केरल हाईकोर्ट ने नौ वर्षीय मासूम बच्चे के साथ तीन साल से अधिक समय तक बार-बार यौन शोषण करने के मामले में 61 वर्षीय चाय विक्रेता की 20 साल की सश्रम कैद और 25,000 रुपये जुर्माने की सजा को बरकरार रखा है। हाईकोर्ट ने निचली अदालत द्वारा सुनाई गई सजा के खिलाफ दायर अपील को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि इस अपराध के लिए कानूनन सजा कम करने की कोई गुंजाइश नहीं है।
सजा कम करने का कोई कानूनी प्रावधान नहीं
जस्टिस ए. बदरुद्दीन की पीठ ने 20 जुलाई को अपने फैसले में कहा कि यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (पोक्सो) कानून की धारा 6 के तहत 20 साल का सश्रम कारावास ही तय न्यूनतम और अधिकतम दंड है। ऐसे में अदालत के पास कानूनी रूप से सजा की अवधि को घटाने का कोई अधिकार नहीं है।
चोट न मिलना मामले को खारिज करने की वजह नहीं
हाईकोर्ट ने बचाव पक्ष की उन दलीलों को पूरी तरह नकार दिया जिनमें बच्चे की मेडिकल जांच में चोट न मिलने और घटना की जानकारी देने में हुई देरी को आधार बनाया गया था। अदालत ने कहा कि जिस प्रकार के कृत्य (ओरल सेक्स) को अंजाम दिया गया, उसमें शरीर पर प्रत्यक्ष शारीरिक चोट लगने की संभावना बेहद कम होती है। लिहाजा, डॉक्टर द्वारा चोट न पाए जाने मात्र से अभियोजन पक्ष के पूरे मामले को संदिग्ध नहीं ठहराया जा सकता। इसके अलावा, आरोपी की मेडिकल पोटेंसी जांच में भी ऐसा कुछ नहीं मिला जिससे यह संकेत मिले कि वह यौन कृत्य करने में असमर्थ था।
घटना की जानकारी देरी से दिए जाने के सवाल पर हाईकोर्ट ने पीड़ित बच्चे के उस बयान को विश्वसनीय माना जिसमें उसने कहा था कि वह अपनी मां के डर के कारण इतने समय तक चुप रहा।
बची हुई चाय देने का लालच देकर घर बुलाता था आरोपी
मामले के अनुसार, आरोपी पीड़ित बच्चे के पिता का रिश्तेदार है और चाय की दुकान चलाता है। 1 जून 2020 से 5 अगस्त 2023 के बीच उसने कई मौकों पर बच्चे के परिवार के लिए बची हुई चाय देने का झांसा देकर उसे बहलाया-फुसलाया। आरोपी अपनी पत्नी की अनुपस्थिति में बच्चे को अपने घर ले जाता था और वहां उसका यौन उत्पीड़न करता था।
मामले का खुलासा अगस्त 2023 के पहले हफ्ते में आखिरी घटना के बाद हुआ। इसके बाद पुलिस ने भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) के तहत अप्राकृतिक कृत्य और पोक्सो कानून की विभिन्न धाराओं में मामला दर्ज किया था। विशेष पोक्सो अदालत ने साक्ष्यों के आधार पर आरोपी को दोषी ठहराते हुए 20 साल की कैद और जुर्माने की सजा सुनाई थी।
अदालत में दोनों पक्षों की दलीलें
सुनवाई के दौरान आरोपी की ओर से पेश अधिवक्ता ए.वी. इंदिरा और श्रीदेवी एस. ने तर्क दिया कि अभियोजन पक्ष संदेह से परे अपराध साबित करने में विफल रहा है। उन्होंने बच्चे की दादी के बयान का हवाला देते हुए दावा किया कि आरोपी और बच्चे की मां के बीच पहले से पैसे या अन्य विवाद था, जिसके चलते यह झूठा केस दर्ज कराया गया।
दूसरी तरफ, लोक अभियोजक एम.ए. शिहाब और पीड़ित का पक्ष रख रहे अधिवक्ता के. अरविंद ने तर्क दिया कि बच्चे की गवाही पूरी तरह से सुसंगत और परिवार के बयानों से समर्थित है। पीड़ित की मां ने अदालत को बताया कि आरोपी के अनुचित व्यवहार के कारण ही उनके बड़े बेटे ने पहले ही उसकी दुकान से चाय लाना बंद कर दिया था। हाईकोर्ट ने अभियोजन के तर्कों को स्वीकार करते हुए निचली अदालत के निर्णय की पुष्टि की।

