माता-पिता के साथ रहना अवैध हिरासत नहीं, लिव-इन रिलेशनशिप को अदालती मंजूरी देने के लिए नियमित रूप से नहीं जारी हो सकती बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका: आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट

आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने एक महिला को उसकी मां और भाई के पास से मुक्त कराने के लिए दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण (हेबियस कॉर्पस) याचिका को खारिज कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि एक बालिग बेटी का अपनी मां और भाई के साथ पैतृक घर में रहना किसी भी तरह से अवैध हिरासत नहीं माना जा सकता। जस्टिस रवि नाथ तिलहारी और जस्टिस सुभेंदु सामंत की खंडपीठ ने कहा कि बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका का उपयोग किसी लिव-इन रिलेशनशिप को अदालती मंजूरी दिलाने के लिए एक सामान्य हथियार के रूप में नहीं किया जा सकता है। कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि इस याचिका की बुनियादी सीमा यह है कि इसके लिए गैर-कानूनी नजरबंदी का स्पष्ट प्रमाण होना चाहिए, जो इस मामले में पूरी तरह से नदारद था।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता ने संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की थी। याचिकाकर्ता ने कोर्ट से एक 22 वर्षीय महिला को उसके परिवार के चंगुल से मुक्त कराने की मांग की थी, जो वर्तमान में अपनी मां और भाई के साथ रह रही है। याचिकाकर्ता का आरोप था कि उस महिला को उसके परिवार द्वारा उसकी मर्जी के खिलाफ अवैध रूप से बंधक बनाकर रखा गया है।

पक्षों की दलीलें

याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील श्री वाई. स्वरूप साई ने दलील दी कि याचिकाकर्ता और कथित महिला दोनों बालिग हैं और आपसी सहमति व स्वतंत्र इच्छा से एक-दूसरे के साथ संबंध में हैं। वे अपना भविष्य एक साथ बिताना चाहते हैं। अपनी बात के समर्थन में याचिकाकर्ता ने दोनों की कुछ तस्वीरें (प्रदर्श पी2) और उनके बीच हुए व्हाट्सएप चैट के स्क्रीनशॉट (प्रदर्श पी5) कोर्ट के समक्ष पेश किए। इन दस्तावेजों के आधार पर यह दावा किया गया कि महिला को उसके परिवार द्वारा जबरन रोक कर रखा गया है, इसलिए उसे कोर्ट के सामने पेश किया जाए।

कोर्ट का विश्लेषण

खंडपीठ ने याचिकाकर्ता द्वारा पेश की गई तस्वीरों और व्हाट्सएप चैट का बारीकी से अध्ययन किया और इस निष्कर्ष पर पहुंची कि ये दस्तावेज किसी भी तरह से अवैध हिरासत के मामले को साबित नहीं करते हैं। कोर्ट ने पाया कि चैट संदेशों से ऐसा कहीं भी प्रतीत नहीं होता कि परिवार के सदस्य महिला को उसकी मर्जी के खिलाफ रोक रहे हैं, और न ही महिला ने कभी अपना पैतृक घर छोड़ने की इच्छा व्यक्त की थी।

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा:

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“रिकॉर्ड पर ऐसा कोई भी प्राथमिक साक्ष्य मौजूद नहीं है जिससे यह माना जा सके कि कथित महिला का अपने पैतृक घर में मां और भाई के साथ रहना उसकी इच्छा के विरुद्ध है और यह अवैध हिरासत की श्रेणी में आता है।”

बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका को नियंत्रित करने वाले कानूनी मानकों पर चर्चा करते हुए कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के एक ऐतिहासिक फैसले ‘होम सेक्रेटरी (प्रिजन) बनाम एच. निलोफर निशा’ (2020) का हवाला दिया। खंडपीठ ने रेखांकित किया कि यद्यपि समय के साथ बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका का दायरा बढ़ा है और अब जीवनसाथी या बच्चों की कस्टडी जैसे पारिवारिक मामलों में भी इसका उपयोग होता है, लेकिन वर्तमान मामले में याचिकाकर्ता कथित महिला का कानूनी पति नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले की सीमाओं का उल्लेख करते हुए कोर्ट ने टिप्पणी की:

