उत्तर प्रदेश की अधीनस्थ अदालतों में सालों से पेंडिंग पड़ी पुलिस की फाइनल (क्लोजर) रिपोर्टों पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। राज्य भर के जिला एवं सत्र न्यायाधीशों को निर्देश जारी कर हाईकोर्ट ने पेंडिंग रिपोर्टों का ब्योरा, देरी की वजहें और उनके जल्द निपटारे के लिए तैयार की गई कार्ययोजना तलब की है।
हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ के जस्टिस तेज प्रताप तिवारी की एकलपीठ ने एक याचिका पर सुनवाई के दौरान टिप्पणी की कि जांच पूरी होने के बाद भी सालों तक अंतिम रिपोर्ट को पेंडिंग रखना आपराधिक न्याय व्यवस्था के लिए गंभीर चिंता का विषय है। अदालत ने कहा कि पुलिस द्वारा क्लोजर रिपोर्ट दाखिल किए जाने के बावजूद मामले लटके रहने से संबंधित लोगों को बेवजह परेशानी का सामना करना पड़ता है।
लखनऊ में 50 हजार मामले पेंडिंग, पूरे प्रदेश में चिंताजनक हालात
अदालत ने रेखांकित किया कि अकेले लखनऊ जिला अदालत में करीब 50 हजार फाइनल रिपोर्ट फैसले के इंतजार में पड़ी हैं, जबकि प्रदेश के अन्य जिलों में भी स्थिति कमोबेश ऐसी ही है। हाईकोर्ट ने माना कि शिकायतकर्ताओं को नोटिस जारी करने जैसी शुरुआती प्रक्रियाओं में देरी के कारण मामले सालों तक खिंचते रहते हैं।
जिला जजों को नियमित समीक्षा और पुराने केस निपटाने के निर्देश
हाईकोर्ट के निर्देशों के तहत, सभी जिला जजों को अपने-अपने जिलों के आंकड़े और निपटारे का प्लान रजिस्ट्रार जनरल के माध्यम से प्रस्तुत करना होगा। इसके साथ ही जिला न्यायाधीशों को मातहत अदालतों में लंबित मामलों की नियमित समीक्षा करने और पुराने मामलों को प्राथमिकता के आधार पर तय करने का निर्देश दिया गया है।
पासपोर्ट रीन्यू न होने पर कारोबारियों ने खटखटाया कोर्ट का दरवाजा
यह पूरा मामला लखनऊ के गोसाईंगंज थाने से जुड़ी एक याचिका से सामने आया है। इस केस में पुलिस ने 11 जुलाई 2020 को ही फाइनल रिपोर्ट दाखिल कर दी थी, लेकिन चार साल बीत जाने के बाद भी स्थानीय अदालत ने इस पर कोई अंतिम आदेश पारित नहीं किया।
याचिकाकर्ताओं ने अदालत में अपना पक्ष रखते हुए कहा कि वे कारोबारी हैं और उन्हें काम के सिलसिले में अक्सर विदेश जाना पड़ता है। मामले के अदालत में पेंडिंग होने के कारण उनके पासपोर्ट का नवीनीकरण नहीं हो पा रहा है।
हाईकोर्ट ने इस मामले में अगली सुनवाई की तारीख 20 अगस्त तय की है।

