राज्य सरकार की अपील के बिना अपीलीय अदालत सजा नहीं बढ़ा सकती: हाईकोर्ट ने पिता पर तेजाब फेंकने के मामले में बेटे की दोषसिद्धि को बरकरार रखा

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने साल 1981 में अपने पिता पर तेजाब फेंकने के दोषी एक व्यक्ति की याचिका को खारिज कर दिया है। इसके साथ ही कोर्ट ने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 326 के तहत उसकी दोषसिद्धि और तीन साल की कठोर कारावास की सजा को बरकरार रखा है। मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस संतोष राय ने निचली अदालत द्वारा दोषी को कम गंभीर अपराध में सजा देने और अनिवार्य वैधानिक जुर्माना न लगाने पर गहरी चिंता व्यक्त की। हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि केवल दोषी द्वारा दायर की गई अपील में अपीलीय अदालत सजा को बढ़ा नहीं सकती और न ही आरोपी के खिलाफ दिए गए निष्कर्षों में इस तरह बदलाव कर सकती है जिससे उसका नुकसान हो।

मामले की पृष्ठभूमि

अभियोजन पक्ष के अनुसार, यह घटना 5 सितंबर 1981 को सुबह करीब 7:00 बजे गोरखपुर के बिछिया गांव में हुई थी। अपीलकर्ता (बेटा) अपने पिता के साथ एक दोमंजिला मकान की ऊपरी मंजिल पर रहता था, जबकि नीचे की मंजिल पर किराएदार रहते थे।

घटना के दिन घर के भीतर दोनों के बीच किसी बात को लेकर विवाद शुरू हो गया। इस झगड़े के दौरान बेटे ने अपने पिता पर तेजाब उड़ेल दिया, जिससे वह बुरी तरह झुलस गए। वारदात को अंजाम देकर आरोपी दक्षिण दिशा की ओर भागने लगा, लेकिन चीख-पुकार सुनकर एक स्थानीय निवासी ने दूसरे ग्रामीण की मदद से पीछा कर उसे कुछ ही दूरी पर दबोच लिया। इसके बाद आरोपी को पुलिस के हवाले कर दिया गया और मामले में प्राथमिकी (FIR) दर्ज की गई।

गंभीर रूप से घायल पिता को एक रिक्शा चालक द्वारा तुरंत मेडिकल कॉलेज अस्पताल ले जाया गया। तेजाब के कारण उनका चेहरा, गर्दन, छाती और ऊपरी शरीर लगभग 60 प्रतिशत तक बुरी तरह झुलस चुके थे। अस्पताल में करीब तीन सप्ताह तक इलाज चलने के बाद, घावों में सेप्टीसीमिया और अत्यधिक कमजोरी के कारण उन्होंने दम तोड़ दिया। इस घटना के दौरान हाथापाई में आरोपी के हाथ पर भी तेजाब के कुछ छींटे पड़े थे, जिससे उसे मामूली चोटें आई थीं।

गोरखपुर के सत्र न्यायाधीश ने आरोपी बेटे के खिलाफ आईपीसी की धारा 302 (हत्या) के तहत आरोप तय किए थे। हालांकि, निचली अदालत ने अंततः उसे आईपीसी की धारा 326 (खतरनाक हथियारों या साधनों से स्वेच्छा से गंभीर चोट पहुंचाना) के तहत दोषी ठहराया और बिना कोई जुर्माना लगाए केवल तीन साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई।

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पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ता की ओर से पेश न्यायमित्र (Amicus Curiae) ने तर्क दिया कि उसने यह अपराध नहीं किया है और उसे इस मामले में झूठा फंसाया गया है। यह दावा किया गया कि पिता की मृत्यु पूरी तरह से एक दुर्घटना थी और अपीलकर्ता को अपने पिता को बचाने की कोशिश में हाथों पर तेजाब के छींटे लगे थे। बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि यह आपराधिक अपील साल 1983 से लंबित है और वर्तमान में अपीलकर्ता की उम्र 60 वर्ष से अधिक हो चुकी है, इसलिए उसे प्रोबेशन (परिवीक्षा) का लाभ दिया जाना चाहिए।

राज्य सरकार का प्रतिनिधित्व कर रहे अपर सरकारी अधिवक्ता (AGA) ने इन दलीलों का कड़ा विरोध किया। उन्होंने तर्क दिया कि अपीलकर्ता ने आपसी विवाद के दौरान अपने पिता के शरीर के संवेदनशील हिस्सों पर जानबूझकर तेजाब फेंका था। अभियोजन पक्ष ने स्पष्ट किया कि हालांकि यह अपराध हत्या या गैर-इरादतन हत्या की श्रेणी में आता था, लेकिन निचली अदालत ने आरोपी को केवल धारा 326 के तहत सजा देकर पहले ही अत्यधिक नरम रुख अपनाया है।

हाईकोर्ट का विश्लेषण

साक्ष्यों की समीक्षा करते हुए हाईकोर्ट ने पाया कि अपीलकर्ता को आई मामूली खरोंचों और मृतक के शरीर पर मिले गहरे 60 प्रतिशत तेजाब के घावों के बीच एक बड़ा अंतर था। कोर्ट ने माना कि यह अंतर स्पष्ट रूप से इशारा करता है कि अपीलकर्ता ही हमलावर था।

