सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि जब माल ‘मालिक के जोखिम’ (ओनर्स रिस्क) की श्रेणी के तहत भेजा जाता है और उसकी लोडिंग रेलवे कर्मचारियों की देखरेख के बिना की जाती है, तो पारगमन (रास्ते) में हुई माल की कमी के लिए रेलवे प्रशासन को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस विपुल एम. पांचोली की पीठ ने मेसर्स बजाज ट्रेडिंग कंपनी द्वारा दायर अपील को खारिज करते हुए यह निर्णय दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब रेलवे रसीद पर ‘कहा गया है कि इसमें शामिल है’ (said to contain) की टिप्पणी दर्ज हो, तो वास्तव में लोड किए गए माल की मात्रा को साबित करने का दायित्व पूरी तरह से भेजने वाले (consignor) पर होता है। यदि भेजने वाला ऐसा नहीं कर पाता, तो वह रेलवे पर लापरवाही या कदाचार का आरोप नहीं लगा सकता।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद लगभग डेढ़ दशक पुराना है। 10 नवंबर 2009 को अपीलकर्ता मेसर्स बजाज ट्रेडिंग कंपनी ने गुजरात के चिराई जंक्शन से असम के धर्मनगर के लिए नमक की 40,444 बोरियों की खेप भेजी थी। हालांकि, जब यह खेप धर्मनगर पहुंची, तो वहां केवल 38,702 बोरियां ही मिलीं, यानी 1,742 बोरियों की कमी दर्ज की गई।
रेलवे अधिकारियों ने 19 मार्च 2010 को इस कमी के संबंध में एक ‘शॉर्टेज सर्टिफिकेट’ (कमी प्रमाण पत्र) जारी किया। इसके आधार पर अपीलकर्ता ने 6 अप्रैल 2010 को रेलवे को दावा नोटिस भेजकर 200 रुपये प्रति बोरी की दर से 3,48,400 रुपये के मुआवजे की मांग की।
रेलवे क्लेम्स ट्रिब्यूनल (गुवाहाटी पीठ) ने 3 सितंबर 2012 को इस दावे को खारिज कर दिया। इसके बाद अपीलकर्ता ने रेलवे क्लेम्स ट्रिब्यूनल एक्ट, 1987 की धारा 23 के तहत गुवाहाटी हाईकोर्ट में वैधानिक अपील दायर की। हाईकोर्ट ने 17 दिसंबर 2024 को इस अपील को खारिज करते हुए कहा कि माल को सीधे ट्रकों से वैगनों में भेजने वाले के कर्मचारियों द्वारा लोड किया गया था और इसमें रेलवे के किसी कर्मचारी की निगरानी नहीं थी। हाईकोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि प्रेषक द्वारा बताए गए वजन को सीधे स्वीकार किया गया था, पैकिंग की स्थितियां नियमों के अनुरूप नहीं थीं और रेलवे रसीद पर ‘कहा गया है कि इसमें शामिल है’ (said to contain) लिखा हुआ था। इन फैसलों के खिलाफ अपीलकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था।
दोनों पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ता की ओर से दलील दी गई कि भले ही बुकिंग ‘मालिक के जोखिम’ (ओनर्स रिस्क) पर की गई थी, लेकिन रेलवे अधिनियम, 1989 की धारा 93 के तहत रेलवे के सामान्य दायित्वों को पूरी तरह से नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उन्होंने तर्क दिया कि ‘इंडियन रेलवे कमर्शियल मैनुअल’ का नियम 1512 अनिवार्य करता है कि माल की लोडिंग की निगरानी गुड्स क्लर्क द्वारा की जानी चाहिए, और यदि रेलवे कर्मचारी ऐसा करने में विफल रहते हैं तो इसका नुकसान भेजने वाले को नहीं होना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि “कहा गया है कि इसमें शामिल है” वाली बुकिंग केवल ‘निजी साइडिंग’ के लिए होती है, न कि ‘रेलवे साइडिंग’ के लिए। रसीद पर एक निश्चित संख्या दर्ज होने के कारण, रेलवे अधिनियम की धारा 97 के तहत रेलवे प्रशासन अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकता।
इसके विपरीत, रेलवे अधिकारियों की ओर से दलील दी गई कि शॉर्टेज सर्टिफिकेट जारी करने का मतलब यह नहीं है कि रेलवे ने अपनी देनदारी स्वीकार कर ली है। उन्होंने रेलवे अधिनियम की धारा 65(2) का हवाला दिया, जिसके तहत यदि रेलवे क्लर्क ने माल की जांच या सत्यापन नहीं किया है, तो माल की सही संख्या या मात्रा साबित करने का दायित्व प्रेषक पर ही होता है। रेलवे ने तर्क दिया कि धारा 93 ‘कमी’ (shortage) की बात नहीं करती और धारा 97 रेलवे की देनदारी को केवल उन मामलों तक सीमित करती है जहां रेलवे या उसके कर्मचारियों की लापरवाही या कदाचार साबित हो।
‘मालिक के जोखिम’ पर कोर्ट का विश्लेषण और कानूनी व्याख्या
