सोसायटी पंजीकरण अधिनियम: चुनाव विवाद के साथ सदस्यता विवाद भी तय कर सकता है प्रिस्क्राइब्ड अथॉरिटी – इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच, जिसमें जस्टिस शेखर बी. सर्राफ और जस्टिस अवधेश कुमार चौधरी शामिल हैं, ने स्पष्ट किया है कि सोसायटी पंजीकरण अधिनियम, 1860 की धारा 25(1) के तहत तय प्राधिकारी (प्रिस्क्राइब्ड अथॉरिटी) किसी पंजीकृत सोसायटी के पदाधिकारियों के चुनाव या उनके पद पर बने रहने के विवाद का निपटारा करते समय सदस्यता विवाद को एक अनुषंगी (ancillary) मुद्दे के रूप में तय करने का अधिकार रखता है। आर्य प्रतिनिधि सभा द्वारा इसके प्रधान देवेंद्र पाल वर्मा के माध्यम से दायर दो विशेष अपीलों (स्पेशल अपील) को खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने सिंगल जज के उस फैसले की पुष्टि की, जिसमें डिप्टी रजिस्ट्रार, फर्म्स, सोसायटीज एंड चिट्स के आदेश को रद्द कर दिया गया था और सोसायटी के चुनाव विवाद को प्रिस्क्राइब्ड अथॉरिटी के पास भेजने का निर्देश दिया गया था।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद ‘आर्य प्रतिनिधि सभा’ से संबंधित है, जो सोसायटी पंजीकरण अधिनियम, 1860 के तहत पंजीकृत एक संस्था है। यह उत्तर प्रदेश राज्य में चार-स्तरीय संगठनात्मक ढांचे के तहत कार्य करती है, जिसकी मूल स्थापना स्वामी दयानंद सरस्वती ने 1875 में की थी। सोसायटी के पंजीकृत उप-नियमों (बाय-लॉज) के अनुसार इसकी प्रबंध समिति (अंतरंग सभा) का कार्यकाल पांच वर्ष का होता है।

सोसायटी के अंतिम अविवादित चुनाव 27 मार्च 2016 को हुए थे, जिसमें देवेंद्र पाल वर्मा को ‘प्रधान’ और दिवंगत धीरज सिंह को ‘उप-प्रधान’ चुना गया था। इसके बाद प्रधान के कामकाज को लेकर विवाद उत्पन्न हुआ, जिससे प्रशासनिक आदेशों और रिट याचिकाओं का एक लंबा दौर शुरू हो गया:

