सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने स्पष्ट किया है कि संविधान के अनुच्छेद 338 के तहत राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग (एनएससीएससी) की भूमिका केवल सिफारिशी और सलाहकारी है। आयोग के पास सेवा मामलों में कोई बाध्यकारी निर्देश जारी करने या वित्तीय बकाए (एरियर) के भुगतान का आदेश देने की न्यायिक शक्ति (न्यायनिर्णयन शक्ति) नहीं है। बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले को खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यद्यपि जांच और पूछताछ की सुविधा के लिए आयोग को सिविल कोर्ट की कुछ शक्तियां दी गई हैं, लेकिन वह किसी अदालत या ट्रिब्यूनल की तरह पक्षकारों के अधिकारों का निर्धारण या निष्पादन योग्य निर्देश जारी नहीं कर सकता।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद मुंबई पोर्ट अथॉरिटी (अपीलकर्ता) में कार्यरत अनुसूचित जाति वर्ग की कर्मचारी माधवी के. चांदोरकर (प्रतिवादी संख्या 3) के सेवा विवाद से जुड़ा है। उन्हें 9 जुलाई 1997 को टाइपिस्ट-कम-कंप्यूटर क्लर्क के रूप में नियुक्त किया गया था। इसके बाद 21 जनवरी 2002 के एक ऑफिस मेमोरेंडम (ओएम) के तहत उन्हें स्टेमोग्राफर ग्रेड-I के पद पर पदोन्नत किया गया। इस 2002 के ओएम ने 30 जनवरी 1997 के पुराने ओएम को निष्प्रभावी कर दिया था, जिसके तहत पदोन्नति में आरक्षण नियमों के आधार पर अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के कर्मचारियों को परिणामी वरिष्ठता बनाए रखने की अनुमति मिली थी।
हालांकि, 2002 के ओएम को मुंबई पोर्ट ट्रस्ट नॉन-एससी/एसटी एम्प्लॉइज एसोसिएशन द्वारा बॉम्बे हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर चुनौती दी गई थी। हाईकोर्ट ने 30 नवंबर 2016 / 1 दिसंबर 2016 के आदेश द्वारा 2002 के ओएम को रद्द कर दिया। इसके बाद मुंबई पोर्ट अथॉरिटी ने 27 दिसंबर 2018 को एक सर्कुलर जारी कर कर्मचारियों की वरिष्ठता पुनर्नियोजित की और कहा कि पदोन्नति केवल 1997 के ओएम के अनुसार ही दी जाएगी। साथ ही एम. नागराज बनाम यूनियन ऑफ इंडिया मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुरूप न होने वाली पदोन्नतियों पर पुनर्विचार किया जाएगा। इस सर्कुलर को चुनौती देने वाली याचिका को बॉम्बे हाईकोर्ट ने 27 अगस्त 2019 को खारिज कर दिया था।
सर्कुलर के आधार पर 9 मार्च 2020 को प्रतिवादी संख्या 3 को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया। सुनवाई का अवसर देने के बाद अपीलकर्ता ने 11 सितंबर 2020 के आदेश द्वारा उन्हें 19 अप्रैल 2007 से 30 नवंबर 2016 की अवधि के लिए काल्पनिक (नोशनल) रूप से स्टेमोग्राफर ग्रेड-I से डिमोट करके ग्रेड-II में भेज दिया।
इस डिमोशन से व्यथित होकर प्रतिवादी संख्या 3 ने राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के समक्ष अभ्यावेदन दिया। दोनों पक्षों को सुनने के बाद आयोग ने 23 अक्टूबर 2024 को एक आदेश (1 अक्टूबर 2024 की बैठक के कार्यवृत्त) जारी किया। आयोग ने मुंबई पोर्ट अथॉरिटी को कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (डीओपीटी) के दिशा-निर्देशों का सख्ती से पालन करने, उचित आरक्षण रोस्टर तैयार करने, आरक्षण नियमों के अनुसार पदोन्नति देने, 30 दिनों के भीतर आदेश लागू कर बकाए का भुगतान करने और 45 दिनों में एक्शन टेकन रिपोर्ट के साथ रोस्टर सत्यापन के लिए जहाजरानी मंत्रालय को भेजने का निर्देश दिया।
मुंबई पोर्ट अथॉरिटी ने आयोग के इस आदेश को बॉम्बे हाईकोर्ट में चुनौती दी। हाईकोर्ट की डिविजन बेंच ने 19 अगस्त 2025 को याचिका खारिज करते हुए माना कि आयोग के निर्देश उसके संवैधानिक दायरे से बाहर नहीं थे। इसके अलावा एरियर भुगतान का निर्देश आयोग के 1 जून 2023 के पिछले आदेश का ही दोहराव था। इसके बाद मुंबई पोर्ट अथॉरिटी ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ता मुंबई पोर्ट अथॉरिटी ने तर्क दिया कि संविधान के अनुच्छेद 338 के खंड 5 के तहत परिभाषित विशिष्ट कार्यों के अलावा, आयोग के पास कोई बाध्यकारी निर्देश जारी करने या सेवा विवादों का फैसला करने का कोई कानूनी या संवैधानिक अधिकार नहीं है।