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“कोई भी बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका जारी करने से पहले, कोर्ट को इस निष्कर्ष पर पहुंचना अनिवार्य है कि संबंधित व्यक्ति को बिना किसी कानूनी अधिकार के हिरासत में रखा गया है।”

हाईकोर्ट ने आगे स्पष्ट किया कि यदि कोई बेटी अपने पैतृक घर में मां और भाई के साथ रह रही है, तो सामान्य तौर पर इसे अवैध हिरासत नहीं माना जा सकता, जब तक कि इसके विपरीत कोई बेहद असाधारण और मजबूत सबूत न पेश किया जाए।

इसके अतिरिक्त, याचिकाकर्ता द्वारा लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर दी गई दलीलों को कोर्ट ने ‘नंदकुमार बनाम केरल राज्य’ (2018) के मामले से अलग बताया। नंदकुमार मामले में एक विवाहित जोड़ा शामिल था, जिसमें पति की आयु शादी की कानूनी उम्र (21 वर्ष) से कम थी। उस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने ‘शाफिन जहां बनाम अशोकन के.एम.’ (2018) का हवाला देते हुए संविधान के अनुच्छेद 19 और 21 के तहत व्यक्तिगत पसंद के अधिकार की रक्षा की थी। वर्तमान मामले पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 के तहत लिव-इन रिलेशनशिप को जो विधायी मान्यता दी गई है, वह विशुद्ध रूप से महिलाओं की सुरक्षा के लिए एक सुरक्षात्मक उपाय है।

इस संदर्भ में कोर्ट ने कहा:

“हमारी राय में, घरेलू हिंसा अधिनियम, 2005 के तहत लिव-इन रिलेशनशिप को मान्यता देने का उद्देश्य इस तरह के संबंधों को बढ़ावा देना या किसी वैध कानूनी ढांचे का उल्लंघन करना नहीं हो सकता।”

खंडपीठ ने इस तरह की याचिका दायर करने की मंशा पर कड़ा रुख अपनाते हुए टिप्पणी की:

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“वर्तमान रिट याचिका का दायर किया जाना हमें इस कोर्ट की सील और हस्ताक्षर के जरिए लिव-इन रिलेशनशिप पर कानूनी मुहर लगवाने का एक प्रयास प्रतीत होता है।”

कोर्ट का निर्णय

हाईकोर्ट ने मामले में अपने रिट क्षेत्राधिकार का उपयोग करने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि केवल सतही और खोखले आरोपों के आधार पर महिला को अदालत में समन करना अनुच्छेद 21 के तहत उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सम्मान के साथ जीने के अधिकार का सीधा उल्लंघन होगा।

फैसले को समाप्त करते हुए कोर्ट ने निर्देश दिया:

“अदालत में किसी व्यक्ति को पेश करने के लिए बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका नियमित रूप से जारी नहीं की जा सकती। इसके लिए उचित और ठोस आधार दिखाना आवश्यक है। बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका भले ही अधिकार के रूप में प्राप्त रिट है, लेकिन यह कोई सामान्य प्रक्रियात्मक याचिका नहीं है जिसे बिना सोचे-समझे स्वीकार कर लिया जाए।”

इसके साथ ही कोर्ट ने रिट याचिका को खारिज कर दिया। कोर्ट ने इस संबंध में किसी भी पक्ष पर कोई हर्जाना या अदालती खर्च नहीं लगाया और याचिकाकर्ता को कानून के तहत उपलब्ध अन्य उचित कानूनी रास्ते अपनाने की छूट दी।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: मोगल शुएबुल्ला बेग बनाम आंध्र प्रदेश राज्य एवं अन्य
वाद संख्या: रिट याचिका संख्या 16987/2026
पीठ: जस्टिस रवि नाथ तिलहारी और जस्टिस सुभेंदु सामंत
निर्णय की तिथि: 29.06.2026

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