टीएमए पाई फैसले के साथ सबवेंशन स्कीम समाप्त: सुप्रीम कोर्ट ने 2002 के बाद 5 साल के सबवेंशन भुगतान का हाईकोर्ट का आदेश रद्द किया

जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की सुप्रीम कोर्ट पीठ ने निर्णय दिया है कि 31 अक्टूबर 2002 को 11 न्यायाधीशों की पीठ द्वारा संबंधित योजना को असंवैधानिक घोषित कर दिए जाने के बाद मेडिकल कॉलेज पूरे पांच साल के कोर्स के लिए वार्षिक सबवेंशन भुगतान का दावा नहीं कर सकते। केंद्र सरकार और कर्नाटक सरकार द्वारा श्री देवराज उर्स मेडिकल कॉलेज के खिलाफ दायर अपील को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक हाईकोर्ट के उस निर्देश को रद्द कर दिया, जिसमें 2002-03 शैक्षणिक सत्र के दौरान प्रवेश लेने वाले छात्रों के लिए पूरे पांच साल की अवधि हेतु सबवेंशन राशि देने को कहा गया था।

मामले का बैकग्राउंड

इस विवाद की जड़ें 11 अगस्त 1995 को टीएमए पाई फाउंडेशन एवं अन्य बनाम कर्नाटक राज्य एवं अन्य मामले में पारित एक अंतरिम आदेश से जुड़ी हैं। इस आदेश के तहत कैपिटेशन फीस को खत्म करने और व्यावसायिक पाठ्यक्रमों में योग्यता के आधार पर प्रवेश सुनिश्चित करने के उद्देश्य से एक सबवेंशन योजना शुरू की गई थी। इस योजना के तहत केंद्र सरकार द्वारा 1995-96 शैक्षणिक वर्ष से छात्रों (एनआरआई को छोड़कर) के लिए प्रति छात्र ₹5,000 की वार्षिक सबवेंशन राशि अधिकतम पांच वर्ष या पाठ्यक्रम पूरा होने तक दी जाती थी।

13 मई 2005 को केंद्र सरकार ने एक पत्र जारी कर शैक्षणिक वर्ष 2002-03 और उसके बाद के लिए सबवेंशन भुगतान देने से इनकार कर दिया। श्री देवराज उर्स मेडिकल कॉलेज ने इस फैसले को कर्नाटक हाईकोर्ट में चुनौती दी।

कर्नाटक हाईकोर्ट की सिंगल बेंच ने सरकार के पत्र को रद्द करते हुए केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह 2002-03 शैक्षणिक वर्ष तक प्रवेश लेने वाले छात्रों के लिए पांच साल या कोर्स पूरा होने तक सबवेंशन राशि का भुगतान करे। सिंगल बेंच का मानना था कि कॉलेज के पक्ष में एक निहित अधिकार (वेस्टेड राइट) बन गया था, जिसे 31 अक्टूबर 2002 के टीएमए पाई फाउंडेशन के अंतिम फैसले से भूतलक्षी (रिट्रोस्पेक्टिव) रूप से छीना नहीं जा सकता। बाद में हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने भी 3 जुलाई 2009 को सिंगल बेंच के आदेश को बरकरार रखा, जिसके खिलाफ केंद्र और राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की।

पक्षकार की दलीलें और हाईकोर्ट का निष्कर्ष

हाईकोर्ट की सिंगल बेंच ने कर्नाटक राज्य बनाम टीएमए पाई फाउंडेशन एवं अन्य में 1 अप्रैल 2003 के एक स्पष्टीकरण निर्णय का सहारा लिया था। हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला था कि 11 न्यायाधीशों की पीठ द्वारा घोषित कानून भविष्यगामी (प्रॉस्पेक्टिव) था और उसने 11 अगस्त 1995 के अंतरिम आदेश के तहत की गई कार्रवाइयों को सुरक्षित रखा था।

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हालांकि, सुप्रीम कोर्ट के समक्ष केंद्र और राज्य सरकारों ने तर्क दिया कि जब 11 न्यायाधीशों की पीठ ने मुख्य योजना को ही असंवैधानिक घोषित कर दिया, तो 31 अक्टूबर 2002 के बाद सबवेंशन देने का कोई दायित्व शेष नहीं रह जाता।

सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

सुप्रीम कोर्ट ने टीएमए पाई फाउंडेशन एवं अन्य बनाम कर्नाटक राज्य में 11 न्यायाधीशों की पीठ के फैसले का विश्लेषण किया, जिसने उन्नीकृष्णन जे.पी. एवं अन्य बनाम आंध्र प्रदेश राज्य एवं अन्य में तय की गई योजना को निरस्त कर दिया था। 11 न्यायाधीशों की पीठ ने प्रश्न संख्या 9 का उत्तर इस प्रकार दिया था:

