रिट क्षेत्राधिकार (Writ Jurisdiction) और प्रक्रियागत औचित्य की सीमाओं को रेखांकित करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय दिया है कि संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत असाधारण क्षेत्राधिकार का प्रयोग करने वाले हाईकोर्ट तथ्यात्मक निष्कर्षों की समीक्षा करने के लिए अपीलीय अदालतों के रूप में कार्य नहीं कर सकते हैं और न ही प्राकृतिक न्याय के मूलभूत सिद्धांतों की अनदेखी कर सकते हैं। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की खंडपीठ ने कर्नाटक हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसने प्रभावित पक्षों की सुनवाई किए बिना ही एक सिविल कोर्ट की तथ्यात्मक टिप्पणियों को खारिज कर दिया था। पहली अपीलीय अदालत के फैसले को पूरी तरह बहाल करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की कि प्रक्रियागत निष्पक्षता कानून के शासन का एक अनिवार्य स्तंभ है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद वर्ष 1999 में कुश्तागी के सिविल जज और जेएमएफसी की अदालत में दायर विभाजन (बंटवारे) और अलग कब्जे के एक सिविल मुकदमे से शुरू हुआ था। यह मुकदमा दो बहनों (मूल वादियों) द्वारा अपने दिवंगत पिता की संपत्ति में दो-तिहाई हिस्से की मांग को लेकर दायर किया गया था। उनका दावा था कि पिता की मृत्यु के बाद पारिवारिक संपत्ति का म्यूटेशन (दाखिल-खारिज) उनके भाई के नाम पर कर दिया गया था, लेकिन संपत्ति पर संयुक्त परिवार का ही कब्जा बना रहा। 1983 में भाई की मृत्यु के बाद, उनकी बेटी (पहली प्रतिवादी) ने वादियों की सहमति के बिना संपत्ति का म्यूटेशन अपने नाम पर करवा लिया और तीसरे पक्षों (क्रेताओं) को जमीन बेचकर विशेष स्वामित्व का दावा करना शुरू कर दिया।
ट्रायल कोर्ट ने 2015 में इस मुकदमे को खारिज कर दिया था। कोर्ट का कहना था कि वादी संपत्तियों पर अपना अधिकार साबित करने में विफल रहे और भाई की बेटी को मालिक के रूप में संपत्ति बेचने का पूरा अधिकार था। अपील दायर होने पर, पहली अपीलीय अदालत (सीनियर सिविल जज, कुश्तागी) ने भी 2021 में विभाजन के मुकदमे को खारिज करने के फैसले को बरकरार रखा।
हालांकि, अपने फैसले के पैराग्राफ 24 में, पहली अपीलीय अदालत ने कुछ विशेष तथ्यात्मक निष्कर्ष दर्ज किए। कोर्ट ने माना कि भाई की बेटी द्वारा खरीदारों को निष्पादित की गई बिक्री विलेख (सेल डीड) अमान्य थीं। कोर्ट ने नामों में विसंगतियों, धोखाधड़ी और 12 वर्षों से अधिक समय तक म्यूटेशन न होने जैसी कमियों का उल्लेख किया और निष्कर्ष निकाला कि उक्त संपत्तियों पर भाई की बेटी ही वास्तविक मालिक के रूप में काबिज है।
