आपराधिक पृष्ठभूमि वाले आरोपियों को पुलिस सुरक्षा देने से इनकार: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आपराधिक मामलों का सामना कर रहे दो सर्राफा कारोबारियों की पुलिस सुरक्षा और नई एफआईआर दर्ज करने पर रोक लगाने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि किसी व्यक्ति को उसकी अपनी ही आपराधिक गतिविधियों के कारण खतरे की आशंका है, तो उसे पुलिस सुरक्षा देने से समाज में गलत संदेश जाएगा और आम नागरिकों का कानून व्यवस्था पर से विश्वास उठ जाएगा।

पुलिस जांच और प्रक्रिया पर टिप्पणी

जस्टिस राजीव गुप्ता और जस्टिस अजय कुमार-द्वितीय की पीठ ने 17 जुलाई के अपने आदेश में कहा कि संज्ञेय अपराध की सूचना मिलने पर मामला दर्ज करना और जांच करना पुलिस का वैधानिक कर्तव्य है। पीठ ने स्पष्ट किया कि किसी संज्ञेय अपराध की जांच के दौरान पुलिस अधिकारी का मौका-ए-वारदात पर जाना, गवाहों के बयान दर्ज करना या नामजद आरोपी को पूछताछ के लिए थाने बुलाना कोई उत्पीड़न, अवैध हिरासत या शिकायतकर्ता के साथ मिलीभगत नहीं माना जा सकता।

मामले की पृष्ठभूमि और राज्य सरकार का पक्ष

याचिका दाखिल करने वाले दोनों सुनारों के खिलाफ कुल छह आपराधिक मामले लंबित हैं। शुरुआती याचिका में केवल तीन मामलों का जिक्र किया गया था, लेकिन बाद में दाखिल पूरक हलफनामे के जरिए तीन और मामलों की जानकारी सामने आई। याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया था कि व्यावसायिक प्रतिद्वंद्विता के चलते उनके खिलाफ बार-बार झूठी एफआईआर दर्ज कराई जा रही हैं। उन्होंने अपने और अपने परिवार के लिए सुरक्षा के साथ-साथ पुलिस अधिकारी को आगे कोई मामला दर्ज न करने और थाने न बुलाने का निर्देश देने का अनुरोध किया था।

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राज्य सरकार के वकील ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत मिलने वाले क्षेत्राधिकार का उपयोग भविष्य की जांच या एफआईआर से अग्रिम सुरक्षा पाने के लिए नहीं किया जा सकता।

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता और न्यायिक दायरा

हाईकोर्ट ने माना कि याचिकाकर्ताओं को महसूस हो रहा खतरा मुख्य रूप से उनकी अपनी गतिविधियों और पुरानी रंजिश का परिणाम है। पीठ ने कहा कि हाईकोर्ट पुलिस को एफआईआर दर्ज करने से रोकने का कोई सामान्य आदेश जारी नहीं कर सकता, क्योंकि ऐसा निर्देश भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) के वैधानिक ढांचे के विपरीत होगा और इसे न्यायिक अतिशयता माना जाएगा।

याचिका खारिज करने के साथ ही पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि इस फैसले से याचिकाकर्ताओं पर लंबित मामलों या भविष्य में होने वाली कानूनी कार्यवाहियों के संबंध में कानून के तहत उपलब्ध अन्य कानूनी विकल्पों का लाभ उठाने पर कोई रोक नहीं रहेगी।

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