“उन्नीकृष्णन मामले में इस अदालत द्वारा बनाई गई योजना और उसे लागू करने का निर्देश, प्राथमिक शिक्षा को मौलिक अधिकार मानने वाले हिस्से को छोड़कर, असंवैधानिक है। हालांकि, यह सिद्धांत सही है कि कैपिटेशन फीस या मुनाफाखोरी नहीं होनी चाहिए। सुविधाओं के विस्तार और संवर्धन की लागत को पूरा करने के लिए उचित अधिशेष मुनाफाखोरी की श्रेणी में नहीं आता है।”

हाईकोर्ट के तर्क का मूल्यांकन करते हुए पीठ की ओर से निर्णय लिखते हुए जस्टिस शील नागू ने टिप्पणी की कि सबवेंशन योजना एक वार्षिक प्रतिबद्धता थी, न कि एकमुश्त अनुदान। सुप्रीम कोर्ट ने माना कि असंवैधानिक घोषित होते ही कार्यकारी योजनाएं स्वतः समाप्त हो जाती हैं:

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“हालांकि, योजनाएं या कार्यकारी निर्देश, विशेष रूप से सबवेंशन योजना, 31.10.2002 को स्वयं ही समाप्त हो गईं, जब 11 न्यायाधीशों की पीठ द्वारा टीएमए पाई फाउंडेशन मामले के अंतिम निर्णय में इस योजना को असंवैधानिक घोषित कर दिया गया था।”

कानून के भविष्यगामी लागू होने के तर्क पर स्पष्ट करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 1 अप्रैल 2003 के स्पष्टीकरण आदेश ने कार्यकारी योजनाओं के लिए मुख्य फैसले को भविष्यगामी नहीं बनाया था। पी.वी. जॉर्ज बनाम केरल राज्य का हवाला देते हुए कोर्ट ने न्यायिक घोषणाओं के स्थापित सिद्धांत को दोहराया:

“अदालत द्वारा घोषित कानून का प्रभाव भूतलक्षी होगा, जब तक कि स्पष्ट रूप से इसके विपरीत न कहा गया हो…”

अदालत ने स्पष्ट किया कि 11 न्यायाधीशों की पीठ के फैसले और 1 अप्रैल 2003 के स्पष्टीकरण आदेश को एक साथ पढ़ने से यह साफ होता है कि भविष्यगामी प्रभाव केवल उन वैधानिक प्रावधानों के लिए था, जिनमें संस्थानों को फीस संरचना में संशोधन की अनुमति देने हेतु बदलाव की आवश्यकता थी, न कि कार्यकारी सबवेंशन योजनाओं के लिए।

इसके अलावा, सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने पूछा कि क्या प्रतिवादी-कॉलेज ने यह दर्शाने के लिए कोई डेटा प्रस्तुत किया है कि वर्ष 2002-03 के लिए उसकी ट्यूशन फीस और अन्य राजस्व परिचालन खर्चों से कम थे। चूंकि ऐसा कोई डेटा पेश नहीं किया गया, कोर्ट ने भारत सिंह एवं अन्य बनाम हरियाणा राज्य एवं अन्य का हवाला देते हुए इस बात पर जोर दिया कि रिट याचिकाओं में पक्षों को साक्ष्यों के साथ तथ्य साबित करने होते हैं:

“हालांकि दीवानी मामले की याचिका में केवल तथ्यों का उल्लेख करना आवश्यक होता है, साक्ष्यों का नहीं, लेकिन एक रिट याचिका या जवाबी हलफनामे में न केवल तथ्य बल्कि ऐसे तथ्यों को साबित करने वाले साक्ष्य भी पेश किए जाने चाहिए और याचिका के साथ संलग्न किए जाने चाहिए।”

सुप्रीम कोर्ट ने इस तथ्य पर भी ध्यान दिया कि सबवेंशन बंद होने से बड़ी संख्या में संस्थान प्रभावित हुए थे, लेकिन इसके खिलाफ केवल दो कॉलेजों ने ही अदालत का दरवाजा खटखटाया, जो एक महत्वपूर्ण बात है।

अंतिम निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने अपील को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए कर्नाटक हाईकोर्ट के आदेशों को उस सीमा तक रद्द कर दिया, जहां 2002-03 सत्र में प्रवेश लेने वाले छात्रों के लिए पूरे 5 साल के कोर्स की अवधि हेतु सबवेंशन भुगतान का निर्देश दिया गया था। कोर्ट ने निर्णय दिया कि एक बार सबवेंशन योजना असंवैधानिक घोषित हो जाने के बाद 31 अक्टूबर 2002 से आगे भुगतान का निर्देश देना अनुचित था।

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इससे जुड़ी एसएलपी (सिविल) संख्या 9079/2011 से उत्पन्न अपील को भी समान शर्तों पर निस्तारित किया गया।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: भारत सरकार एवं अन्य बनाम श्री देवराज उर्स मेडिकल कॉलेज
वाद संख्या: सिविल अपील संख्या 10669 / 2010 (विशेष अनुमति याचिका (सिविल) संख्या 9079 / 2011 से उत्पन्न सिविल अपील के साथ)
पीठ: जस्टिस दीपांकर दत्ता, जस्टिस शील नागू
निर्णय की तिथि: 04 अगस्त 2026

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