कोर्ट ने इस बात पर भी ध्यान दिया कि घटना स्थल पर मौजूद होने के बावजूद आरोपी ने अपने पिता को अस्पताल ले जाने का कोई प्रयास नहीं किया, बल्कि वह वहां से भागने की कोशिश कर रहा था और उसे स्वतंत्र गवाहों ने पकड़ा था। यह व्यवहार आरोपी की गलत मंशा को दर्शाता है।

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इसके अलावा, कोर्ट ने घटना के बाद अस्पताल में जांच अधिकारी द्वारा दर्ज किए गए मृतक के बयान का विश्लेषण किया। हालांकि केस डायरी में लापरवाही के कारण “तेजाब” की जगह “शराब” शब्द लिख दिया गया था, लेकिन बाद में कोर्ट के समक्ष इस पर स्पष्टीकरण दे दिया गया था। चूंकि यह बयान सीधे तौर पर मौत के कारणों से जुड़ा था और इसके बाद पीड़ित की मृत्यु हो गई थी, इसलिए कोर्ट ने इसे भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 32(1) के तहत ‘मरणासन्न कथन’ के रूप में पूरी तरह स्वीकार्य माना। जस्टिस संतोष राय ने टिप्पणी की कि:

“जहां तक आरोपी की संलिप्तता का सवाल है, रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्यों के आधार पर इस पर कोई संदेह नहीं है।”

हाईकोर्ट ने निचली अदालत के इस निष्कर्ष से पूरी तरह असहमति जताई कि अपीलकर्ता के पास हत्या या गैर-इरादतन हत्या के लिए आवश्यक ज्ञान की कमी थी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि तेजाब की विनाशकारी प्रकृति एक सामान्य ज्ञान की बात है और शरीर पर इसका जानबूझकर किया गया इस्तेमाल यह दर्शाता है कि आरोपी इसके घातक परिणामों से पूरी तरह वाकिफ था। इसके साथ ही कोर्ट ने कहा कि निचली अदालत ने धारा 326 आईपीसी के तहत कारावास के साथ-साथ अनिवार्य जुर्माना न लगाकर एक गंभीर कानूनी भूल की है।

सत्र न्यायालय द्वारा इस मामले के संचालन पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए जस्टिस संतोष राय ने टिप्पणी की:

“न्यायिक विवेक कभी भी न्यायिक मनमानेपन का पर्याय नहीं हो सकता। जहां कानून और सबूत तर्कसंगत एवं वैध निर्णय की मांग करते हैं, वहां सहानुभूति या अनुचित उदारता का कोई स्थान नहीं होता।”

कोर्ट ने आगे कहा कि यह फैसला न्यायिक अधिकारियों के लिए एक सीख की तरह होना चाहिए:

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“यह निर्णय इस बात की याद दिलाएगा कि इन मौलिक न्यायिक दायित्वों को निभाने में विफलता गंभीर न्यायिक आलोचना और सेवा में रहने वाले अधिकारियों के खिलाफ कानून के अनुसार उचित प्रशासनिक कार्रवाई का कारण बन सकती है।”

इन गंभीर टिप्पणियों के बावजूद, कोर्ट ने पाया कि राज्य सरकार की ओर से सजा बढ़ाने के लिए कोई अपील या पुनरीक्षण याचिका दायर नहीं की गई थी। स्थापित कानूनी सिद्धांतों का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल दोषी द्वारा दायर की गई अपील में अपीलीय अदालत सजा को बढ़ा नहीं सकती और न ही आरोपी के हितों के खिलाफ जाकर निष्कर्षों को बदल सकती है।

हाईकोर्ट का निर्णय

हाईकोर्ट ने अपराध की गंभीरता और इसके घरेलू स्वरूप (बेटे द्वारा पिता पर हमला) को देखते हुए अपीलकर्ता को अच्छे आचरण के प्रोबेशन पर रिहा करने की मांग को पूरी तरह खारिज कर दिया।

कोर्ट ने आईपीसी की धारा 326 के तहत अपीलकर्ता की दोषसिद्धि को बरकरार रखा। निचली अदालत द्वारा जुर्माना न लगाने की कानूनी भूल को दर्ज करने के बावजूद, कोर्ट ने राज्य की ओर से सजा बढ़ाने की अपील न होने के कारण तीन साल की कठोर कारावास की सजा में कोई बदलाव नहीं किया।

इसके साथ ही अपील को खारिज कर दिया गया। अपीलकर्ता को शेष सजा काटने के लिए दो सप्ताह के भीतर आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया गया है। यदि वह निर्धारित समय में आत्मसमर्पण नहीं करता है, तो निचली अदालत को उसे हिरासत में लेने के लिए गैर-जमानती वारंट जारी करने सहित आवश्यक दंडात्मक कदम उठाने का निर्देश दिया गया है।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: रज्जाक बनाम उत्तर प्रदेश राज्य
वाद संख्या: क्रिमिनल अपील संख्या 2810 ऑफ 1983
पीठ: जस्टिस संतोष राय
निर्णय की तिथि: 15 जुलाई, 2026

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