सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि यदि किसी व्यक्ति के पास किसी संपत्ति में अविभाजित व्यक्तिगत हिस्सा (Absolute Share) है, तो उसे उस हिस्से को किसी को भी गिफ्ट करने या बेचने का पूरा कानूनी अधिकार है। इसके लिए सह-मालिक की सहमति आवश्यक नहीं है, क्योंकि ऐसी संपत्ति सहदायी (Coparcenary) संपत्ति की श्रेणी में नहीं आती। जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस संजीव सचदेवा की पीठ ने संपत्ति के स्वामित्व का दावा करने वाली एक याचिकाकर्ता को आंशिक राहत देते हुए यह स्पष्ट किया कि हालांकि पंजीकृत गिफ्ट डीड दाता के अविभाजित आधे हिस्से के लिए पूरी तरह वैध है, लेकिन वास्तविक कब्जा प्राप्त करने के लिए प्राप्तकर्ता को अलग से बंटवारे (Partition) की प्रक्रिया शुरू करनी होगी।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद तिरुपत्तूर के जिला मुंसिफ के समक्ष 1996 में दायर मूल वाद संख्या 697 से शुरू हुआ था। वादी मरागधम ने वेल्लोर जिले के तिरुपत्तूर तालुक स्थित मल्लापल्ली गांव की जमीनों पर अपने मालिकाना हक, कब्जे की बहाली और अन्य राहतों की मांग की थी।
मरागधम ने अपने दादा कुट्टियप्पा गौंडर (प्रतिवादी संख्या 1) द्वारा 3 दिसंबर 1990 को उनके पक्ष में निष्पादित एक पंजीकृत गिफ्ट सेटलमेंट डीड के आधार पर पूर्ण स्वामित्व का दावा किया था। उनका आरोप था कि संपत्ति का कब्जा मिलने के बाद, 1995 में कुट्टियप्पा गौंडर ने पेरियाराजा (प्रतिवादी संख्या 2), मुनियम्मल (प्रतिवादी संख्या 3) और विजयाकुमार (प्रतिवादी संख्या 4) के साथ मिलकर उन्हें संपत्ति से बेदखल कर दिया और खेती के लिए नंदीमलई (प्रतिवादी संख्या 5) को सौंप दिया।
इस मुकदमे का विरोध प्रतिवादी संख्या 2, 3 और 4 ने किया। कुट्टियप्पा गौंडर की पहली पत्नी (जिनका नाम भी मुनियम्मल था) की बेटी मुनियम्मल (प्रतिवादी संख्या 3) ने तर्क दिया कि यह संपत्ति मूल रूप से उनकी दिवंगत मां की थी, जो उन्हें 1949 में उनके पिता अम्माकरा गौंडर द्वारा निष्पादित बिक्री पत्र और गिफ्ट डीड के जरिए मिली थी। मुनियम्मल का कहना था कि मां के निधन के बाद संपत्ति उनके कब्जे में आ गई और उनके पिता कुट्टियप्पा गौंडर को पूरी संपत्ति किसी और को गिफ्ट करने का कोई अधिकार नहीं था।
निचली अदालतों के फैसले
ट्रायल कोर्ट ने 13 अप्रैल 2006 को वादी के पक्ष में फैसला सुनाते हुए माना कि पत्नी की मृत्यु के बाद संपत्ति पूरी तरह कुट्टियप्पा गौंडर को मिल गई थी, जिससे उन्हें इसे गिफ्ट करने का पूर्ण अधिकार था।
हालांकि, प्रथम अपीलीय अदालत (सब जज, तिरुपत्तूर) ने 16 अप्रैल 2007 को इस फैसले को पलट दिया। अपीलीय अदालत ने माना कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 के तहत कुट्टियप्पा गौंडर और उनकी बेटी मुनियम्मल दोनों को बराबर का आधा-आधा हिस्सा मिला था। चूंकि कुट्टियप्पा गौंडर के पास केवल अविभाजित आधा हिस्सा था, इसलिए वे पूरी संपत्ति की गिफ्ट डीड निष्पादित नहीं कर सकते थे, जिससे वह गिफ्ट डीड शून्य हो गई।
इसके बाद मद्रास हाईकोर्ट ने भी 9 जून 2015 को वादी की दूसरी अपील खारिज कर दी। हाईकोर्ट ने माना कि पिता और बेटी ने हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 15 के तहत संयुक्त रूप से संपत्ति हासिल की थी। हाईकोर्ट ने यह भी निष्कर्ष निकाला कि सह-मालिक मुनियम्मल की सहमति के बिना कुट्टियप्पा गौंडर अपना आधा हिस्सा भी गिफ्ट नहीं कर सकते थे।
सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण और कानूनी निष्कर्ष
कानूनी स्थिति का विश्लेषण करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने उल्लेख किया कि विवादित संपत्तियां मूल रूप से कुट्टियप्पा गौंडर की पहली पत्नी मुनियम्मल की थीं, जिनकी मृत्यु 1956 के अधिनियम के लागू होने के बाद हुई थी। धारा 15(1)(ए) के तहत उनकी संपत्ति उनके पति (कुट्टियप्पा गौंडर) और उनकी बेटी (मुनियम्मल) में बराबर बंटी थी।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अविभाजित आधा हिस्सा गिफ्ट करने के लिए सह-मालिक की सहमति अनिवार्य बताने का हाईकोर्ट का निर्णय त्रुटिपूर्ण था। पीठ ने टिप्पणी की:
“यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि कुट्टियप्पा गौंडर के हाथ में मौजूद यह अविभाजित आधा हिस्सा ‘कॉपरसनेरी संपत्ति’ का रूप धारण नहीं करता था और पूरी तरह से उनका व्यक्तिगत स्वामित्व था। इसलिए, उनके पास कानूनन यह पूरा अधिकार था कि वे इसे किसी भी व्यक्ति, यहां तक कि किसी अनजान व्यक्ति को भी उपहार में दे सकें या हस्तांतरित कर सकें।”
अदालत ने आगे कहा:
“विवादित संपत्तियों में अपने अविभाजित आधे हिस्से को हस्तांतरित करने से पहले उन्हें सह-मालिक मुनियम्मल की सहमति लेने की कोई आवश्यकता नहीं थी। ऐसी सहमति प्राप्त करने का प्रश्न तब उठता जब संपत्ति कॉपरसनेरी संपत्ति होती, लेकिन तब नहीं जब यह अविभाजित आधा हिस्सा कुट्टियप्पा गौंडर की व्यक्तिगत पूर्ण संपत्ति थी।”
सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC) के ऑर्डर VII नियम 7 के तहत कम राहत देने के प्रश्न पर पीठ ने विचार किया। वादी ने पूरी संपत्ति पर पूर्ण स्वामित्व और कब्जे की मांग की थी। इस पर पीठ ने टिप्पणी की:
“हालांकि, ऐसा विवेकपूर्ण अधिकार तब उपलब्ध नहीं होगा जब वादी अदालत द्वारा तथ्यों और कानून के आधार पर अंततः स्थापित मामले से बिल्कुल अलग मामला सामने रखता है।”
अदालत का निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय दिया कि वादी 3 दिसंबर 1990 की पंजीकृत गिफ्ट डीड के तहत विवादित संपत्तियों में केवल अविभाजित आधे हिस्से के मालिकाना हक (टाइटल) की हकदार हैं। हालांकि, चूंकि संपत्तियों का सीमांकन या बंटवारा नहीं हुआ है, इसलिए वर्तमान मुकदमे में कब्जे की बहाली की राहत नहीं दी जा सकती।
अदालत ने वादी को अपने अधिकारों को साकार करने के लिए सक्षम मंच के समक्ष अलग से बंटवारे (Partition) की कार्यवाही शुरू करने की छूट दी। सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित अदालत से बंटवारे के मुकदमे का जल्द से जल्द निपटारा करने का अनुरोध किया। अपील को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए निचली अदालतों के फैसलों को उस सीमा तक रद्द कर दिया गया, जबकि पक्षों को अपना-अपना खर्च स्वयं उठाने का निर्देश दिया गया।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: मरागधम बनाम पेरियाराजा और अन्य
वाद संख्या: सिविल अपील संख्या 12190 / 2025
पीठ: जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस संजीव सचदेवा
निर्णय की तिथि: 29 जुलाई, 2026

