पहली शादी छिपाकर दूसरी शादी करने वाला पति अमान्य विवाह का हवाला देकर पत्नी को भरण-पोषण देने से इनकार नहीं कर सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट की जस्टिस गरिमा प्रसाद की पीठ ने कहा है कि यदि कोई पति अपनी पहली जीवित शादी की बात छिपाकर किसी महिला को धोखे से विवाह में शामिल करता है, तो वह अपने ही गलत काम का लाभ उठाकर आपराधिक प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 के तहत भरण-पोषण (मेंटेनेंस) देने से इनकार नहीं कर सकता। अदालत ने पति की याचिका खारिज करते हुए और पत्नी की पुनरीक्षण (रिवीजन) याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए भरण-पोषण की राशि 6,000 रुपये प्रति माह से बढ़ाकर 12,000 रुपये प्रति माह कर दी।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला 29 जनवरी 2018 को पत्नी द्वारा पति से भरण-पोषण की मांग को लेकर धारा 125 CrPC के तहत शुरू की गई कार्यवाही से जुड़ा है। दोनों का विवाह 12 दिसंबर 2016 को हिंदू रीति-रिवाज के अनुसार संपन्न हुआ था।

मामले के तथ्यों के अनुसार, पति ने पहले 29 फरवरी 2008 को एक अन्य महिला से विवाह किया था और वह पहली शादी 15 नवंबर 2017 को आपसी सहमति से तलाक की डिग्री द्वारा समाप्त हुई थी—यानी दूसरी शादी के लगभग एक साल बाद। नतीजतन, दूसरी शादी की तारीख को पति की पहली शादी कानूनी रूप से अस्तित्व में थी।

प्रिंसिपल जज, फैमिली कोर्ट, मथुरा ने 24 नवंबर 2023 के आदेश में माना कि पति ने पत्नी से अपनी पहली शादी की बात कपटपूर्वक छिपाई थी और पत्नी ने बिना किसी जानकारी के यह विवाह किया था। फैमिली कोर्ट ने पति के इस दावे को भी खारिज कर दिया कि शादी बंदूक की नोक पर जबरन कराई गई थी। फैमिली कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि व्यक्तिगत कानून के तहत शादी के अमान्य होने के बावजूद पत्नी भरण-पोषण की हकदार है और उसे 6,000 रुपये प्रति माह देने का आदेश दिया।

फैमिली कोर्ट के इस फैसले के खिलाफ दोनों पक्षों ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की। पति ने शादी के शून्य होने के आधार पर आदेश को रद्द करने के लिए क्रिमिनल रिवीजन संख्या 491/2024 दायर की, जबकि पत्नी ने भरण-पोषण राशि बढ़ाने के लिए क्रिमिनल रिवीजन संख्या 196/2024 दायर की।

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पक्षों की दलीलें

पति के वकील ने तर्क दिया कि चूंकि पहली शादी के अस्तित्व में रहते हुए किया गया विवाह शून्य था, इसलिए धारा 125 CrPC के तहत आवेदन पोषणीय (मेंटेनेबल) नहीं था और कानूनन पत्नी को कोई भरण-पोषण नहीं दिया जा सकता।

पत्नी के वकील ने कहा कि उसने पहली शादी के बारे में जाने बिना सद्भावनापूर्वक विवाह किया था। भरण-पोषण की राशि के संबंध में तर्क दिया गया कि 6,000 रुपये प्रति माह की राशि बेहद अपर्याप्त है, क्योंकि पति राजस्व विभाग में लेखपाल के पद पर कार्यरत एक सरकारी कर्मचारी है और उसकी मासिक आय लगभग 50,000 रुपये है (तथा संपत्ति हलफनामे में उसकी स्वीकृत आय लगभग 35,000 रुपये प्रति माह है)।

हाईकोर्ट का विश्लेषण और सुप्रीम कोर्ट के फैसले

हाईकोर्ट ने पति के इस तर्क को खारिज कर दिया कि शादी के अमान्य होने से धोखा खाई पत्नी धारा 125 CrPC के तहत भरण-पोषण पाने की हकदार नहीं रह जाती।