  1. 9 नवंबर 2016 को डिप्टी रजिस्ट्रार ने देवेंद्र पाल वर्मा को शक्तियों का प्रयोग करने से रोक दिया और दिवंगत धीरज सिंह को कार्यवाहक प्रधान नियुक्त किया। 16 जनवरी 2017 को डिप्टी रजिस्ट्रार ने प्रभार श्रीमती गायत्री दीक्षित को सौंप दिया।
  2. 26 मार्च 2017 और 24 जुलाई 2017 को गुटों द्वारा प्रस्ताव पारित कर देवेंद्र पाल वर्मा को सदस्यता से निष्कासित कर दिया गया, जिससे हाईकोर्ट में कई याचिकाएं दायर हुईं।
  3. 30 जुलाई 2019 को सिंगल जज ने 9 नवंबर 2016, 16 जनवरी 2017 और 30 मार्च 2017 के डिप्टी रजिस्ट्रार के आदेशों को रद्द करते हुए मामला वापस डिप्टी रजिस्ट्रार को पुनर्विचार के लिए भेज दिया।
  4. 2 नवंबर 2019 को डिप्टी रजिस्ट्रार ने वर्मा की शिकायत को इस आधार पर खारिज कर दिया कि उन्हें आर्य समाज, मुजफ्फरनगर से बाहर कर दिया गया था।
  5. फरवरी 2020 में एक जांच में यह बात सामने आई कि दिवंगत धीरज सिंह ने फर्जी दस्तावेजों के आधार पर प्राथमिक सदस्यता हासिल की थी, जिसके बाद उनके खिलाफ प्राथमिकी (एफआईआर) दर्ज की गई और 1 फरवरी 2020 को उनकी सदस्यता समाप्त कर दी गई। 16 फरवरी 2020 को उनके खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पारित किया गया।
  6. 21 मार्च 2021 को नए चुनाव कराए गए जिसमें देवेंद्र पाल वर्मा को निर्विरोध प्रधान चुना गया और 26 मार्च 2021 को चुनाव दस्तावेज पंजीकृत किए गए।
  7. इसके बाद की कानूनी कार्यवाही के परिणामस्वरूप 7 जून 2021 को फैसला आया (जिसमें पंजीकरण आदेश रद्द कर मामला वापस भेजा गया), 16 अगस्त 2023 को पुनर्विचार याचिका खारिज हुई और 18 सितंबर 2024 व 26 अगस्त 2025 को रिमांड आदेश पारित किए गए।
  8. 5 दिसंबर 2025 को डिप्टी रजिस्ट्रार ने एक आदेश पारित कर देवेंद्र पाल वर्मा (21 मार्च 2021 को आयोजित) और डॉ. राम रतन चतुर्वेदी (27 मार्च 2021 को आयोजित) के चुनाव दावों को खारिज कर दिया, जबकि भुवन तिवारी (27 मार्च 2021 को आयोजित) के चुनाव को वैध घोषित कर दिया।
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इस 5 दिसंबर 2025 के आदेश को देवेंद्र पाल वर्मा और डॉ. राम रतन चतुर्वेदी ने अलग-अलग रिट याचिकाओं में चुनौती दी। 19 दिसंबर 2025 को सिंगल जज ने डिप्टी रजिस्ट्रार के आदेश को रद्द कर दिया और डिप्टी रजिस्ट्रार को सोसायटी पंजीकरण अधिनियम, 1860 की धारा 25(1) के तहत मामला प्रिस्क्राइब्ड अथॉरिटी को संदर्भित करने का निर्देश दिया। अपीलकर्ताओं ने इन निर्देशों को चुनौती देते हुए यह विशेष अपील दायर की थी।

पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ताओं की दलीलें: अपीलकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता संदीप दीक्षित और अधिवक्ता अतुल कुमार द्विवेदी ने तर्क दिया कि सिंगल जज ने समन्वय पीठों (को-ऑर्डिनेट बेंच) के पिछले बाध्यकारी फैसलों पर विचार किए बिना विवाद को प्रिस्क्राइब्ड अथॉरिटी के पास भेजने में भूल की, जिन्होंने बार-बार मामले को गुण-दोष के आधार पर निर्णय के लिए डिप्टी रजिस्ट्रार के पास भेजा था। उन्होंने तर्क दिया कि सदस्यता से संबंधित मुख्य विवाद अधिनियम की धारा 4 और 4-बी के तहत आते हैं, जो विशेष रूप से डिप्टी रजिस्ट्रार के वैधानिक अधिकार क्षेत्र में हैं।

उन्होंने यह भी कहा कि मुख्य प्रतिद्वंद्वी दावेदार—जिनमें भुवन तिवारी, आचार्य स्वदेश और डॉ. राम रतन चतुर्वेदी शामिल हैं—गैर-सदस्य थे या उन्हें प्राथमिक सदस्यता से निष्कासित कर दिया गया था, जिससे वे बाहरी व्यक्ति बन गए थे और उनके पास प्रबंध समिति के चुनाव कराने का कोई अधिकार नहीं था।

प्रतिवादियों की दलीलें: प्रतिवादियों का प्रतिनिधित्व कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता गौरव मेहोत्रा (अधिवक्ता मंजरी के सहयोग से), वरिष्ठ अधिवक्ता समीर कालिया (अधिवक्ता शमीम रिजवी व शुभी शर्मा के सहयोग से), अधिवक्ता प्रतीक पाल सिंह तथा मुख्य स्थाई अधिवक्ता व अन्य वकीलों ने कहा कि जब प्रबंध समिति के प्रतिद्वंद्वी दावे चुनाव विवादों से उत्पन्न होते हैं, तो डिप्टी रजिस्ट्रार के पास अधिकार क्षेत्र नहीं होता है और उन्हें धारा 25(1) के तहत मामला प्रिस्क्राइब्ड अथॉरिटी को संदर्भित करना होता है। उन्होंने इस संबंध में सी/एम अंजुमन खैरुल अलमीन, अल्लाहागंज व अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य (2013) के फैसले का हवाला दिया।

