चुनाव पूर्व मुफ्त रेवड़ियों के वादे पर जल्द सुनवाई से सुप्रीम कोर्ट का इनकार

सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव से ठीक पहले राजनीतिक दलों द्वारा लोक-लुभावन या गैर-तार्किक मुफ्त चीजें (फ्रीबीज) बांटने के वादों के खिलाफ दायर याचिका पर जल्द सुनवाई करने से इनकार कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि वर्तमान में उसके पास मुकदमों का अत्यधिक दबाव है, इसलिए इस विषय पर सुनवाई के लिए अभी प्रतीक्षा करनी होगी।

चीफ जस्टिस सूर्या कांत, जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस वी मोहना की पीठ के समक्ष याचिकाकर्ता व अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय ने इस मामले को जल्द सूचीबद्ध करने का अनुरोध किया था। वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने भी इस मांग का समर्थन किया। हालांकि, चीफ जस्टिस ने सुनवाई टालते हुए कहा कि अदालत के पास अभी मामलों की बाढ़ आई हुई है और यह मुद्दा फिलहाल इंतजार कर सकता है।

इस पर याचिकाकर्ता ने दलील दी कि इस विषय पर त्वरित चर्चा बेहद आवश्यक है क्योंकि दोनों ही पक्ष इस मामले के समाधान के लिए एक विशेषज्ञ समिति (कमेटी) बनाने पर सहमत हो चुके हैं। उपाध्याय ने अदालत का ध्यान इस ओर भी खींचा कि इससे पहले 5 फरवरी को जब इस जनहित याचिका का उल्लेख किया गया था, तब अदालत ने मार्च में इस पर सुनवाई करने की सहमति दी थी।

2022 से लंबित है मामला

चुनावों में मुफ्त घोषणाओं पर रोक लगाने की मांग करने वाली इस याचिका पर कानूनी प्रक्रिया वर्ष 2022 से चल रही है। तत्कालीन चीफ जस्टिस एन.वी. रमना की अध्यक्षता वाली पीठ ने 25 जनवरी 2022 को ही इस जनहित याचिका पर केंद्र सरकार और चुनाव आयोग को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया था। उस दौरान अदालत ने इसे अत्यंत गंभीर मामला बताते हुए टिप्पणी की थी कि कई बार मुफ्त घोषणाओं का बजट राज्यों के नियमित वार्षिक बजट से भी ऊपर निकल जाता है।

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याचिकाकर्ता की दलीलें और कानूनी आपत्तियां

अधिवक्ता अश्वनी कुमार दुबे के माध्यम से दायर इस याचिका में तर्क दिया गया है कि चुनाव से पहले सरकारी खजाने से गैर-तार्किक मुफ्त सामान या सेवाएं बांटने का वादा करना मतदाताओं को अनुचित रूप से प्रभावित करता है। याचिकाकर्ता का कहना है कि यह प्रक्रिया स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के मार्ग में बाधा बनती है और सभी राजनीतिक दलों के लिए मिलने वाले समान अवसरों (लेवल प्लेइंग फील्ड) को नष्ट करती है।

याचिका में इस प्रवृत्ति को सत्ता में बने रहने के लिए जनता के पैसे से मतदाताओं को दी जाने वाली एक प्रकार की रिश्वत बताया गया है, जो लोकतांत्रिक मूल्यों और संविधान की मूल भावना को गहरी चोट पहुंचाती है।

दलीलों के अनुसार, किसी सार्वजनिक उद्देश्य के बिना केवल व्यक्तिगत लाभ के लिए सरकारी धन से मुफ्त वस्तुएं या सेवाएं वितरित करना संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), 162, 266(3) और 282 का सीधा उल्लंघन है। याचिका में हाल ही में कई राज्यों के विधानसभा चुनावों के दौरान राजनीतिक दलों द्वारा की गई इस तरह की घोषणाओं का भी हवाला दिया गया है। याचिकाकर्ता ने चिंता जताते हुए कहा कि चुनावों में धन बल और मुफ्त उपहारों का प्रभाव इस स्तर तक बढ़ चुका है कि कई बार चुनाव तक स्थगित करने पड़े हैं।

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चुनाव चिह्न कानून में बदलाव की मांग

इस समस्या से निपटने के लिए याचिका में सुप्रीम कोर्ट से मांग की गई है कि वह चुनाव आयोग को ‘चुनाव चिह्न (आरक्षण और आवंटन) आदेश, 1968’ में आवश्यक संशोधन करने का निर्देश दे। इसके तहत राजनीतिक दलों को राज्य स्तरीय दल के रूप में मिलने वाली मान्यता की शर्तों में एक नया नियम जोड़ा जाए। इस नियम के तहत चुनाव से पहले सरकारी धन से मुफ्त वस्तुएं बांटने का वादा करने वाले दलों पर प्रतिबंध लगाया जाए, उनका चुनाव चिह्न जब्त किया जाए और उनकी मान्यता रद्द की जाए।

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इसके वैकल्पिक उपाय के रूप में, याचिका में केंद्र सरकार को इस संबंध में एक प्रभावी और समर्पित कानून बनाने का निर्देश देने का भी अनुरोध किया गया है।

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