सुप्रीम कोर्ट के बादशाह बनाम सौ. उर्मिला बादशाह गोडसे और अन्य (2014) मामले का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि जो पति अपनी पहली शादी की बात छिपाता है, उसे अपने ही कपटपूर्ण आचरण का लाभ उठाने की अनुमति नहीं दी जा सकती। हाईकोर्ट ने उक्त फैसले के निम्नलिखित अंश को रेखांकित किया:

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“हम ऐसी स्थिति पर विचार कर रहे हैं जहां पक्षों के बीच विवाह साबित हो चुका है। हालांकि, याचिकाकर्ता पहले से शादीशुदा था, लेकिन उसने अपनी पहली शादी के तथ्य को छिपाकर उत्तरदाता के साथ धोखाधड़ी की। इन तथ्यों पर, हमारी राय में, उसे अपनी खुद की गलती का फायदा उठाकर उत्तरदाता को भरण-पोषण के लाभ से वंचित करने की अनुमति नहीं दी जा सकती… धारा 125 सीआरपीसी के उद्देश्य के लिए, उत्तरदाता संख्या 1 को याचिकाकर्ता की पत्नी माना जाएगा।”

अदालत ने कमला और अन्य बनाम एम.आर. मोहन कुमार (2019) मामले का भी संदर्भ दिया, जिसमें कहा गया था कि जब किसी महिला को छलपूर्वक विवाह में शामिल किया जाता है, तो उत्पीड़न और बेसहारा होने से बचाने के लिए धारा 125 CrPC का जनहितकारी और उद्देश्यपूर्ण अर्थ निकाला जाना चाहिए।

भरण-पोषण की राशि तय करने के संदर्भ में, हाईकोर्ट ने रजनेश बनाम नेहा और अन्य (2021) मामले का उल्लेख करते हुए कहा कि भरण-पोषण की राशि ऐसी होनी चाहिए जिससे पत्नी पति के सामाजिक स्तर और वित्तीय क्षमता के अनुरूप गरिमा और सम्मानजनक जीवन जी सके। कोर्ट ने ध्यान दिलाया कि पति राजस्व विभाग में स्थायी कर्मचारी है, जिसकी आय का स्थिर स्रोत है और नियमित वेतन वृद्धि मिलती है। वर्ष 2018 से बढ़ती महंगाई को देखते हुए फैमिली कोर्ट द्वारा तय की गई 6,000 रुपये की राशि अपर्याप्त है।

हाईकोर्ट का निर्णय

हाईकोर्ट ने पोषणीयता पर फैमिली कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा और भरण-पोषण तालिका में निम्नानुसार संशोधन किया:

  1. पति को आवेदन दाखिल करने की तिथि (29 जनवरी 2018) से फैमिली कोर्ट के फैसले की तिथि (24 नवंबर 2023) तक 10,000 रुपये प्रति माह की दर से भरण-पोषण का भुगतान करना होगा।
  2. पति को 24 नवंबर 2023 से 12,000 रुपये प्रति माह की दर से बढ़ा हुआ भरण-पोषण देना होगा, जो प्रत्येक आने वाले महीने की 10 तारीख तक नियमित रूप से देय होगा।
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अदालत ने निर्देश दिया कि बकाया राशि की गणना फैमिली कोर्ट द्वारा की जाएगी और पति द्वारा छह महीने के भीतर छह समान मासिक किस्तों में वर्तमान मासिक भुगतान के साथ इसका भुगतान किया जाएगा। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि चूक की स्थिति में फैमिली कोर्ट पति के वेतन या वेतन खाते की कुर्की और अन्य कानूनी उपायों के माध्यम से राशि वसूल कर सकता है।

तदनुसार, पति की याचिका (क्रिमिनल रिवीजन संख्या 491/2024) खारिज कर दी गई और पत्नी की याचिका (क्रिमिनल रिवीजन संख्या 196/2024) आंशिक रूप से स्वीकार कर ली गई।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: श्रीमती मोनिका उर्फ सत्यवती बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य
वाद संख्या: क्रिमिनल रिवीजन संख्या 196/2024 एवं क्रिमिनल रिवीजन संख्या 491/2024
पीठ: जस्टिस गरिमा प्रसाद
निर्णय की तिथि: 16 जुलाई 2026

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