दिल्ली हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (सीआरपीसी) की धारा 125 के तहत दिए जाने वाले भरण-पोषण (मेंटेनेंस) में समय-समय पर वार्षिक वृद्धि का निर्देश देना पूरी तरह से कानूनन वैध है, ताकि महंगाई का मुकाबला किया जा सके और तय राशि का वास्तविक मूल्य बरकरार रहे। जस्टिस मधु जैन ने पति की ओर से दाखिल आपराधिक पुनरीक्षण याचिका (क्रिमिनल रिवीजन पिटीशन) को खारिज करते हुए फैमिली कोर्ट के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें पत्नी को 15,000 रुपये प्रति माह और नाबालिग बच्चे को 10,000 रुपये प्रति माह देने के साथ-साथ इसमें 5% की वार्षिक वृद्धि का निर्देश दिया गया था। हाईकोर्ट ने माना कि स्कॉटलैंड की एडिनबर्ग नेपियर यूनिवर्सिटी से हॉस्पिटैलिटी मैनेजमेंट की डिग्री रखने वाला पति खुद की आय बेहद कम बताकर भरण-पोषण की अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकता।
मामले की पृष्ठभूमि
पति और पत्नी का विवाह 5 दिसंबर 2012 को हुआ था और सितंबर 2013 में उनके एक बच्चे का जन्म हुआ। वैवाहिक विवादों के बाद पत्नी ने आरोप लगाया कि उसे दहेज की मांग और क्रूरता का सामना करना पड़ा, जिसके कारण नवंबर 2014 से उसे अपने मायके में रहने के लिए मजबूर होना पड़ा।
इसके बाद पत्नी ने फैमिली कोर्ट में भरण-पोषण का मामला दर्ज कराया। 13 फरवरी 2020 को कड़कड़डूमा कोर्ट्स, दिल्ली के प्रिंसिपल जज (ईस्ट), फैमिली कोर्ट्स ने आदेश पारित करते हुए पति को जनवरी 2020 से पत्नी के लिए 15,000 रुपये प्रति माह और बच्चे के लिए 10,000 रुपये प्रति माह मेंटेनेंस देने तथा हर साल इसमें 5% की वार्षिक वृद्धि का निर्देश दिया।
फैमिली कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के प्रसिद्ध फैसले जसबीर कौर सहगल बनाम डिस्ट्रिक्ट जज, देहरादून का हवाला देते हुए टिप्पणी की थी:
“अदालत को पक्षों की स्थिति, उनकी व्यक्तिगत जरूरतों और पति के अपने जीवन-यापन के उचित खर्चों तथा कानूनी या अनिवार्य कटौतियों को ध्यान में रखते हुए भुगतान करने की उसकी क्षमता पर विचार करना होता है। पत्नी के लिए तय की जाने वाली भरण-पोषण की राशि ऐसी होनी चाहिए कि वह उस स्तर और जीवनशैली के अनुसार उचित आराम से रह सके जिसकी वह अपने पति के साथ रहते समय अभ्यस्त थी, तथा उसे अपने मुकदमे की पैरवी में भी कोई लाचारी महसूस न हो। इसके साथ ही, तय की गई राशि अत्यधिक या अनुचित रूप से भारी नहीं होनी चाहिए।”
दोनों पक्षों की दलीलें
सीआरपीसी की धारा 397 और 401 के तहत फैमिली कोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए याचिकाकर्ता-पति ने दलील दी कि ट्रायल कोर्ट ने उसकी आय और वित्तीय क्षमता का गलत आकलन किया है। उसने दावा किया कि वह एक रसोइया/मार्केटिंग एग्जीक्यूटिव के रूप में केवल 11,000 रुपये प्रति माह कमाता है और उसके पास कोई अचल संपत्ति नहीं है। उसने यह भी कहा कि जिन संपत्तियों का जिक्र पत्नी ने किया है, वे उसके पिता की हैं और बच्चे को ईडब्ल्यूएस श्रेणी के तहत स्कूल में प्रवेश मिला हुआ है। इसके अलावा, पति का तर्क था कि धारा 127 सीआरपीसी का सहारा लिए बिना धारा 125 के तहत 5% की स्वचालित वार्षिक वृद्धि का आदेश नहीं दिया जा सकता।
