कलकत्ता हाईकोर्ट ने वर्ष 2006 में हुई एक महिला की हत्या के मामले में निचली अदालत के बरी करने के आदेश को निरस्त करते हुए मृतका के किसान पति और उनके चार रिश्तेदारों को उम्रकैद की सजा सुनाई है। अदालत ने इस मामले में मृतका के सात वर्षीय बेटे के बयान को बेहद महत्वपूर्ण साक्ष्य माना, जिसने हमले के दौरान डरकर बिस्तर के नीचे छिपकर पूरी घटना अपनी आंखों से देखी थी।
जस्टिस राजशेखर मंथा और जस्टिस राय चट्टोपाध्याय की पीठ ने 16 जुलाई को दिए अपने फैसले में आदेश दिया कि सभी पांचों दोषियों को सजा में छूट (रिमिशन) का हकदार बनने से पहले कम से कम 24 साल की सश्रम जेल काटनी होगी। इसके साथ ही प्रत्येक दोषी पर 15,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया गया है। अदालत ने पति को एक वर्ष के अतिरिक्त सश्रम कारावास की सजा सुनाई और उस पर 25,000 रुपये का जुर्माना लगाया, जिसे हाईकोर्ट लीगल सर्विसेज अथॉरिटी में जमा करने का निर्देश दिया गया है।
मासूम की गवाही को नहीं माना जा सकता झूठा
निचली अदालत द्वारा बच्चे की गवाही को नजरअंदाज किए जाने पर हाईकोर्ट ने गंभीर टिप्पणी की। पीठ ने कहा कि पिता, चाचा और चाची के हाथों अपनी ही मां की हत्या होते देखना किसी भी व्यक्ति के जीवन में एक बेहद असामान्य और दर्दनाक घटना है। जब सात साल का कोई मासूम बच्चा ऐसी खौफनाक स्थिति का साक्षी बनता है, तो उसकी मानसिक स्थिति को आसानी से समझा जा सकता है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि घटना के समय बच्चे का डरकर पलंग के नीचे छिप जाना पूरी तरह स्वाभाविक था। पीठ के अनुसार, इतने छोटे बच्चे की अपने ही पिता या अन्य परिजनों को झूठे मामले में फंसाने की कोई मंशा नहीं हो सकती। इसलिए अभियोजन पक्ष के इस प्रत्यक्षदर्शी गवाह के बयान को खारिज करने का कोई आधार नहीं बनता।
जबरन जहर देने और साक्ष्य मिटाने का मामला
मामले के दस्तावेजों के अनुसार, यह वारदात 6 जून 2006 की रात को महिला के ससुराल में हुई थी। अभियोजन पक्ष ने साबित किया कि आरोपी पति ने अपने परिजनों की मदद से पत्नी के साथ मारपीट की और जबरदस्ती उसके मुंह में जहर ठूंस दिया। साक्ष्यों से यह बात भी सामने आई कि पीड़िता ने मुंह में डाले गए जहर को उल्टी करके बाहर निकालने का प्रयास किया था, जिससे यह साफ होता है कि यह आत्महत्या या आत्महत्या के उकसावे का मामला नहीं, बल्कि सीधे तौर पर हत्या है।
वारदात के बाद आरोपियों ने साक्ष्य मिटाने की नीयत से पीड़िता की साड़ी भी बदल दी थी। घटना के बाद पति के भाई ने महिला के मायके वालों को सूचना दी कि उसने जहर खाकर आत्महत्या का प्रयास किया है। हालांकि, जब मायके पक्ष के लोग वहां पहुंचे तो महिला बरामदे में अचेत पड़ी थी और उसके मुंह से झाग निकल रहा था। आरोप है कि दोषियों ने शुरुआत में परिजनों को उसे अस्पताल ले जाने से रोका। बाद में जब उसे अस्पताल ले जाया गया, तो डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया। हाईकोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि पति को इस पूरी साजिश की जानकारी थी और उसने जानबूझकर चुप्पी साधे रखी।
दहेज उत्पीड़न और लंबा कानूनी सफर
इस वारदात की मुख्य वजह आर्थिक तंगी और दहेज की मांग थी। शादी के शुरुआती चार साल दोनों का जीवन सामान्य रहा, लेकिन किसान पति की कम कमाई के कारण वह लगातार अपनी पत्नी पर मायके से पैसे लाने का दबाव बनाने लगा। जून 2006 में जामाई षष्ठी त्योहार के दौरान पति ने महिला को 50,000 रुपये मांगने के लिए मायके भेजा था, लेकिन उसका परिवार यह रकम देने में असमर्थ था।
महिला की मौत के बाद उसके बड़े भाई ने 7 जुलाई 2006 को पुलिस में औपचारिक शिकायत दर्ज कराई। हालांकि, लंबी सुनवाई के बाद निचली अदालत ने 30 मार्च 2017 को सभी पांचों आरोपियों को बरी कर दिया था। इस फैसले के खिलाफ मृतका के भाई ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी।
सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष के वकील अभिजीत गांगुली ने तर्क दिया कि शुरुआती ट्रायल में पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर का परीक्षण नहीं कराया गया था, जिससे यह रिपोर्ट साक्ष्य के रूप में मान्य नहीं होनी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि सभी रिश्तेदारों की एक समान मंशा साबित नहीं हुई है। वहीं, राज्य सरकार की ओर से लोक अभियोजक कल्लोल मंडल ने पैरवी की।

