कर्नाटक हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि बच्चों की शिक्षा का खर्च उठाने की माता-पिता की जिम्मेदारी उनके बालिग (18 वर्ष से अधिक) होने पर समाप्त नहीं होती। कोर्ट ने घरेलू हिंसा कानून के तहत एक पिता को अपनी बालिग बेटी की पोस्ट-ग्रेजुएशन (एमडी) की पढ़ाई का खर्च उठाने का आदेश देने वाले निचली अदालतों के निर्णय को बरकरार रखा है।
जस्टिस एच पी संदेश ने 17 जुलाई को दिए अपने आदेश में पिता की पुनर्विचार याचिका को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि घरेलू हिंसा से महिला संरक्षण अधिनियम, 2005 (डीवी एक्ट) की धारा 20(डी) के तहत अदालतों को यह अधिकार है कि वे गुजारे भत्ते के अलावा पीड़ित व्यक्ति और उसके बच्चों की शिक्षा का खर्च उठाने का आदेश भी प्रतिवादी को दे सकती हैं। हाईकोर्ट ने वित्तीय रिकॉर्ड्स के आधार पर पाया कि पिता इस खर्च को उठाने में पूरी तरह सक्षम हैं।
फीस को लेकर पारिवारिक विवाद और दादा की मदद
यह कानूनी विवाद तब शुरू हुआ जब बेटी ने ट्रायल कोर्ट में याचिका दायर कर अपने पिता से मैंगलोर के ‘फादर मुलर इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च’ में डर्मेटोलॉजी से एमडी (MD Dermatology) करने के लिए पहले साल की फीस और अन्य खर्चों के तौर पर 16 लाख रुपये दिलाने की मांग की थी। छात्रा ने नीट पीजी (NEET PG) परीक्षा में 11,722वीं रैंक हासिल की थी और कर्नाटक परीक्षा प्राधिकरण (KEA) के जरिए दाखिला लिया था। केईए के माध्यम से उसकी सालाना फीस 13.87 लाख रुपये तय हुई थी, जबकि सामान्य रूप से प्राइवेट कोटे की फीस करीब 75 लाख रुपये होती है।
बेटी के वकील अजय प्रभु एम ने कोर्ट को बताया कि दाखिले की अंतिम तिथि नजदीक होने के कारण छात्रा को जल्दबाजी में अपने दादा से 13.87 लाख रुपये उधार लेने पड़े थे। मांगी गई 16 लाख रुपये की राशि का उद्देश्य दादा का कर्ज चुकाना और बाकी बचे 1.5 लाख रुपये के अन्य शैक्षणिक खर्चों को पूरा करना था।
पिता के तर्क और कोर्ट के निष्कर्ष
दूसरी ओर, पिता के वकील एस बालकृष्णन ने इन मांगों का विरोध किया। उन्होंने आरोप लगाया कि यह याचिका केवल उनके मुवक्किल को परेशान करने और पैसे वसूलने के लिए दायर की गई है। वकील ने दावा किया कि बेटी की नीट रैंक अच्छी नहीं थी, उसके पास खुद के पर्याप्त पैसे हैं और उसे हर महीने 60,000 रुपये का स्टाइपेंड मिलेगा जो उसके दैनिक खर्चों के लिए काफी है। उन्होंने दादा के पास इतनी बड़ी राशि उधार देने की क्षमता पर भी सवाल उठाया और कहा कि पिता खुद वित्तीय समस्याओं और मानसिक स्वास्थ्य संबंधी दिक्कतों का सामना कर रहे हैं।
हालांकि, ट्रायल कोर्ट और उसके बाद अपीलीय कोर्ट ने पिता के इन सभी दावों को खारिज कर दिया था। ट्रायल कोर्ट ने छात्रा की रैंक, दाखिले के दस्तावेज और बैंक रिकॉर्ड की जांच की, जिससे पुष्टि हुई कि दादा ने पोती को 14 लाख रुपये ट्रांसफर किए थे और वे वित्तीय रूप से ऐसा करने में सक्षम थे। अपीलीय कोर्ट ने यह भी माना कि मेडिकल क्षेत्र में पोस्ट-ग्रेजुएशन डॉक्टर के करियर का एक बेहद जरूरी पड़ाव है। चूंकि बेटी और उसकी मां की अपनी कोई स्वतंत्र आय नहीं है, इसलिए कोर्ट ने पिता को 16 लाख रुपये देने का निर्देश दिया।
पारिवारिक संबंध और माता-पिता का नैतिक कर्तव्य
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में इस बात को रेखांकित किया कि जब बेटी का एमबीबीएस (MBBS) में दाखिला कराया गया था, तब माता-पिता साथ रह रहे थे और उनके बीच कोई विवाद नहीं था। ऐसी स्थिति में पिता अब अपनी बेटी की पोस्ट-ग्रेजुएशन की पढ़ाई का खर्च उठाने से मना नहीं कर सकते।
जस्टिस संदेश ने जोर देकर कहा कि दुनिया भर में माता-पिता का यह नैतिक कर्तव्य है कि वे अपने बच्चों को बुनियादी सुविधाएं, स्वास्थ्य और शिक्षा प्रदान करें। उन्होंने स्पष्ट किया कि घरेलू हिंसा कानून के तहत ‘आर्थिक शोषण’ की परिभाषा में उन सभी वित्तीय या आर्थिक संसाधनों से वंचित करना भी शामिल है, जिसका हकदार कोई व्यक्ति कानून या सामाजिक परंपरा के अनुसार होता है।

