मद्रास हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि सरकारी या जन प्राधिकरण आरटीआई अधिनियम की धारा 8 का सहारा लेकर अपनी सामान्य प्रशासनिक जानकारियों को नहीं छिपा सकते। अदालत ने हाईकोर्ट रजिस्ट्री को अपनी ‘पार्टी-इन-पर्सन’ समिति से जुड़ी तमाम प्रशासनिक जानकारियां याचिकाकर्ता को सौंपने का निर्देश दिया है, हालांकि समिति के सदस्यों के आचरण से जुड़े रिकॉर्ड को इस दायरे से बाहर रखा गया है।
क्या है पूरा मामला
यह विवाद अकबर अहमद नाम के एक नागरिक द्वारा 28 जुलाई 2021 को दाखिल किए गए आरटीआई आवेदन से शुरू हुआ था। आवेदक ने ‘मद्रास हाईकोर्ट (कंडक्ट ऑफ प्रोसीडिंग्स बाय पार्टी-इन-पर्सन) रूल्स 2019’ के तहत गठित ‘पार्टी-इन-पर्सन’ समिति के सदस्यों के नाम, पद, शैक्षणिक योग्यता, अनुभव, उपलब्धियां, कार्यक्षेत्र, वेतनमान और भत्तों का ब्योरा मांगा था। इसके साथ ही उन्होंने प्रशासनिक समिति के अधिकारों, क्षेत्राधिकार और समिति सदस्यों के आचरण से संबंधित रिकॉर्ड की मांग की थी।
हाईकोर्ट के जन सूचना अधिकारी और प्रथम अपीलीय प्राधिकारी ने सतर्कता जांच से जुड़े एक पुराने फैसले का हवाला देते हुए इस अर्जी को खारिज कर दिया था। इसके बाद आवेदक ने तमिलनाडु सूचना आयोग में अपील की। सूचना आयोग ने 18 अक्टूबर 2023 को हाईकोर्ट रजिस्ट्री को मांगी गई जानकारी मुहैया कराने और अनुपालन रिपोर्ट सौंपने का आदेश दिया। इस आदेश को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल ने याचिका दाखिल की थी।
सतर्कता जांच और प्रशासनिक ब्योरे में अंतर
मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस एम धंधपाणि ने रजिस्ट्री की दलीलों को खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि सतर्कता जांच या अनुशासनात्मक मामलों का ब्योरा अलग होता है क्योंकि उसे सार्वजनिक करने से संस्थागत कामकाज प्रभावित हो सकता है और व्यक्तिगत निजता का उल्लंघन होता है। इसके विपरीत किसी समिति का गठन, उसके सदस्यों की योग्यता, अनुभव और जिम्मेदारियां कोई गोपनीय जानकारी नहीं हैं जिन्हें साझा न किया जा सके।
अदालत ने अवलोकन किया कि जब तक किसी जानकारी से देश या संस्था की सुरक्षा को खतरा न हो या कोई परस्पर विरोधी हित शामिल न हों, तब तक नागरिकों को उपलब्ध कराई जा सकने वाली सभी सूचनाएं दी जानी चाहिए। जो जानकारी संसद या राज्य विधानसभा से नहीं छिपाई जा सकती, उसे देश का कोई भी नागरिक आरटीआई के तहत पाने का अधिकार रखता है। कोर्ट ने यह भी नोट किया कि मांगी गई कई जानकारियां पहले से ही हाईकोर्ट की आधिकारिक वेबसाइट पर उपलब्ध हैं।
करदाताओं के पैसे से मिलता है वेतन
15 जून को शुरुआती फैसला आने के बाद रजिस्ट्री ने अदालत के समक्ष स्पष्ट किया कि ‘पार्टी-इन-पर्सन’ समिति में जज शामिल नहीं हैं, बल्कि इसमें रजिस्ट्रार और रजिस्ट्री स्तर के अधिकारी तैनात हैं। इसके बाद 27 जुलाई को जारी संशोधित आदेश में जस्टिस धंधपाणि ने स्पष्ट किया कि सार्वजनिक कोष से वेतन पाने वाले अधिकारियों के वेतन और भत्तों की जानकारी सार्वजनिक रिकॉर्ड का हिस्सा है।
अदालत ने कहा कि अधिकारियों का वेतन करदाताओं के पैसे से दिया जाता है, इसलिए करदाताओं को इसकी जानकारी लेने से रोकने के लिए धारा 8 की आड़ नहीं ली जा सकती।
दो हफ्ते में जानकारी देने का निर्देश
अदालत ने रजिस्ट्री के केवल एक तर्क को स्वीकार किया। हाईकोर्ट ने माना कि समिति के सदस्यों के आचरण से जुड़ा रिकॉर्ड उस प्रारूप में उपलब्ध नहीं है जिस तरह से आवेदक ने मांगा था, इसलिए उसे देने की बाध्यता नहीं है।
याचिका का निस्तारण करते हुए हाईकोर्ट ने रजिस्ट्रार जनरल को निर्देश दिया कि वे आचरण संबंधी ब्योरे को छोड़कर बाकी सभी मांगी गई जानकारियां औपचारिक आदेश मिलने के दो सप्ताह के भीतर आरटीआई आवेदक को उपलब्ध कराएं। इसके साथ ही रजिस्ट्री को संशोधित फैसले की नई प्रति जारी करने का निर्देश दिया गया है।