सुप्रीम कोर्ट ने रेलवे अधिनियम, 1989 की धारा 65(2), धारा 93, धारा 97 और धारा 99 के बीच के आपसी संबंधों का गहन विश्लेषण किया।
कोर्ट ने सबसे पहले धारा 97 के आरंभ में मौजूद गैर-बाधक खंड (non-obstante clause – “इसके बावजूद”) के प्रभाव पर विचार किया। पीठ ने मोहम्मद अब्दुल समद बनाम तेलंगाना राज्य (2025) के मामले का उल्लेख किया, जिसमें जस्टिस बी.वी. नागरथना ने कहा था कि एक गैर-बाधक खंड विधायी उपकरण है जो किसी अन्य प्रावधान के साथ टकराव की स्थिति में संबंधित धारा को अधिभावी (overriding) प्रभाव देता है। इसके अतिरिक्त कोर्ट ने ए.जी. वरदराज़ुलु बनाम तमिलनाडु राज्य (1998)—जिसमें जस्टिस पतंजलि शास्त्री और जस्टिस हिदायतुल्ला की टिप्पणियों का उल्लेख था—और चांदावरकर सीता रत्न राव बनाम आशालता एस. गुरम (1986) के मामलों का हवाला देते हुए माना कि ऐसे खंडों के दायरे का निर्धारण कड़ाई से किया जाना चाहिए।
इन सिद्धांतों को इस मामले पर लागू करते हुए पीठ ने टिप्पणी की:
“उपरोक्त चर्चा को देखते हुए, धारा 97 में शामिल गैर-बाधक खंड, धारा 93 द्वारा रेलवे पर डाले गए सामान्य दायित्वों को बाहर कर देगा। चूंकि, वर्तमान मामले में माल ‘मालिक के जोखिम’ (ओनर्स रिस्क) पर बुक किया गया था, इसलिए यदि अधिकारियों पर दायित्व डालना है, तो ऐसा केवल रेलवे या उसके कर्मचारियों की ओर से लापरवाही या कदाचार साबित होने पर ही किया जा सकता है।”
इसके बाद, सील टूटने या वैगन खुले होने के आरोपों के संबंध में कोर्ट ने “लापरवाही” (negligence) की कानूनी परिभाषा का विश्लेषण किया। इसके लिए कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा पूर्व में पूनम वर्मा बनाम अश्विन पटेल (1996), राजकोट म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन बनाम मंजुलबेन जयंतीलाल नाकुम (1997) और जय लक्ष्मी साल्ट वर्क्स (पी) लिमिटेड बनाम गुजरात राज्य (1994) के मामलों में दी गई व्याख्याओं को आधार बनाया।
पीठ ने स्पष्ट किया कि अधिनियम की धारा 65(2) के परंतुक (proviso) के तहत, जब माल की खेप का सत्यापन रेलवे कर्मचारियों द्वारा नहीं किया जाता, तो लोडिंग के समय वास्तविक वजन या बोरियों की संख्या साबित करने का दायित्व पूरी तरह से भेजने वाले पर होता है। ‘देखभाल के कर्तव्य’ (duty of care) पर कोर्ट ने कहा:
“यह स्थापित करने के लिए कि रेलवे अधिकारी लापरवाह थे, यह दिखाना होगा कि उनका देखभाल करने का कर्तव्य था। यदि वे किसी भी चरण में माल को दर्ज करने, गिनने या तौलने में शामिल होते, जिससे वे उनके द्वारा ले जाए जा रहे माल की मात्रा के प्रति सक्रिय रूप से जागरूक होते, तो यह कहा जा सकता था कि उनका यह सुनिश्चित करने का कर्तव्य था कि जितनी कुल मात्रा उन्होंने गिनी या तॉली थी, उतनी ही मात्रा वे सुरक्षित रूप से अंतिम गंतव्य तक पहुंचाएं। लेकिन इस मामले में ऐसा नहीं था।”
कोर्ट ने हाईकोर्ट के इस निष्कर्ष पर सहमति जताई कि अपीलकर्ता यह साबित करने के लिए कोई भी सहायक दस्तावेज (जैसे खरीद या प्रसंस्करण रिकॉर्ड) पेश करने में विफल रहा कि वास्तव में नमक की पूरी 40,444 बोरियां लोड की गई थीं। अतः अपीलकर्ता धारा 65(2) के तहत अपना दायित्व निभाने में असमर्थ रहा।
कोर्ट ने आगे स्पष्ट किया:
“एक बार जब इस बोझ को पूरा कर लिया गया होता, केवल तभी हम रेलवे या उसके कर्मचारियों की ओर से किसी लापरवाही/कदाचार के सवाल पर आ सकते थे, यदि उन पर दायित्व डाला जाना था, भले ही माल को ‘मालिक के जोखिम’ की श्रेणी में बुक किया गया हो।”
सुप्रीम कोर्ट का निर्णय
अपीलकर्ता की दलीलों में कोई दम न पाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अपील को खारिज कर दिया और सभी लंबित आवेदनों का निपटारा कर दिया। इसके साथ ही कोर्ट ने गुवाहाटी हाईकोर्ट और रेलवे क्लेम्स ट्रिब्यूनल के फैसलों को बरकरार रखा।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: मेसर्स बजाज ट्रेडिंग कंपनी बनाम यूनियन ऑफ इंडिया
वाद संख्या: सिविल अपील संख्या… 2026 (विशेष अनुमति याचिका (सिविल) संख्या 22748/2025 से उत्पन्न)
पीठ: जस्टिस संजय करोल, जस्टिस विपुल एम. पांचोली
निर्णय की तिथि: 16 जुलाई, 2026