उन्होंने किसान नेशनल एजुकेशन ट्रस्ट प्रतापगढ़ बनाम प्रिस्क्राइब्ड अथॉरिटी (एसडीएम) (2018) और समिति प्रबंधन, श्री विदुर सेवा आश्रम बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2018) के निर्णयों का हवाला देते हुए आगे तर्क दिया कि प्रिस्क्राइब्ड अथॉरिटी चुनाव विवादों का फैसला करते समय एक अनुषंगी मुद्दे के रूप में सदस्यता निर्धारित करने के लिए पूरी तरह से सक्षम है।

इसके अतिरिक्त, प्रतिवादियों ने 14 जनवरी 2026 और 19 जनवरी 2026 के आवेदन पेश किए, जिनसे पता चलता है कि देवेंद्र पाल वर्मा ने प्रिस्क्राइब्ड अथॉरिटी के समक्ष स्थगन (अदालत से समय) की मांग की थी, जिससे उन्होंने इसके अधिकार क्षेत्र को स्वीकार कर लिया था (केदार शशिकांत देशपांडे बनाम भोर नगर पालिका परिषद (2011))। यह भी बताया गया कि प्रिस्क्राइब्ड अथॉरिटी पहले ही अपना फैसला सुना चुकी है, जिसे वर्तमान में रिट-सी संख्या 2626/2026 में चुनौती दी गई है, जिससे यह अपील केवल अकादमिक रह जाती है।

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हाईकोर्ट का विश्लेषण

डिवीजन बेंच ने खेद जताते हुए टिप्पणी की कि सोसायटी का मुकदमों का एक लंबा और जटिल इतिहास रहा है, जो डिप्टी रजिस्ट्रार, सिंगल जज और डिवीजन बेंच के बीच एक चक्र की तरह घूम रहा है।

अदालत के भीतर अपीलीय अधिकार क्षेत्र के दायरे पर हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय बिहार इंडस्ट्रियल एरिया डेवलपमेंट अथॉरिटी व अन्य बनाम मैसर्स स्कोप सेल्स प्राइवेट लिमिटेड व अन्य (2026) का हवाला देते हुए उल्लेख किया:

“हमारी राय में, अदालत के भीतर अपीलीय अधिकार क्षेत्र (इंट्रा-कोर्ट अपील) का उपयोग केवल तभी उचित है जब चुनौती दिया गया फैसला या आदेश स्पष्ट रूप से त्रुटिपूर्ण हो या उसमें विकृति हो। केवल इसलिए ऐसे अधिकार क्षेत्र का उपयोग नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि समान तथ्यों पर दूसरी राय संभव है, खासकर तब जब सिंगल जज द्वारा अपनाया गया दृष्टिकोण तर्कसंगत और उचित हो।”

सदस्यता के मुद्दों और चुनाव विवादों के बीच संबंधों की जांच करते हुए हाईकोर्ट ने सदस्यता और चुनाव विवादों को अलग-अलग खंडों में रखने के प्रयास को खारिज कर दिया:

“डिप्टी रजिस्ट्रार की तुलना में वरिष्ठ अधिकारी होने के नाते प्रिस्क्राइब्ड अथॉरिटी (तय प्राधिकारी) इन परस्पर जुड़े मुद्दों को अलग-अलग करने और अलग-अलग प्राधिकरणों से भिन्न निष्कर्ष आमंत्रित करने के बजाय एक साथ हल करने के लिए अधिक सक्षम होगा, जिससे सोसायटी में पहले से मौजूद भ्रम और वर्चस्व की लड़ाई और न बढ़े।”

बेंच ने पाया कि धारा 25(1) प्रिस्क्राइब्ड अथॉरिटी को “किसी सोसायटी के पदाधिकारी के चुनाव या पद पर बने रहने के संबंध में किसी भी संदेह या विवाद” का फैसला करने का अधिकार देती है। कोर्ट ने जोर देकर कहा:

“…सोसायटी पंजीकरण अधिनियम, 1860 की धारा 25(1) में उल्लेखित वाक्यांश ‘ऐसी सोसायटी के पदाधिकारियों के चुनाव या पद पर बने रहने के संबंध में कोई भी संदेह या विवाद’ अत्यधिक व्यापक है, क्योंकि यह अपने भीतर ‘किसी भी संदेह या विवाद’ को शामिल करता है, जिसमें इस अदालत के अनुसार सदस्यता से संबंधित संदेह या विवाद भी शामिल है।”

