पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने गुरु नानक विद्या भंडार ट्रस्ट की 32 बीघा जमीन को अवैध रूप से हड़पने के उद्देश्य से अदालती कार्यवाही में हेरफेर करने और फोरम शॉपिंग करने के आरोपी एक वकील की नियमित जमानत याचिका खारिज कर दी है। मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस मनीषा बत्रा ने टिप्पणी की कि एक कानूनी पेशेवर होने के नाते, याचिकाकर्ता से अपने कृत्यों के कानूनी परिणामों के प्रति पूरी तरह जागरूक होने की अपेक्षा की जाती है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला जीरकपुर-पटियाला रोड पर स्थित 32 बीघा जमीन से जुड़े दो अलग-अलग मामलों से उत्पन्न हुआ है, जिन्हें हाईकोर्ट द्वारा 18 अक्टूबर 2023 को दिए गए निर्देश के बाद केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) को सौंप दिया गया था।
पहली एफआईआर (संख्या 133) दिल्ली स्थित गुरु नानक विद्या भंडार ट्रस्ट के प्रबंधक हरजीत सिंह की शिकायत पर दर्ज की गई थी। उन्होंने आरोप लगाया कि ट्रस्ट ने 1986 में यह जमीन खरीदी थी और इस पर उनका कब्जा था। आरोपी संजीव कुमार गाथा, राजेश कुमार गाबा, राजेंद्र कुमार और सरबजीत सिंह ने ट्रस्ट के समान नाम से एक फर्जी ट्रस्ट बनाया और जाली दस्तावेज तैयार किए। आरोप है कि 10 मार्च 2022 को हथियारबंद हमलावरों ने ट्रस्ट की जमीन में जबरन प्रवेश कर सुरक्षाकर्मियों के साथ मारपीट की और सीसीटीवी कैमरों को नुकसान पहुंचाया।
दूसरी एफआईआर (संख्या 303) इंदर दीप की शिकायत पर दर्ज हुई थी, जिसमें आरोपियों द्वारा फर्जी दस्तावेजों के आधार पर ट्रस्ट की जमीन पर मालिकाना हक का दावा करने का आरोप लगाया गया था। सीबीआई ने इन दोनों एफआईआर को दर्ज कर जांच शुरू की।
सीबीआई की जांच और आरोपी वकील की भूमिका
सीबीआई जांच के अनुसार, आरोपियों ने याचिकाकर्ता (जो एक अभ्यास करने वाला वकील है) के माध्यम से सिविल जज (जूनियर डिवीजन), डेरा बस्सी की अदालत में एक दीवानी मुकदमा दायर किया था। जब अदालत ने 4 अप्रैल 2022 को उनके अंतरिम रोक के आवेदन को खारिज करते हुए आरोपियों के खिलाफ सख्त टिप्पणियां कीं, तो याचिकाकर्ता वकील ने मामले की सुनवाई को डेरा बस्सी से बठिंडा स्थानांतरित करने का प्रयास किया, जहां वह नियमित रूप से वकालत करता था।
सीबीआई के अनुसार, याचिकाकर्ता ने चार पूरी तरह से असंबद्ध मामलों (जिमें एक घरेलू हिंसा का मामला भी शामिल था) में असली ट्रस्ट के बैंक अधिकारियों और आधिकारिक रिकॉर्ड को सम्मन करवाकर वित्तीय जानकारी हासिल की। जांच में यह भी सामने आया कि वादियों की जानकारी या सहमति के बिना इन सम्मनों को जारी करवाया गया था।
एक अन्य पक्षकार प्रभुदीप सिंह ने बयान दिया कि उसने कभी भी ट्रस्ट के रिकॉर्ड या गवाहों को बुलाने का आवेदन दायर नहीं किया था और याचिकाकर्ता ने धोखाधड़ी से उसके हस्ताक्षर लिए थे। उसने एक ऑडियो रिकॉर्डिंग भी सौंपी जिसमें वकील ने अनुचित रूप से दस्तावेज सम्मन करने की बात स्वीकार की और उसे सीबीआई जांच में सहयोग न करने के लिए कहा।
चार्जशीट दाखिल होने के बाद याचिकाकर्ता ने 15 जुलाई 2025 को आत्मसमर्पण कर दिया था। विशेष सीबीआई अदालत, मोहाली द्वारा 31 अक्टूबर 2025 को उसकी जमानत याचिका खारिज किए जाने के बाद उसने हाईकोर्ट का रुख किया था।
अदालत में पक्ष और तर्क
याचिकाकर्ता के वरिष्ठ वकील ने तर्क दिया कि उसने जांच में पूरा सहयोग किया है और उससे कोई बरामदगी नहीं होनी है। यह भी कहा गया कि मूल एफआईआर में उसका नाम नहीं था और कथित जालसाजी मार्च 2022 से पहले की है, जब उसका सह-आरोपियों से कोई संबंध नहीं था। वकील केवल पेशेवर क्षमता में अपने मुवक्किल का प्रतिनिधित्व कर रहा था। वह 25 जुलाई 2025 से हिरासत में है और कुल 145 गवाहों में से केवल 2 की जांच हुई है, जिससे मुकदमे के जल्द पूरा होने की संभावना कम है।
इसके विपरीत, सीबीआई के विशेष सरकारी वकील और शिकायतकर्ता के वरिष्ठ वकील ने जमानत का कड़ा विरोध किया। उन्होंने कहा कि याचिकाकर्ता ने बैंक अधिकारियों और अन्य सह-आरोपियों के साथ मिलकर झूठे बयान दर्ज कराने, अन्य मुकदमों में हेरफेर करने और असली ट्रस्ट के रिकॉर्ड प्राप्त करने में सक्रिय भूमिका निभाई है। उन्होंने आशंका जताई कि जमानत पर रिहा होने पर आरोपी साक्ष्यों के साथ छेड़छाड़ कर सकता है और गवाहों को डरा-धमका सकता है।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और निर्णय
सभी पक्षों के तर्कों का अध्ययन करने के बाद हाईकोर्ट ने वकील को जमानत देने से इनकार कर दिया। आरोपी के सक्रिय आचरण और आरोपों की गंभीरता पर ध्यान केंद्रित करते हुए जस्टिस मनीषा बत्रा ने कहा:
“आरोपों से प्रथम दृष्टया याचिकाकर्ता द्वारा सह-आरोपियों के साथ मिलकर शिकायतकर्ता-ट्रस्ट की जमीन हड़पने के लिए एक संगठित आपराधिक नेटवर्क बनाने का मामला बनता है। पेशे से अधिवक्ता होने के नाते, यह माना जाता है कि वह कानूनी प्रक्रियाओं में हेरफेर करके किए गए अपने कृत्यों के परिणामों से भली-भांति अवगत थे, जिसका उद्देश्य स्पष्ट रूप से शिकायतकर्ता-ट्रस्ट के हित को नुकसान पहुंचाते हुए न्यायिक परिणाम को प्रभावित करना था।”
अदालत ने माना कि याचिकाकर्ता को नियमित जमानत का लाभ नहीं दिया जा सकता और याचिका को खारिज कर दिया।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: विकास कुमार बनाम केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो
वाद संख्या: सीआरएम-एम-64309-2025 (ओएंडएम)
पीठ: जस्टिस मनीषा बत्रा
निर्णय की तिथि: 27.07.2026

