इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि किसी अधीनस्थ पुलिस अधिकारी द्वारा अपने वरिष्ठ अधिकारियों के निर्देश पर सौंपी गई जांच रिपोर्ट में अपनी राय व्यक्त करना कदाचार (मिसकंडक्ट) की श्रेणी में नहीं आता है, भले ही वे टिप्पणियां किसी लंबित मुकदमे से जुड़ी हों। जस्टिस आलोक माथुर और जस्टिस अमिताभ कुमार राय की खंडपीठ ने उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा दायर रिट याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए राज्य लोक सेवा न्यायाधिकरण (ट्रिब्यूनल) के उस निर्णय को बरकरार रखा, जिसमें अधिकारी को सेवा से बर्खास्त करने के आदेश को रद्द कर दिया गया था। इसके साथ ही, हाईकोर्ट ने न्यायाधिकरण के उस निर्देश को खारिज कर दिया जिसमें अधिकारी के खिलाफ नए सिरे से अनुशासनात्मक जांच शुरू करने की बात कही गई थी, जिससे अधिकारी को कदाचार के आरोपों से पूरी तरह से राहत मिल गई है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला वर्ष 2019 में दर्ज हुई एक प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR No. 548/2019) से शुरू हुआ था। यह एफआईआर वाराणसी के लंका थाने में एक आरोपी के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 420, 376, 504 और 506 के तहत दर्ज की गई थी। पुलिस जांच पूरी होने के बाद, प्रयागराज की विशेष एमपी/एमएलए अदालत में चार्जशीट दाखिल की गई और वहां मुकदमा शुरू हुआ।
मुकदमे के लंबित रहने के दौरान, आरोपी के पिता ने 20 अप्रैल 2020 को वाराणसी रेंज के अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (ADG) को एक शिकायत पत्र देकर जांच की निष्पक्षता पर सवाल उठाए थे। ADG ने इस शिकायत का संज्ञान लिया और वाराणसी के पुलिस महानिरीक्षक (IG) को मामले की जांच कर रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया। इसके बाद, 16 जून 2020 को वाराणसी के पुलिस उपमहानिरीक्षक (DIG) ने वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP) को जांच के निर्देश दिए, जिन्होंने अंततः तत्कालीन सर्कल ऑफिसर (CO) भेलूपुर (जो इस मामले में प्रतिवादी अधिकारी हैं) को जांच करने और रिपोर्ट प्रस्तुत करने का जिम्मा सौंपा।
वरिष्ठ अधिकारियों के आदेश के अनुपालन में प्रतिवादी अधिकारी ने जांच आगे बढ़ाई। उन्होंने कॉल रिकॉर्ड और उपलब्ध साक्ष्यों सहित सभी संबंधित दस्तावेजों की समीक्षा की और 8 अगस्त 2020 को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की। इस रिपोर्ट में अधिकारी ने राय दी कि आरोपी के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामला एक साजिश थी, आरोप झूठे थे और शिकायतकर्ता के दावों का समर्थन करने के लिए पर्याप्त सबूत नहीं थे। उन्होंने सिफारिश की कि इस मामले में आगे की जांच के लिए आईपीसी की धारा 173(8) के तहत एक आवेदन दायर किया जाना चाहिए।
प्रारंभ में, वाराणसी के पुलिस अधीक्षक (नगर) यानी SP (City) ने इस रिपोर्ट की समीक्षा की और 11 दिसंबर 2020 को प्रस्तुत अपनी विस्तृत रिपोर्ट में अधिकारी के निष्कर्षों का समर्थन किया। उन्होंने भी सहमति व्यक्त की कि मामले में धारा 173(8) के तहत आगे की जांच की जानी चाहिए।
हालांकि, स्थिति तब बदल गई जब तत्कालीन SSP वाराणसी ने 17 दिसंबर 2020 को एक समीक्षा पत्र जारी किया और 29 दिसंबर 2020 को एक रिपोर्ट भेजी। इस रिपोर्ट में कहा गया कि चूंकि मामला पहले से ही सक्षम अदालत के समक्ष है और अदालत ने संज्ञान ले लिया है, इसलिए इस पर दोबारा जांच की आवश्यकता नहीं है। SSP ने अधिकारी द्वारा की गई टिप्पणियों को अत्यधिक आपत्तिजनक माना, क्योंकि इससे अदालत की कार्यवाही प्रभावित हो सकती थी।
इसके बाद, 30 दिसंबर 2020 को प्रशासनिक स्तर पर बेहद तेजी से पत्राचार हुआ। आईजी से एडीजी, एडीजी से डीजी और डीजी से राज्य सरकार तक फाइलें बढ़ीं और उसी दिन यानी 30 दिसंबर 2020 को ही प्रतिवादी अधिकारी को निलंबित कर दिया गया। उन्हें 17 फरवरी 2021 को चार्जशीट दी गई और 18 अक्टूबर 2021 को सेवा से बर्खास्त कर दिया गया।
अधिकारी ने इस बर्खास्तगी को राज्य लोक सेवा न्यायाधिकरण (ट्रिब्यूनल) के समक्ष चुनौती दी। न्यायाधिकरण ने 11 सितंबर 2025 को याचिका को स्वीकार कर लिया। ट्रिब्यूनल ने माना कि हालांकि रिपोर्ट तैयार करने में शब्दों के चयन में कुछ लापरवाही हो सकती है, लेकिन इसे कदाचार नहीं माना जा सकता। ट्रिब्यूनल ने प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के उल्लंघन और अत्यधिक कठोर सजा के आधार पर बर्खास्तगी को रद्द कर दिया, लेकिन मामले को वापस राज्य सरकार को भेज दिया कि वे चार्जशीट के चरण से नए सिरे से जांच आगे बढ़ाएं।