दूसरी ओर, पत्नी और बच्चे की तरफ से पेश वकील ने तर्क दिया कि स्कॉटलैंड से उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बावजूद पति द्वारा अपनी आय कम बताए जाने का दावा बिल्कुल अविश्वसनीय है। यह भी तर्क दिया गया कि ट्रायल कोर्ट में पत्नी द्वारा दिए गए साक्ष्यों का पति ने कोई विरोध या जिरह (क्रॉस-एग्जामिनेशन) नहीं की, जिससे वे तथ्य साबित होते हैं। कुसुम शर्मा बनाम महिंदर कुमार शर्मा, राधिका बनाम विनीत रूंगटा, जसबीर कौर सहगल बनाम डिस्ट्रिक्ट जज, देहरादून और राखी साधुखान बनाम राजा साधुखान जैसे फैसलों का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि जीवनशैली और वित्तीय स्थिति के संतुलन के लिए आवधिक वृद्धि पूरी तरह से वैध है।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और निष्कर्ष
मामले की सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि धारा 397 और 401 सीआरपीसी के तहत उसकी पुनरीक्षण शक्ति (रिविजनल ज्यूरिस्डिक्शन) बेहद सीमित है। सुप्रीम कोर्ट के पायला मुत्यालम्मा बनाम पायला सूरी देमुडु और अमित कपूर बनाम रमेश चंदर के फैसलों का उल्लेख करते हुए कोर्ट ने कहा कि हस्तक्षेप केवल तभी किया जा सकता है जब फैमिली कोर्ट के आदेश में कोई स्पष्ट अवैधता, गंभीर त्रुटि या क्षेत्राधिकार की भूल पाई जाए।
मामले के तथ्यों की जांच करते हुए कोर्ट ने पाया कि पत्नी की वित्तीय निर्भरता, बच्चे की पढ़ाई के खर्च और पति की आर्थिक स्थिति पर दिए गए बयानों को पति ने जिरह न करके अप्रत्यक्ष रूप से स्वीकार ही किया था। हाईकोर्ट ने केवल 11,000 रुपये प्रति माह कमाने के पति के दावे को खारिज कर दिया और कहा कि उसने एडिनबर्ग नेपियर यूनिवर्सिटी से पढ़ाई की है और ऐसा कोई ठोस सबूत पेश नहीं किया जिससे लगे कि उसकी कमाई की क्षमता सीमित है।
भरण-पोषण राशि में 5% की वार्षिक वृद्धि को चुनौती देने वाली दलील को खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने टिप्पणी की:
“दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के तहत दिया जाने वाला भरण-पोषण यह सुनिश्चित करने के लिए है कि पत्नी और नाबालिग बच्चा गरिमा के साथ और शादी के दौरान भोगे गए स्तर के अनुरूप अपना जीवन-यापन कर सकें। यह एक न्यायिक रूप से संज्ञान में लेने योग्य तथ्य है कि समय बीतने के साथ जीवन-यापन की लागत और महंगाई बढ़ती है, जिससे तय भरण-पोषण राशि के वास्तविक मूल्य में धीरे-धीरे कमी आती है। एक उचित वार्षिक वृद्धि का निर्देश केवल प्रदान किए गए भरण-पोषण की प्रभावकारिता को बनाए रखता है और इसे अपने आप में मनमाना या कानून के विपरीत नहीं कहा जा सकता।”
कोर्ट का निर्णय
फैमिली कोर्ट के 13 फरवरी 2020 के निर्णय में किसी भी प्रकार की अवैधता या प्रक्रियात्मक त्रुटि न पाते हुए, हाईकोर्ट ने मेंटेनेंस के आदेश को बरकरार रखा और पति की रिवीजन पिटीशन को खारिज कर दिया।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: राहुल गौरव नागर बनाम नीता उर्फ सविता व अन्य
वाद संख्या: आपराधिक रिवीजन याचिका संख्या 16/2021
पीठ: जस्टिस मधु जैन
निर्णय की तिथि: 27.07.2026

