लेषण किया:
- आरोपी व्यक्ति अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति का सदस्य नहीं होना चाहिए।
- आरोपी ने अनुसूचित जाति या जनजाति के सदस्य को जातिसूचक नाम से जानबूझकर अपमानित, प्रताड़ित या गाली दी हो।
- आरोपी की नीयत पीड़ित को अपमानित करने की रही हो।
- यह कृत्य सार्वजनिक रूप से दिखाई देने वाले किसी स्थान पर हुआ हो।
हाईकोर्ट ने कहा कि अधिनियम की धारा 3 की प्राथमिक आवश्यकता यह है कि आरोपी SC या ST समुदाय का गैर-सदस्य हो। कोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता ने खुद स्वीकार किया था कि प्रतिवादी ने नौकरी में शामिल होते समय SC वर्ग का दावा किया था और प्रतिवादी ने हिंदू आदि द्रविड़ समुदाय से संबंधित होने के दस्तावेज भी पेश किए थे। याचिकाकर्ता ऐसा कोई सबूत पेश नहीं कर सका जिससे यह साबित हो कि आरोपी गैर-SC वर्ग से है।
इसके अलावा, कोर्ट ने यह भी नोट किया कि याचिकाकर्ता ने किसी स्वतंत्र गवाह का परीक्षण नहीं कराया और न ही ऐसा कोई साक्ष्य प्रस्तुत किया जिससे यह साबित हो सके कि कथित घटना किसी सार्वजनिक स्थान पर हुई थी।
कानूनी सिद्धांतों को स्पष्ट करते हुए हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के कई महत्वपूर्ण फैसलों का उल्लेख किया:
हितेश वर्मा बनाम उत्तराखंड राज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था: “किसी व्यक्ति का केवल अपमान या प्रताड़ना तब तक इस एक्ट के तहत अपराध नहीं बनता जब तक कि ऐसा अपमान या प्रताड़ना पीड़ित के अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति से होने के कारण न किया गया हो।” “इसलिए, केवल इस तथ्य से कि शिकायतकर्ता अनुसूचित जाति का सदस्य है, इस एक्ट के तहत अपराध सिद्ध नहीं होता, जब तक कि पीड़ित को उसकी जाति के आधार पर अपमानित करने की नीयत न हो।”
रमेश चंद्र वैश्य बनाम यूपी राज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट ने माना था: “विधायिका का इरादा स्पष्ट है कि हर अपमान या प्रताड़ना SC/ST एक्ट की धारा 3(1)(x) के तहत अपराध नहीं होगी, जब तक कि वह अपमान या प्रताड़ना पीड़ित को केवल उसकी विशिष्ट अनुसूचित जाति या जनजाति का सदस्य होने के कारण लक्षित न की गई हो।”
भैया लाल सिंह बनाम यूपी राज्य मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने टिप्पणी की थी: “1989 के इस अधिनियम के तहत अपराध तब माना जाएगा जब समाज के इस वंचित वर्ग के सदस्य को सार्वजनिक रूप से दिखाई देने वाले किसी स्थान पर अपमान, प्रताड़ना या उत्पीड़न का सामना करना पड़ा हो।”
इन सिद्धांतों का सार बताते हुए हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया: “संक्षेप में, अनुसूचित जाति या जनजाति के सदस्य के साथ किया गया हर अपमान या प्रताड़ना 1989 के अधिनियम के तहत अपराध नहीं बनता, जब तक कि ऐसा अपमान या प्रताड़ना इस आधार पर न किया गया हो कि पीड़ित SC या ST समुदाय से संबंध रखता है।”
हाईकोर्ट का निर्णय
हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि चूंकि याचिकाकर्ता और प्रतिवादी दोनों ही अनुसूचित जाति समुदाय से हैं, इसलिए SC/ST एक्ट, 1989 की धारा 3(1)(r) और 3(1)(s) लागू नहीं हो सकतीं।
ट्रायल कोर्ट के आदेश में कोई त्रुटि या अवैधता न पाते हुए हाईकोर्ट ने रिवीजन याचिका को खारिज कर दिया। साथ ही याचिकाकर्ता को BNS, 2023 के प्रावधानों के तहत नई शिकायत दर्ज करने की स्वतंत्रता को बरकरार रखा।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: एस. कृष्णराज बनाम आर. रगुपति
वाद संख्या: आपराधिक पुनरीक्षण याचिका संख्या 1618/2026
पीठ: जस्टिस शमीम अहमद
निर्णय की तिथि: 05.08.2026