पैराग्राफ 24 के इन निष्कर्षों से असहमत होकर, खरीदारों में से एक (पांचवें प्रतिवादी) ने कर्नाटक हाईकोर्ट की धारवाड़ पीठ के समक्ष एक रिट याचिका दायर कर ‘सर्टिओरारी’ (उत्प्रेषण) रिट जारी करने की मांग की। हाईकोर्ट ने 2023 में इस रिट याचिका को स्वीकार कर लिया और पैराग्राफ 24 की टिप्पणियों को खारिज कर दिया। विशेष रूप से, हाईकोर्ट ने भाई की बेटी और उसके बेटे (जो सुप्रीम कोर्ट में अपीलकर्ता हैं) को नोटिस जारी किए बिना ही एकतरफा (एक्स-पार्टी) फैसला सुना दिया। हाईकोर्ट का मानना था कि पहली अपीलीय अदालत की टिप्पणियां बिना किसी दलील या सबूत के दर्ज की गई थीं।
पक्षकारों की दलीलें
सुप्रीम कोर्ट के समक्ष, अपीलकर्ताओं (भाई की बेटी और उसके बेटे) ने तर्क दिया कि हाईकोर्ट ने उन्हें सुनवाई का अवसर दिए बिना रिट याचिका का निपटारा करके गंभीर भूल की है। उनका कहना था कि हाईकोर्ट ने बिना कोई कारण बताए नोटिस भेजने की प्रक्रिया को दरकिनार कर दिया, जबकि विवादित टिप्पणियों का उनके अधिकारों, मालिकाना हक और संपत्ति के कब्जे पर सीधा असर पड़ रहा था।
दूसरी ओर, विपक्षी पक्षकारों (खरीदार) ने हाईकोर्ट के फैसले का समर्थन किया। उन्होंने दलील दी कि पहली अपीलीय अदालत द्वारा पैराग्राफ 24 में दर्ज किए गए प्रतिकूल निष्कर्ष मुकदमे के दौरान पक्षों द्वारा पेश की गई दलीलों या सबूतों पर आधारित नहीं थे, जिसके कारण वे स्पष्ट रूप से त्रुटिपूर्ण थे और रिट क्षेत्राधिकार के तहत उन्हें खारिज किया जाना पूरी तरह सही था।
कोर्ट का विश्लेषण
सुप्रीम कोर्ट ने विचार के लिए दो मुख्य प्रश्न तय किए: पहला, क्या सिविल मुकदमे में तय किए गए तथ्यात्मक निष्कर्षों को खारिज करने के लिए अनुच्छेद 226 के तहत सर्टिओरारी रिट याचिका विचारणीय थी? दूसरा, क्या हाईकोर्ट ने प्रभावित अपीलकर्ताओं को सुने बिना उन निष्कर्षों को रद्द करके गलती की?
पहले प्रश्न पर विचार करते हुए कोर्ट ने सर्टिओरारी रिट की स्थापित सीमाओं का विश्लेषण किया। हरि विष्णु कामथ बनाम सैयद अहमद इसहाक (जो टी.सी. बसप्पा बनाम टी. नागप्पा पर आधारित था) और सैयद याकूब बनाम के.एस. राधाकृष्णन के संविधान पीठ के फैसलों का हवाला देते हुए बेंच ने दोहराया कि रिट क्षेत्राधिकार पर्यवेक्षी (सुपरवाइजरी) होता है, अपीलीय नहीं। हाईकोर्ट अपने स्वयं के विचारों को थोपने के लिए सबूतों की समीक्षा या पुनर्मूल्यांकन नहीं करता है।
हरि विष्णु कामथ मामले का हवाला देते हुए कोर्ट ने टिप्पणी की: “सर्टिओरारी (उत्प्रेषण) रिट जारी करने वाला न्यायालय एक पर्यवेक्षी क्षेत्राधिकार का प्रयोग करता है, न कि अपीलीय क्षेत्राधिकार का। इसका एक परिणाम यह है कि न्यायालय अधीनस्थ न्यायालय या न्यायाधिकरण द्वारा दिए गए तथ्यों के निष्कर्षों की समीक्षा नहीं करेगा, भले ही वे त्रुटिपूर्ण ही क्यों न हों।”
कोर्ट ने सैयद याकूब मामले के नियम को भी उद्धृत किया: “रिकॉर्ड पर प्रत्यक्ष रूप से दिखने वाली कानून की गलती को रिट के माध्यम से सुधारा जा सकता है, लेकिन तथ्य की गलती को नहीं, चाहे वह कितनी भी गंभीर क्यों न प्रतीत हो।”
