एआई डीपफेक मामला: बॉम्बे हाईकोर्ट का मेटा और गूगल को सख्त निर्देश, नितिन गडकरी से जुड़े आपत्तिजनक कंटेंट तुरंत हटाने का दिया आदेश

बॉम्बे हाईकोर्ट ने केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी के खिलाफ सोशल मीडिया पर प्रसारित किए जा रहे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) जनरेटेड डीपफेक और आपत्तिजनक डिजिटल कंटेंट को तुरंत हटाने का आदेश दिया है। अदालत ने मेटा (Meta), गूगल (Google LLC) और अन्य टेक प्लेटफॉर्म्स को निर्देश दिया है कि वे गडकरी द्वारा चिन्हित किए गए सभी आपत्तिजनक लिंक हटाएं तथा ऐसा कंटेंट अपलोड करने वाले यूजर्स का ब्योरा भी उपलब्ध कराएं।

अदालत की सख्त टिप्पणी और निर्देश

बुधवार को मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस आरिफ एस. डॉक्टर ने कहा कि इंटरनेट पर मौजूद यह सामग्री बेहद घटिया, अपमानजनक और मानहानिकारक है। उन्होंने कहा कि इस तरह की सामग्री का किसी भी सार्वजनिक मंच पर कोई स्थान नहीं होना चाहिए, क्योंकि इसे समाज के सभी वर्ग और युवा भी देखते हैं।

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हाईकोर्ट ने गडकरी को अंतरिम राहत प्रदान करते हुए निर्देश दिया कि यदि यह सामग्री दोबारा री-अपलोड होती है या आगे भी गडकरी से जुड़ा कोई नया डीपफेक कंटेंट सामने आता है, तो शिकायत मिलने पर प्लेटफॉर्म्स को उस पर तुरंत कार्रवाई करनी होगी।

11 करोड़ रुपये के मुआवजे की मांग

केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने अपनी याचिका में बिना सहमति के चेहरे, आवाज, नाम और हाव-भाव का व्यावसायिक व सार्वजनिक इस्तेमाल करने पर 11 करोड़ रुपये के मुआवजे की मांग की है। याचिका में एआई-जनरेटेड इमेज, फेस-स्वैप वीडियो, कार्टून और एक इंस्टाग्राम रील से जुड़े 26 विशिष्ट लिंक का उल्लेख किया गया है, जिन्हें इथेनॉल-मिश्रित ईंधन नीति से जुड़े विवाद से जोड़कर फैलाया जा रहा था।

इस मामले में मुख्य रूप से मेटा, गूगल, ‘एक्स कॉर्प’ और अज्ञात प्रकाशकों (जॉन डो या अशोक कुमार) को पक्षकार बनाया गया है। याचिका में यह भी साफ किया गया है कि इसका उद्देश्य सरकार की नीतियों या आधिकारिक फैसलों पर सार्वजनिक बहस और आलोचना को रोकना नहीं है, बल्कि व्यक्तिगत मानहानि और गाली-गलौज वाले डीपफेक पर लगाम लगाना है।

आईटी नियमों के तहत जवाबदेही का मुद्दा

गडकरी के वकील संदीप एस. लड्डा ने अदालत में तर्क दिया कि डिजिटल कंटेंट अपलोड होते ही तेजी से दोबारा प्रसारित होने लगता है। कई पोस्ट पर यूजर की पहचान स्पष्ट न होने के कारण अज्ञात संस्थाओं (जॉन डो) को आरोपी बनाना पड़ा। उन्होंने कहा कि सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) नियमों के तहत सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स मध्यस्थ (इंटरमीडियरी) की भूमिका में हैं और उन्हें हानिकारक सामग्री के प्रसार को रोकने के लिए उचित निगरानी रखनी चाहिए।

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सुनवाई के दौरान कोर्ट ने भी प्लेटफॉर्म्स की स्वचालित नीतियों और तकनीक पर सवाल उठाए। जस्टिस डॉक्टर ने टेक प्लेटफॉर्म्स से पूछा कि जब उनके पास इतनी आधुनिक तकनीक उपलब्ध है, तो वे सार्वजनिक रूप से प्रसारित होने वाली बेहद आपत्तिजनक भाषा और सामग्री को खुद ही चिन्हित कर हटाने की व्यवस्था क्यों नहीं करते?

टेक कंपनियों का आश्वासन

अदालत के समक्ष मेटा प्लेटफॉर्म्स और गूगल एलएलसी का प्रतिनिधित्व कर रहे वकीलों ने आश्वासन दिया कि वे चिन्हित सामग्री को अपने प्लेटफॉर्म्स से तुरंत हटा देंगे। टेक कंपनियों के इस आश्वासन को स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट ने उन्हें विवादित पोस्ट करने वाले सब्सक्राइबर्स और यूजर्स का विवरण भी मुहैया कराने का निर्देश दिया।

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