इसके जवाब में, आयोग ने अपने लिखित तर्कों में कहा कि अनुच्छेद 338 के खंड 5(बी)—जो आयोग को अनुसूचित जातियों के अधिकारों और सुरक्षा उपायों के हनन से जुड़ी विशिष्ट शिकायतों की जांच करने का दायित्व सौंपता है—के दो भाग हैं: जांच और सुरक्षा प्रदान करना। आयोग का कहना था कि सुरक्षा प्रदान करने वाला भाग एक प्रवर्तन तंत्र (एंफोर्समेंट मैकेनिज्म) के रूप में कार्य करता है।
सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण
सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 338 के तहत आयोग के दायरे और शक्तियों का गहन विश्लेषण किया। कोर्ट ने प्रारूप अनुच्छेद 299 से लेकर 1990 (65वां संशोधन), 2003 (89वां संशोधन) और 2018 (102वां संशोधन) तक के संवैधानिक इतिहास को रेखांकित किया।
शीर्ष अदालत ने कहा कि बॉम्बे हाईकोर्ट का यह निष्कर्ष गलत था कि “राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग द्वारा 23.10.2024 के अपने आदेश में जारी किए गए निर्देश संविधान के तहत दी गई शक्तियों के दायरे में थे।”
अनुच्छेद 338(8) का विश्लेषण करते हुए, जो आयोग को सिविल कोर्ट की शक्तियां प्रदान करता है, कोर्ट ने इन शक्तियों की सीमित प्रकृति पर प्रकाश डाला:
“हालांकि आयोग के पास दस्तावेज मांगने और साक्ष्य प्राप्त करने की शक्ति है, लेकिन उसके पास उस साक्ष्य के आधार पर आदेश पारित करने का अधिकार नहीं है। दूसरे शब्दों में, आयोग तथ्यात्मक निष्कर्ष दर्ज कर सकता है और फिर संबंधित केंद्र या राज्य सरकार से उस पर कार्रवाई करने के लिए कह सकता है।”
आयोग की इस दलील को खारिज करते हुए कि “सुरक्षा उपाय” एक प्रवर्तन तंत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं, कोर्ट ने टिप्पणी की कि “अनुच्छेद की स्पष्ट भाषा को देखते हुए इसे स्वीकार करना कठिन है। यह निश्चित रूप से न्यायिक निर्णय देने का अधिकार प्रदान नहीं करता है, यह अधिक से अधिक सिफारिशी प्रकृति का है।” कोर्ट ने आगे कहा कि “अधिकारों और सुरक्षा उपायों” में “और” शब्द का प्रयोग दर्शाता है कि दोनों को एक साथ मिलाकर पढ़ा जाना चाहिए।
अपने निष्कर्षों के समर्थन में सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व निर्णयों का भी हवाला दिया:
- ऑल इंडिया इंडियन ओवरसीज बैंक एससी एंड एसटी एम्प्लॉइज वेलफेयर एसोसिएशन बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (1996): कोर्ट ने नोट किया कि अनुच्छेद 338(8) के तहत दी गई सिविल कोर्ट की प्रक्रियात्मक शक्तियां केवल जांच और पूछताछ के लिए हैं। यह आयोग को सिविल कोर्ट में तब्दील नहीं करतीं और न ही इसे अंतरिम या स्थायी स्थगादेश (इंजंक्शन) जारी करने का अधिकार देती हैं।
- कलेक्टर बनाम अजीत जोगी (2011): कोर्ट ने दोहराया कि अधिकारों और सुरक्षा उपायों के हनन की जांच करने की आयोग की शक्ति में जाति प्रमाण पत्र जारी करने, रद्द करने या निर्धारित करने का अधिकार शामिल नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य केंद्र या राज्य सरकार को रिपोर्ट प्रस्तुत करना है।
- भवानी प्रसाद जेना बनाम उड़ीसा राज्य महिला आयोग (2010): कोर्ट ने उल्लेख किया कि वैधानिक और संवैधानिक आयोगों को पक्षकारों के अधिकारों का फैसला करने के लिए अदालत या न्यायिक ट्रिब्यूनल की भूमिका निभाने की शक्ति नहीं दी गई है।
वैधानिक योजना की पुष्टि करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा:
“विधानमंडल ने एक ऐसी भूमिका निर्धारित की है जो सिफारिशी और सलाहकारी है, लेकिन निश्चित रूप से न्यायिक निर्णय देने वाली नहीं है। इनका उद्देश्य न्यायिक कार्यभार संभालना नहीं है।”
कोर्ट का निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने मुंबई पोर्ट अथॉरिटी की अपील को स्वीकार करते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट के निर्णय को निरस्त कर दिया। कोर्ट ने घोषणा की कि एरियर के भुगतान के संबंध में राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग द्वारा जारी निर्देश संविधान के प्रावधानों के विपरीत हैं और कानून की नजर में अमान्य (नॉन-एस्ट) हैं।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: मुंबई पोर्ट अथॉरिटी बनाम नेशनल कमीशन फॉर शेड्यूल्ड कास्ट व अन्य
वाद संख्या: सिविल अपील नंबर ___/2026 (एसएलपी (सिविल) नंबर 33359/2025 से उत्पन्न)
पीठ: जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह
निर्णय की तिथि: 28 जुलाई 2026