बेंच ने सेंट्रल काउंसिल फॉर रिसर्च इन आयुर्वेदिक साइंसेज बनाम बिकर्तन दास मामले का भी संदर्भ दिया, जिसमें स्पष्ट किया गया था कि यदि किसी न्यायाधिकरण या प्राधिकरण का निर्णय केवल तथ्यों या गुणों के मामले में गलत है, तो वहां सर्टिओरारी रिट लागू नहीं होगी। रिकॉर्ड की जांच करने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि पहली अपीलीय अदालत ने पैराग्राफ 24 में अपने निष्कर्ष दर्ज करने से पहले सबूतों, म्यूटेशन प्रविष्टियों, बिक्री विलेखों और पक्षों के आचरण का स्वतंत्र रूप से मूल्यांकन किया था। नतीजतन, हाईकोर्ट ने उन तथ्यात्मक निष्कर्षों को उलटकर अपने अधिकार क्षेत्र की सीमाओं को लांघा है।
दूसरे प्रश्न पर, सुप्रीम कोर्ट ने अपीलकर्ताओं को नोटिस न देने के लिए हाईकोर्ट की कड़ी आलोचना की। बेंच ने रेखांकित किया कि मालिकाना हक और कब्जे पर कोई भी अदालती निष्कर्ष सीधे तौर पर पक्षों के अधिकारों को प्रभावित करता है, जिससे वे आवश्यक पक्ष बन जाते हैं और उन्हें सुना जाना अनिवार्य है।
प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत (ऑडी अल्टरम पार्टम) का आह्वान करते हुए कोर्ट ने उत्तर प्रदेश राज्य बनाम सुधीर कुमार सिंह और पांच जजों की पीठ के फैसले सेंट्रल ऑर्गनाइजेशन फॉर रेलवे इलेक्ट्रिफिकेशन बनाम ईसीआई एसपीआईसी एसएमओ एमसीएमएल (जेवी) का हवाला दिया और उद्धृत किया: “प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन करने का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि ‘हर वह व्यक्ति जिसके अधिकार प्रस्तावित कार्रवाई से प्रभावित होने जा रहे हैं, उसे निष्पक्ष सुनवाई का अवसर मिले।'”
इसके अतिरिक्त, कृष्णदत्त अवस्थी बनाम मध्य प्रदेश राज्य का हवाला देते हुए कोर्ट ने टिप्पणी की कि प्रक्रियागत निष्पक्षता किसी भी सभ्य कानूनी प्रणाली के मूल में स्थित है। बेंच ने निष्कर्ष निकाला कि हाईकोर्ट के एकतरफा दृष्टिकोण के कारण प्राकृतिक न्याय का स्पष्ट उल्लंघन हुआ और अपीलकर्ताओं के हितों को गंभीर नुकसान पहुंचा।
कोर्ट का निर्णय
तदनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार कर ली और कर्नाटक हाईकोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया। कोर्ट ने पहली अपीलीय अदालत के फैसले और आदेश को पूरी तरह बहाल कर दिया।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसने इस मामले के गुण-दोष पर कोई राय व्यक्त नहीं की है। अदालत ने प्रतिवादियों को तीन महीने के भीतर उचित वैकल्पिक कानूनी रास्ते अपनाने की छूट दी और निर्देश दिया कि वैधानिक सीमा अवधि (लिमिटेशन पीरियड) योग्यता के आधार पर होने वाले निर्णय के आड़े नहीं आनी चाहिए।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: बसम्मा एवं अन्य बनाम गोपरप्पा एवं अन्य
वाद संख्या: सिविल अपील संख्या… 2026 (एसएलपी (सिविल) संख्या 10183/2024 से उत्पन्न)
पीठ: जस्टिस संजय करोल, जस्टिस विपुल एम. पंचोली
निर्णय की तिथि: 16 जुलाई 2026