पक्षकारों की दलीलें
उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से पेश हुए अतिरिक्त महाधिवक्ता और स्थायी वकील ने ट्रिब्यूनल के आदेश को चुनौती दी। उनका तर्क था कि प्रतिवादी अधिकारी ने जांच का काम स्वीकार किया और एक लंबित मुकदमे के संबंध में ऐसी टिप्पणियां कीं जो अनावश्यक थीं। उन्होंने तर्क दिया कि इसी वजह से उनके खिलाफ बड़ी सजा की कार्यवाही शुरू की गई और बर्खास्तगी का आदेश दिया गया।
दूसरी ओर, प्रतिवादी अधिकारी के वरिष्ठ वकील और सहयोगी वकील ने इस रिट याचिका का विरोध किया। उन्होंने दलील दी कि ट्रिब्यूनल ने सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण फैसले ‘स्टेट ऑफ पंजाब बनाम राम सिंह (AIR 1992 SC 2188)’ का हवाला देते हुए बिल्कुल सही निष्कर्ष निकाला था कि जांच रिपोर्ट सौंपना कदाचार नहीं है। उन्होंने आगे तर्क दिया कि जब यह स्थापित हो चुका है कि कोई कदाचार नहीं हुआ, तो ट्रिब्यूनल का राज्य सरकार को चार्जशीट के चरण से नए सिरे से अनुशासनात्मक कार्यवाही शुरू करने का निर्देश देना पूरी तरह से गलत था।
कोर्ट का विश्लेषण
हाईकोर्ट ने इस कानूनी प्रश्न की विस्तार से जांच की कि क्या इन परिस्थितियों में अधिकारी द्वारा जांच रिपोर्ट प्रस्तुत करना कदाचार के दायरे में आता है या नहीं।
अदालत ने पाया कि अधिकारी ने अपने वरिष्ठ अधिकारियों के सीधे आदेशों के तहत ही यह जांच की थी। खंडपीठ ने इस पर टिप्पणी की:
“उन पर कोई सीमा नहीं लादी गई थी और न ही उनके वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा उनकी भूमिका तय की गई थी, बल्कि उन्हें जांच रिपोर्ट सौंपने के लिए पूरी छूट दी गई थी।”
कोर्ट ने रेखांकित किया कि अधिकारी की रिपोर्ट केवल एक राय थी जो उन्होंने अपने वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को सौंपी थी, न कि इसे सीधे सक्षम अदालत में पेश किया गया था। वरिष्ठ अधिकारी इस राय को मानने के लिए बाध्य नहीं थे और यदि वे इसे किसी वैधानिक प्रावधान का उल्लंघन या अदालती कार्यवाही में हस्तक्षेप मानते, तो वे इसे आसानी से खारिज कर सकते थे।
इसके अलावा, कोर्ट ने ध्यान दिलाया कि SP (City) ने भी एक विस्तृत रिपोर्ट के माध्यम से अधिकारी के निष्कर्षों को स्वीकार किया था और उसकी पुष्टि की थी, लेकिन राज्य सरकार ने उनके खिलाफ कोई दंडात्मक अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं की। कोर्ट ने टिप्पणी की कि यदि ऐसी रिपोर्ट सौंपना वास्तव में कदाचार था, तो SP (City) के खिलाफ कार्रवाई न करने का कोई संतोषजनक स्पष्टीकरण सरकार की ओर से नहीं दिया गया।
सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले ‘स्टेट ऑफ पंजाब बनाम राम सिंह (AIR 1992 SC 2188)’ का उल्लेख करते हुए हाईकोर्ट ने दोहराया कि “कर्तव्य के पालन में किसी भी प्रकार की लापरवाही को कदाचार नहीं माना जाएगा।” कोर्ट ने कहा कि ऐसा कोई आरोप नहीं है कि अधिकारी ने अपनी राय किसी बाहरी प्रभाव, व्यक्ति या प्राधिकारी के दबाव में दी थी।
खंडपीठ ने अंत में माना:
“प्रतिवादी द्वारा अपनी जांच रिपोर्ट प्रस्तुत करने में कोई कदाचार नहीं किया गया था।”
कोर्ट का निर्णय
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि चूंकि अधिकारी के खिलाफ कदाचार का कोई मामला नहीं बनता है, इसलिए राज्य सरकार को उनके खिलाफ नए सिरे से जांच करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
अदालत ने कहा:
“न्यायाधिकरण का यह निर्देश कि मामले को वापस याचिकाकर्ताओं को भेजा जाए ताकि वे प्रतिवादी के खिलाफ नए सिरे से जांच कर सकें, पूरी तरह से गैर-कानूनी और मनमाना है”
तदनुसार, हाईकोर्ट ने रिट याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार कर लिया। कोर्ट ने अधिकारी की बर्खास्तगी को रद्द करने वाले ट्रिब्यूनल के फैसले को तो बरकरार रखा, लेकिन ट्रिब्यूनल के उस आदेश को पूरी तरह खारिज कर दिया जिसके तहत राज्य सरकार को नए सिरे से विभागीय कार्यवाही शुरू करने की छूट दी गई थी।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: स्टेट ऑफ यू.पी. बनाम अमरेश कुमार सिंह बघेल
वाद संख्या: रिट ए संख्या 4055 वर्ष 2026
पीठ: जस्टिस आलोक माथुर, जस्टिस अमिताभ कुमार राय
निर्णय की तिथि: 10 जुलाई 2026