“इस प्रकार, प्रभावी रूप से, प्रिस्क्राइब्ड अथॉरिटी को चुनाव विवाद का फैसला करते समय चुनाव के बड़े विवाद के एक प्रासंगिक और अनुषंगी मुद्दे के रूप में सदस्यता के मुद्दे को भी तय करना होता है।”

हाईकोर्ट ने अपने तर्क को मजबूत करने के लिए पूर्व नजीरों का विश्लेषण किया:

  • कमेटी ऑफ मैनेजमेंट, अंजुमन खैरुल अलमीन, अल्लाहागंज व अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य (2014), जिसने धारा 4 और 25(1) में सामंजस्य स्थापित करते हुए माना कि चुनाव और शासन विवादों का फैसला धारा 25(1) के तहत नामित न्यायाधिकरण द्वारा ही किया जाना चाहिए।
  • कमेटी ऑफ मैनेजमेंट, श्री विदुर सेवा आश्रम बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2018), सीता राम राय व अन्य बनाम सहायक रजिस्ट्रार, फर्म्स, सोसायटीज एंड चिट्स, गोरखपुर (2003) और विंध्य वासिनी बनाम प्रिस्क्राइब्ड अथॉरिटी व अन्य (2002) के साथ, यह स्थापित करते हुए कि साधारण सभा/निर्वाचक मंडल की संरचना का निर्धारण धारा 25(1) के तहत चुनावी संदेहों का फैसला करने के लिए अनुषंगी है।
  • सर्व उत्तर प्रदेश ग्रामीण बैंक बनाम मनोज कुमार सिन्हा (2010) और सुरेंद्र कुमार वर्मा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2002) में स्थापित पूर्वाग्रह और अधिकार क्षेत्र के सिद्धांत।
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बेंच ने रेखांकित किया कि चुनाव विवाद प्रिस्क्राइब्ड अथॉरिटी के पास जाने से पहले सदस्यता विवादों का फैसला डिप्टी रजिस्ट्रार से कराने के लिए मजबूर करने से एक जटिल प्रक्रिया बनेगी और अनुचित मुकदमों को लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को अनिश्चित काल के लिए रोकने का अवसर मिल जाएगा।

कोर्ट का फैसला

हाईकोर्ट ने माना कि सिंगल जज के आदेश में कोई विकृति या कानून की त्रुटि नहीं है। नतीजतन, डिवीजन बेंच ने बिना किसी लागत के दोनों विशेष अपीलों को खारिज कर दिया।

अदालत ने स्पष्ट किया कि चूंकि प्रिस्क्राइब्ड अथॉरिटी ने पहले ही एक आदेश पारित कर दिया है जो वर्तमान में रिट-सी संख्या 2626/2026 में सिंगल जज के समक्ष विचाराधीन है, इसलिए सदस्यता से संबंधित सभी आधार पक्षों के लिए लंबित रिट कार्यवाही में उठाने के लिए खुले रहेंगे।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: आर्य प्रतिनिधि सभा, द्वारा इसके प्रधान देवेंद्र पाल वर्मा व एक अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, द्वारा इसके अपर मुख्य/प्रमुख सचिव, वित्त विभाग, लखनऊ व 6 अन्य
वाद संख्या: स्पेशल अपील संख्या 74/2026
पीठ: जस्टिस शेखर बी. सर्राफ और जस्टिस अवधेश कुमार चौधरी
निर्णय की तिथि: 27 जुलाई 2026
अपीलकर्ता के अधिवक्ता: संदीप दीक्षित (वरिष्ठ अधिवक्ता), अतुल कुमार द्विवेदी
प्रतिवादी के अधिवक्ता: मुख्य स्थाई अधिवक्ता (सी.एस.सी.), गौरव मेहोत्रा (वरिष्ठ अधिवक्ता), समीर कालिया (वरिष्ठ अधिवक्ता), अश्वनी कुमार, हर्षवर्धन मेहोत्रा, मारिया फातिमा, मोहम्मद फहद, मोहम्मद शमीम रिजवी, प्रतीक पाल सिंह, शुभी शर्मा, मंजरी

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