राजस्थान हाईकोर्ट की मंजूरी: जोधपुर की ओपन जेल में शादी करेंगे दो सजायाफ्ता कैदी

राजस्थान हाईकोर्ट ने जोधपुर की मंडोर ओपन जेल (ओपन एयर कैंप) में बंद हत्या के एक 33 वर्षीय दोषी कैदी को उसकी महिला साथी से विवाह करने की अनुमति दे दी है। महिला भी एक सजायाफ्ता कैदी है, जो फिलहाल जमानत पर बाहर है। जस्टिस पुष्पेंद्र सिंह भाटी और जस्टिस प्रवीर भटनागर की खंडपीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि दो वयस्कों के बीच उनकी सहमति से होने वाली शादी संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिले जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का ही एक हिस्सा है। अदालत ने स्पष्ट किया कि जेल की सजा काटने के दौरान भी कैदियों के यह अधिकार सुरक्षित रहते हैं। इस विवाह की अंतिम तारीख अभी तय नहीं की गई है।

अदालत ने यह निर्देश कैदी की ओर से सजा को कुछ समय के लिए टालने (सस्पेंशन ऑफ सेंटेंस) की अर्जी पर सुनवाई करते हुए दिए। अदालत ने टिप्पणी की कि दो वयस्कों के बीच विवाह जीवन के अधिकार का एक अहम पहलू है। विवाह जैसी संस्था को सभी प्रमुख धर्मों और संस्कृतियों में मान्यता मिली हुई है और यह समाज की एक बुनियादी इकाई है।

शादी के लिए दिशा-निर्देश और शर्तें

हाईकोर्ट ने जेल प्रशासन को निर्देश दिया है कि वे जेल परिसर के भीतर ही इस विवाह समारोह को आयोजित करने की अनुमति दें। इस शादी में रस्मों को पूरा करने वाले पुरोहितों और परिवार के सदस्यों सहित अधिकतम 21 मेहमानों को शामिल होने की अनुमति दी गई है। हालांकि, जेल अधिकारियों के पास यह विवेकाधीन अधिकार होगा कि वे जरूरत पड़ने पर इससे अधिक मेहमानों को भी मंजूरी दे सकें।

शादी की तारीख तय होने के बाद जोड़े को जेल प्रशासन को इसकी सूचना देनी होगी, जिसके बाद ही अंतिम अनुमति मिलेगी। जेल प्रशासन को सुरक्षा और अनुशासन बनाए रखने के लिए आवश्यक शर्तें लगाने की पूरी छूट दी गई है। इस अनोखी शादी का पूरा खर्च खुद दूल्हे को उठाना होगा।

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राज्य सरकार का रुख और कानूनी आधार

इस शादी को लेकर राज्य सरकार ने कोई आपत्ति नहीं जताई। सरकारी वकील सी. एस. ओझा और श्रवण सिंह राठौड़ ने कोर्ट में 13 जुलाई की एक रिपोर्ट पेश की, जिसमें बताया गया कि दोनों कैदी पहले से ही लिव-इन रिलेशनशिप में थे और अब अपनी शादी को कानूनी रूप देना चाहते हैं। सरकारी वकीलों ने अदालत को आश्वस्त किया कि ओपन-एयर कैंप के भीतर शादी आयोजित करने में कोई कानूनी अड़चन नहीं है। उन्होंने ‘राजस्थान कैदी पैरोल पर रिहाई नियम, 2021’ का हवाला देते हुए कहा कि आपातकालीन मामलों में पैरोल दी जा सकती है और जेल की गरिमा को बनाए रखते हुए इस विवाह को संपन्न कराया जा सकता है।

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकीलों, कालू राम भाटी और श्रवण सिंह राठौड़ ने तर्क दिया कि इस शादी से दोनों कैदियों के पुनर्वास और सुधार में मदद मिलेगी, जिससे वे अपने भविष्य की योजना बना सकेंगे।

अपने फैसले में हाईकोर्ट ने साल 2022 के ‘नंदलाल बनाम राज्य गृह विभाग’ मामले का विशेष संदर्भ लिया। इस पुराने फैसले में स्पष्ट किया गया था कि जेल की सजा के कारण पारिवारिक रिश्तों को खत्म नहीं किया जाना चाहिए। कोर्ट ने तब टिप्पणी की थी कि कैदी की पत्नी को संतानोत्पत्ति के अधिकार से वंचित करना गलत है, क्योंकि उसने कोई अपराध नहीं किया है और न ही वह कोई सजा काट रही है। इसके साथ ही, पीठ ने पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के ‘जसवीर सिंह’ मामले के लैंडमार्क फैसले का भी उल्लेख किया, जिसमें माना गया था कि जेल में रहने के दौरान भी संतानोत्पत्ति का अधिकार सुरक्षित रहता है।

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ओपन जेल व्यवस्था और दूल्हे की पृष्ठभूमि

शादी का फैसला पाने वाला यह कैदी 16 फरवरी 2017 से हिरासत में है। उसे 19 अगस्त 2023 को नागौर की एक ट्रायल कोर्ट ने हत्या, सबूत मिटाने और मृतक की संपत्ति के गबन के आरोपों में दोषी ठहराया था। बाद में अच्छे आचरण और पात्रता मानदंडों को पूरा करने पर जेल प्रशासन की सिफारिश के बाद उसे मंडोर ओपन एयर कैंप में स्थानांतरित कर दिया गया था।

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राजस्थान में ओपन जेल प्रणाली ‘राजस्थान प्रिजनर्स ओपन एयर कैंप रूल्स, 1972’ के तहत काम करती है। इन जेलों को बिना दीवार, सलाखों और तालों की जेल कहा जाता है, जो पूरी तरह कैदियों के आत्म-अनुशासन पर निर्भर करती हैं। बंदियों को सुबह की हाजिरी के बाद बाहर जाकर काम करने और आजीविका कमाने की आजादी होती है, ताकि वे अपने परिवार का भरण-पोषण कर सकें। इतना ही नहीं, उनके परिवार को भी जेल परिसर के भीतर उनके साथ रहने की अनुमति होती है, बशर्ते कैदी शाम की हाजिरी के समय वापस लौट आएं।

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